26 जनवरी को भारत अपने गणतंत्र का 76वां वर्ष हर्षोल्लास से मना रहा है। 26 जनवरी, 1950 को भारत ने अपने संविधान को लागू किया था। 75 वर्षों की भारत की यह यात्रा चुनौतियों से भरी हुई, लेकिन एक सफल लोकतंत्र की कहानी है। हमारी इस सफलता में भारत के संविधान का महत्वपूर्ण योगदान है। संविधान सभा द्वारा अपना यह संविधान 26 नवंबर,1949 को राष्ट्र को समर्पित किया गया था। हमने उस समय यह संकल्प दोहराया था कि लोकतांत्रिक व्यवस्था के माध्यम से सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक न्याय देने के प्रति हम प्रतिबद्ध हैं। हम अपनी-अपनी श्रद्धा एवं आस्थाओं का पालन करते हुए बंधुभाव के साथ राष्ट्र की एकता एवं अखंडता को अक्षुण्ण रखेंगे। हमारे संविधान की विशेषताओं के संदर्भ में अफ्रीकी नेता नेल्सन मंडेला ने कहा था, “भारत का संविधान दक्षिण अफ्रीका सहित कई अन्य उभरते लोकतंत्रों के लिए प्रेरणा बना है, क्योंकि इसने विविधता में सम्मान सिखाया है।” गणतंत्र दिवस के इस उत्सव के अवसर पर ‘हम भारत के लोगों’ को भविष्य की चुनौतियों के प्रति सजग रहते हुए उन चुनौतियों पर विजय प्राप्त कर प्रधानमंत्री जी के ‘विकसित भारत’ के संकल्प को पूर्ण करना है।
प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने अपने पंच प्रण के आह्वान में भारतवासियों से सभी प्रकार की गुलामी से मुक्ति का आह्वान किया है। कुछ विदेशी विद्वानों द्वारा योजनाबद्ध पद्धति से भारतीय समाज में हमारी व्यवस्थाओं, इतिहास, महापुरुषों एवं संस्कृति के प्रति हीनता का भाव उत्पन्न किया गया, इसका परिणाम
15 अगस्त को लाल किले से अपने संबोधन में प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने देश में बदलते जनसांख्यिकी परिवर्तन पर चिंता व्यक्त की थी। जनसंख्या के इस असंतुलन के कारण भारत का विभाजन हम देख चुके हैं। योजनाबद्ध पद्धति से अनेक माध्यमों से भारत में धार्मिक आधार पर जनसंख्या परिवर्तन को पुन: आकार देने का कार्य हो रहा है। घटती हिंदू जनसंख्या एवं उसके परिणाम पाकिस्तान एवं बांग्लादेश में हम प्रतिदिन होने वाली घटनाओं से अनुभव कर सकते हैं
हुआ कि हमारा समाज आत्महीनता के भाव से ग्रसित हुआ है। हमारे राष्ट्र का आधार क्या है, किन मूल्यों के आधार पर हम आगे बढ़ेंगे ऐसे विषयों पर संपूर्ण राष्ट्र संभ्रम में है। भारत ही दुनिया का ऐसा देश है जिसके नाम भी भारत/इंडिया दो है। यह स्थिति ही भारत के अनेक विवादों का कारण है। डॉ. एस. राधाकृष्णन का संविधान सभा का भाषण –“राष्ट्रीयता निर्भर करती है, उस जीवन पद्धति पर जिसे चिरकाल से हम बरतते चले आ रहे हैं। यह जीवन पद्धति तो इस देश की निजी वस्तु है।” महात्मा विदुर जी ने कहा था, “संभ्रम की स्थिति में राजा, प्रजा सहित संपूर्ण राष्ट्र समाप्त हो जाता है।” गणतंत्र दिवस के अवसर पर भारत के गौरव का स्मरण कर संभ्रम रहित अपने सांस्कृतिक मूल्यों के आधार पर समाज के जागरण का संकल्प लें।
15 अगस्त को लाल किले से अपने संबोधन में प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने देश में बदलते जनसांख्यिकी परिवर्तन पर चिंता व्यक्त की थी। जनसंख्या के इस असंतुलन के कारण भारत का विभाजन हम देख चुके हैं। योजनाबद्ध पद्धति से अनेक माध्यमों से भारत में धार्मिक आधार पर जनसंख्या परिवर्तन को पुन: आकार देने का कार्य हो रहा है। घटती हिंदू जनसंख्या एवं उसके परिणाम पाकिस्तान एवं बांग्लादेश में हम प्रतिदिन होने वाली घटनाओं से अनुभव कर सकते हैं। मिस्र, तुर्की, ईरान, लेबनान, कोसोवो भी बढ़ती जनसंख्या के कारण समाप्त हुई अपनी प्राचीन संस्कृति के साक्षी है। प्रसिद्ध समाजशास्त्री अगस्ट काम्टे (AUGUSTE COMTE) ने इन्हीं अनुभवों के आधार पर कहा था, “Demography is Destiny” (जनसंख्या ही भाग्य है)। हम भारत के लोग इन आसन्न खतरों को पहचानकर विदेशी घुसपैठियों को “Detect, Delete, Deport” करने में सहायक बनकर लोकतंत्र को बचाने में सहभागी बनें।
विश्व में भारत की बढ़ती शक्ति के कारण अनेक विदेशी शक्तियां, विदेश प्रेरित व्यक्ति एवं संस्थाएं परेशान दिखाई दे रही हैं। इस परेशानी के कारण वे मान्यता प्राप्त संवैधानिक संस्थाओं एवं व्यवस्थाओं को बदनाम करने का निरंतर प्रयास भी कर रहे हैं। अनेक देशों द्वारा प्रशंसित विश्व में अपना विशिष्ट महत्व रखने वाले भारतीय चुनाव आयोग एवं ईवीएम पर आरोप लगाना, सीएए का आधार लेकर भ्रम निर्माण करते हुए समाज में संघर्ष खड़ा करना, संविधान बदलने एवं आरक्षण हटाने जैसे आरोप लगाना, किसान आंदोलन के नाम पर होने वाली घटनाएं यह सब इसी के जीवंत प्रमाण हैं। श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल में प्रारंभ हुए आंदोलनों द्वारा चुनी हुई सरकारों को बदलने में भी इन्हीं शक्तियों का हाथ बताया जाता है। GEN Z के नाम पर भारत में भी वह यह स्वप्न संजोए हैं। 26 नवंबर, 1949 को बाबासाहेब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने अपने संविधान सभा के अंतिम भाषण में कहा था कि यह “Grammar Of Anarchy” (अराजकता का व्याकरण) है। उन्होंने कहा, “यह तथाकथित जन-आंदोलन लोकतांत्रिक व्यवस्था के विरुद्ध प्रचार को हथियार के रूप में प्रयोग करने का प्रयास था।”
भारत में विदेशी सहायता प्राप्त अनेक स्वयंसेवी संगठन (N.G.O.) इस अराजकता के पीछे सक्रिय हैं। अनेक देशों में परस्पर संघर्ष कराके एवं आर्थिक साम्राज्यवाद के माध्यम से विश्व में अपने प्रभुत्व का समर्थन देखने वालों के लिए भारत को स्वदेशी एवं आत्मनिर्भरता के आधार पर विकसित एवं सुरक्षित बनाना ही उत्तर होगा।
पश्चिमी एवं साम्यवादी विचारों से प्रेरणा प्राप्त अनेक विद्वान भारत को राष्ट्र नहीं अनेक राष्ट्रों के समूह के रूप में देखते हैं। उत्तर-दक्षिण, आर्य-द्रविड़ आदिवासी – शहरी, दलित – हिंदू आदि के आधार पर भेदभाव को सैद्धांतिक मान्यता प्रदान करना यह उन समूहों का प्रयास रहा है। अर्बन नक्सलवादियों एवं सशस्त्र विद्रोहियों के आधार पर तथाकथित समानता लाने वाले लोग भारत के विभाजन के स्वप्न ही सदैव से देखते रहे हैं। भारत सदैव से एक राष्ट्र है, उसकी संस्कृति एक है, विविधता (Unity in Diversity) में
विश्व में भारत की बढ़ती शक्ति के कारण अनेक विदेशी शक्तियां, विदेश प्रेरित व्यक्ति एवं संस्थाएं परेशान दिखाई दे रही हैं। इस परेशानी के कारण वे मान्यता प्राप्त संवैधानिक संस्थाओं एवं व्यवस्थाओं को बदनाम करने का निरंतर प्रयास भी कर रहे हैं। अनेक देशों द्वारा प्रशंसित विश्व में अपना विशिष्ट महत्व रखने वाले भारतीय चुनाव आयोग एवं ईवीएम पर आरोप लगाना, सीएए का आधार लेकर भ्रम निर्माण करते हुए समाज में संघर्ष खड़ा करना, संविधान बदलने एवं आरक्षण हटाने जैसे आरोप लगाना, किसान आंदोलन के नाम पर होने वाली घटनाएं यह सब इसी के जीवंत प्रमाण हैं
ही हमने एकता के दर्शन किए हैं। आसेतु हिमाचल हम एक है। इस सत्य की अनुभूति न होने के कारण स्वार्थवश अल्पज्ञानी सत्तालोलुप राजनीतिक नेतृत्व विभाजनकारी वक्तव्य देने का कार्य कर रहा है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा प्रारंभ किया गया प्रकल्प ‘एक भारत-श्रेष्ठ भारत’ इसी एकत्व की अनुभूति हम भारतवासियों को कराता है। काशी–तमिल संगमम् इसका जीवंत उदाहरण है। हम भारत के लोगों ने करोड़ों भारतवासियों को इस सत्य की अनुभूति कराने का सफल प्रयास करना है।
भारत की सरकार ने 31 मार्च, 2026 तक भारत को नक्सलवाद से मुक्ति दिलाने का संकल्प लिया है। 2014 से अब तक लगभग 2000 से अधिक नक्सली मारे गए है एवं लगभग 7000 से अधिक नक्सलियों ने आत्मसमर्पण कर संविधान में आस्था व्यक्त की है। हम सभी भारतवासियों को नक्सलवाद प्रभावित क्षेत्र में होने वाले विकास एवं पुनर्वास में सहायक बनकर नक्सल मुक्त भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के संकल्प में सहायक बनना होगा।
कट्टरवादी ताकतें सभी स्थानों पर अपने को पीड़ित दिखाकर अपनी पहचान बचाने के नाम पर अनेक षड्यंत्र कर रही हैं। बांग्लादेश में मकर संक्रांति का विरोध, अमेरिका के टैक्सास में अलग भूमि की मांग, मतांतरण एवं लव जेहाद के षड्यंत्र भारत सहित सभी स्थानों पर हम देख रहे हैं। घटना के विरोध में बड़ी संख्या में सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन द्वारा समाज में भय निर्माण करने का प्रयास हो रहा है। कानून-व्यवस्था एवं न्याय प्रणाली को चुनौती देना कुछ समूहों का स्वभाव ही बनता जा रहा है। राष्ट्र के हित में विचार करने वाले सभी राष्ट्र हितैषियों के लिए यह चिंता का विषय है।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में सामान्य व्यक्ति की भागीदारी के लिये परिवारवाद से मुक्ति, आर्थिक योजना के क्रियान्वयन में प्रामाणिकता यह हमारे व्यवहार एवं निर्णयों का विषय बनना चाहिए। सरकारों की सफलता का आधार विकास एवं समाज की खुशहाली बने, न कि उनका मूल्यांकन जाति एवं क्षेत्र के आधार पर हो। इसके कारण समाज का आंतरिक वातावरण परस्पर सद्भाव एवं बंधुता से युक्त बनेगा। गणतंत्र दिवस के इस अवसर पर संवैधानिक मूल्यों का पालन कर, चुनौतियों के प्रति जागरूक रहते हुए हम अपने कर्तव्यों का पालन करे, यही हम सब भारतवासियों का कर्तव्य है।
{लेखक भाजपा के राष्ट्रीय सह महामंत्री (संगठन) हैं}

