भारतीय राजनीति के इतिहास में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जिनकी पहचान केवल चुनावी सफलताओं या पदों से नहीं, बल्कि नैतिक साहस, वैचारिक दृढ़ता, सरल जीवन और संगठनात्मक दृष्टि से होती है। राजमाता विजयाराजे सिंधिया ऐसे ही विरल व्यक्तित्व की धनी राजनेता थीं। उन्हें आदरपूर्वक ‘राजमाता’ कहा गया, किंतु उन्होंने सदैव स्वयं को राजसी विशेषाधिकारों से परे रखा। उनके लिए राजनीति सत्ता का साधन नहीं, बल्कि सेवा, संघर्ष और सिद्धांतों की कसौटी थी।
राजमाता का व्यक्तिगत जीवन आरंभ से ही संघर्षपूर्ण रहा। जन्म के आठ दिन बाद माता का निधन, नानी के संरक्षण में पालन-पोषण, तथा पति महाराजा जीवाजीराव सिंधिया के 45 वर्ष की अल्पायु में देहांत के बाद दीर्घकालिक वैधव्य— इन परिस्थितियों ने उन्हें तोड़ा नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता और मानसिक दृढ़ता प्रदान की। पति के असामयिक निधन के बाद उन्होंने न केवल पारिवारिक दायित्व निभाए, बल्कि सार्वजनिक जीवन में भी अपनी स्वतंत्र पहचान स्थापित की।
राजपथ से लोकपथ की उनकी कर्तव्य यात्रा सहज नहीं थी। एक महारानी होते हुए भी उनका जीवन अत्यंत सादगीपूर्ण था। ग्वालियर की जनता उन्हें स्नेह और सम्मान की दृष्टि से देखती थी। वर्ष 1985 की एक स्मरणीय घटना उनके सरल सहज व्यक्तित्व का प्रमाण है। सावन माह में वे महाकाल के दर्शन हेतु इंदौर एयरपोर्ट पहुंची थीं। उस समय पार्टी ने उनके स्वागत की जिम्मेदारी मुझ जैसे साधारण कार्यकर्ता
राजमाता का व्यक्तिगत जीवन आरंभ से ही संघर्षपूर्ण रहा। जन्म के आठ दिन बाद माता का निधन, नानी के संरक्षण में पालन-पोषण, तथा पति महाराजा जीवाजीराव सिंधिया के 45 वर्ष की अल्पायु में देहांत के बाद दीर्घकालिक वैधव्य— इन परिस्थितियों ने उन्हें तोड़ा नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता और मानसिक दृढ़ता प्रदान की। पति के असामयिक निधन के बाद उन्होंने न केवल पारिवारिक दायित्व निभाए, बल्कि सार्वजनिक जीवन में भी अपनी स्वतंत्र पहचान स्थापित की
को सौंपी थी। मुझे देखकर उन्होंने मुस्कराते हुए ‘भजन गाने वाले कैलाश’ कहकर संबोधित किया— वे मुझे प्रायः इसी नाम से पुकारती थीं। जब मैंने उनके लिए कार का दरवाजा खोला, तो उन्होंने कहा, “तुम अपनी कार का दरवाजा स्वयं नहीं खोलोगे।” यह कहकर उन्होंने पहले दरवाजा बंद किया और फिर स्वयं खोला। इसके बाद उन्होंने मुझे आगे की सीट छोड़कर पीछे उनके साथ बैठने को कहा। यह उनका स्वभाव था— सहज, आत्मीय और मानवीय। भाजपा का साधारण कार्यकर्ता भी उनके मातृत्व स्नेह से स्वयं को धन्य अनुभव करता था।
वर्ष 1991 की एक अन्य घटना राजमाता के लोकमातृत्व को रेखांकित करती है। विदिशा लोकसभा उपचुनाव में भाजपा के प्रत्याशी श्री शिवराज सिंह चौहान के समर्थन में वे जनसभा में पहुंचीं। यह खबर फैलते ही राजमाता के दर्शन हेतु अपार जनसमूह उमड़ पड़ा, जिसमें बड़ी संख्या में आदिवासी भाई-बहन भी थे। स्थिति को देखते हुए उन्हें शीघ्र वहां से ले जाने का निर्णय लिया गया। कार में पीछे की सीट पर राजमाता और शिवराज जी बैठे थे। रास्ते में देखा गया कि लोग टायरों की धूल माथे से लगाकर ‘राजमाता की जय’ का उद्घोष कर रहे थे। यह दृश्य देखकर उनकी आंखें भर आईं। उन्होंने शिवराज जी से कहा—“अब अपनी सरकार है, इन लोगों की गरीबी दूर करना हमारा कर्तव्य है।” सच्चे अर्थों में वे लोकमाता थीं।
राजनीति में उनका प्रवेश अनिच्छापूर्वक हुआ। तत्कालीन केंद्रीय राजनीति जवाहरलाल नेहरू के इर्द-गिर्द केंद्रित थी और रियासतों के प्रति अविश्वास का भाव प्रबल था। 1957 के चुनावों से पूर्व ग्वालियर राजघराने को लेकर असंतोष की स्थिति बनी। महाराज उस समय मुंबई में थे, अतः महारानी स्वयं दिल्ली पहुंचीं। नेहरू जी ने स्पष्ट किया कि या तो महाराज कांग्रेस से चुनाव लड़ें अथवा स्वयं महारानी प्रत्याशी बनें। कुल और प्रतिष्ठा की रक्षा हेतु उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा और भारी बहुमत से विजयी रहीं।
यद्यपि उन्होंने लगभग एक दशक तक कांग्रेस का साथ दिया, किंतु उनका वैचारिक झुकाव जनसंघ के निकट था। 1967 तक आते-आते उनका मोहभंग स्पष्ट हो गया। ग्वालियर में छात्र आंदोलन के दौरान

1975–77 का आपातकाल उनकी राजनीतिक यात्रा का सबसे साहसिक अध्याय है। जब अनेक नेता समझौते के मार्ग पर चले, तब राजमाता ने जेल जाना स्वीकार किया, पर सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। नेपाल चले जाने का सुझाव उन्होंने अस्वीकार किया और देश में रहकर गिरफ्तारी दी। तिहाड़ जेल की असुविधाएं, अपमान और स्वास्थ्य संबंधी कष्ट उन्होंने दृढ़ता से सहे। 1980 में भारतीय जनता पार्टी की स्थापना के साथ वे उसकी संस्थापक सदस्य और उपाध्यक्ष बनीं। इस भूमिका में रहते हुए उन्होंने पार्टी को वैचारिक स्पष्टता और संगठनात्मक मजबूती प्रदान की। अटल बिहारी वाजपेयी के प्रति उनका विशेष स्नेह था; वे उन्हें अपना ‘धर्मपुत्र’ कहती थीं
पुलिस हिंसा में एक छात्र की मृत्यु तथा बस्तर गोलीकांड, जिसमें 11 आदिवासियों और बस्तर नरेश की हत्या हुई— इन घटनाओं ने उन्हें अन्दर से विचलित कर दिया। अंततः उन्होंने कांग्रेस छोड़कर जनसंघ का दामन थामा। यह केवल दल परिवर्तन नहीं, बल्कि वैचारिक पुनर्स्थापन था।
1975–77 का आपातकाल उनकी राजनीतिक यात्रा का सबसे साहसिक अध्याय है। जब अनेक नेता समझौते के मार्ग पर चले, तब राजमाता ने जेल जाना स्वीकार किया, पर सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। नेपाल चले जाने का सुझाव उन्होंने अस्वीकार किया और देश में रहकर गिरफ्तारी दी। तिहाड़ जेल की असुविधाएं, अपमान और स्वास्थ्य संबंधी कष्ट उन्होंने दृढ़ता से सहे।
1980 में भारतीय जनता पार्टी की स्थापना के साथ वे उसकी संस्थापक सदस्य और उपाध्यक्ष बनीं। इस भूमिका में रहते हुए उन्होंने पार्टी को वैचारिक स्पष्टता और संगठनात्मक मजबूती प्रदान की। अटल बिहारी वाजपेयी के प्रति उनका विशेष स्नेह था; वे उन्हें अपना ‘धर्मपुत्र’ कहती थीं। 1984 के लोकसभा चुनाव में ग्वालियर से अटल जी और कांग्रेस से माधवराव सिंधिया आमने-सामने थे। पुत्रों के इस राजनीतिक द्वंद्व में भी राजमाता ने नीति और धर्म के मार्ग पर चलकर अटल जी का समर्थन किया—परिणाम चाहे जो रहा हो, उनके सिद्धांत अडिग रहे।
1957 से 1998 तक निरंतर निर्वाचित होना उनकी जनस्वीकृति का स्पष्ट प्रमाण है। भारत सरकार द्वारा उनकी जन्मशताब्दी पर जारी स्मारक सिक्का केवल सम्मान नहीं, बल्कि उस विशुद्ध राजनीतिक परंपरा की स्वीकृति है जिसमें सत्ता से ऊपर सिद्धांत रखे जाते हैं।
राजमाता विजयाराजे सिंधिया की विरासत हमें सिखाती है कि लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक अनवरत नैतिक संघर्ष है। जब राजनीति सुविधा और अवसरवाद की ओर झुकती है, तब ऐसे व्यक्तित्व पथ-प्रदर्शक बनते हैं। भारतीय राजनीति को आज भी यदि वैचारिक स्पष्टता और संगठनात्मक अनुशासन की आवश्यकता है, तो राजमाता विजयाराजे सिंधिया का जीवन और शुचिता के लिए संघर्ष एक प्रामाणिक संदर्भ बिंदु बना रहेगा।
(लेखक मध्य प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं)

