सनातन एवं सुशासन की केसरिया ध्वजा लोकमाता अहिल्याबाई

| Published on:

      यह वर्ष पुण्यश्लोक माता अहिल्याबाई होल्कर की त्रिशताब्दी (तीन सौवां साल) का वर्ष है। वह एक आदर्श शासक थीं, जिन्होंने न केवल सुशासन के मंत्र को धरातल पर चरितार्थ कर दिखाया बल्कि न्याय, जनसेवा, गरीब-कल्याण और सनातन धर्म की रक्षा का परचम भी फहराया। देश ही नहीं, विश्व के इतिहास में उनकी जैसी कर्तव्यपरायणता विरले ही मिलती है। उन्होंने समाज के हर वर्ग के कल्याण के लिए काम किया। एक रानी होने के बाद भी वे हमेशा सादा जीवन जीतीं थी और पिछड़ों एवं कमजोरों की परवाह करती थीं। शादी के कुछ ही समय बाद एक युद्ध में उनके सिर से पति का साया छिन गया था लेकिन अकेली महिला होने के बावजूद उन्होंने न केवल अपने साम्राज्य का कुशल प्रबंधन किया,

माता अहिल्याबाई होल्कर की महानता का परिचय इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनके जीवनकाल में ही जनता उन्हें ‘देवी’ की तरह मानने लगी थी। माता अहिल्याबाई होल्कर ने अपने राज्य की सीमाओं के बाहर भारत-भर के प्रसिद्ध तीर्थों और स्थानों में मंदिर बनवाए, घाट बंधवाए, कुओं और बावड़ियों का निर्माण किया

बल्कि अपने प्रजा के कल्याण के लिए जिस दूरदर्शी सोच का परिचय देते हुए कदम उठाये, वह अपने आप में अद्वितीय है। उनका व्यक्तित्व व कृतित्व ही इतना महान है कि उन्हें नारी शक्ति के एक अलौकिक स्तंभ के रूप में पूजा जाता है। माता अहिल्याबाई होल्कर के बाद उनके दिखाए रास्ते को यदि किसी ने सच्चे अर्थों में जमीन पर उतारा है तो वे केवल और केवल हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी हैं।

माता अहिल्याबाई होल्कर ने एक ओर कुशल सैन्य एवं रणनीतिक प्रबंधन से अपने साम्राज्य को मुस्लिम आक्रमणकारियों से बचाया, तो वहीं दूसरी ओर, विद्रोहियों एवं चोरों-डाकुओं के आतंक से भी अपनी प्रजा एवं अपने साम्राज्य की रक्षा की। उन्होंने अपने राज्य में मंदिरों, सड़कों, धर्मशालाओं, जलाशयों का बड़े पैमाने पर निर्माण कराया। उन्होंने रोजगार उपलब्ध कराने के लिए उद्योगों पर बल देने हेतु कई कदम उठाये। उन्होंने उद्योगों पर इस तरह नीतियां बनाई कि उनके द्वारा शुरू कराया गया महेश्वर कपड़ा उद्योग आज भी चल रहा है। यह आज भी सैकड़ों लोगों को रोजगार प्रदान करता है। उनके कार्यकाल में मालवा क्षेत्र साहित्य, उद्योग, मूर्तिकला, संगीत और कला के क्षेत्र में एक गढ़ बन चुका था। मराठी कवि मोरोपंत, शाहिर अनंतफंडी और संस्कृत विद्वान खुलासी राम उनके कालखंड में ही प्रख्यात हुए। उन्होंने उत्तराधिकारी न होने की स्थिति में प्रजा को दत्तक लेने का अधिकार दिया। वह अपनी प्रजा को अपनी संतान की तरह नहीं, बल्कि संतान ही मानती थीं। उन्होंने अपने शासनकाल में कई गैरजरूरी कानूनों को समाप्त किया। किसानों का लगान कम किया तथा कृषि विकास के लिए भी कई प्रयास किए। उनकी इन नीतियों का आधुनिक भारत में अनुसरण अक्षरशः मोदी जी कर रहे हैं।

माता अहिल्याबाई होल्कर हर दिन अपनी प्रजा से बात करती थीं, उनकी समस्याएं सुनती थीं और उसका निराकरण करती थीं। वह आम लोगों के साथ हर पर्व मनातीं थीं। उनका मानना था कि धन, प्रजा व ईश्वर की दी हुई वह धरोहर स्वरूप निधि है, जिसकी वह मालिक नहीं बल्कि उसके प्रजाहित में उपयोग की जिम्मेदार संरक्षक और न्यासी हैं। वह इसी भाव से राज्य के धन का सदुपयोग करती थीं। उनके राज्य में जाति भेद को कोई मान्यता नहीं थी। हम इसे आज ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास’ की मोदी जी की नीति में देख रहे हैं।

माता अहिल्याबाई होल्कर की महानता का परिचय इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनके जीवनकाल में ही जनता उन्हें ‘देवी’ की तरह मानने लगी थी। माता अहिल्याबाई होल्कर ने अपने राज्य की सीमाओं के बाहर भारत-भर के प्रसिद्ध तीर्थों और स्थानों में मंदिर बनवाए, घाट बंधवाए, कुओं और बावड़ियों का निर्माण किया, भूखों के लिए अन्नसत्र और सदावर्त खोले, प्यासों के लिए प्याऊ बिठलाईं, मंदिरों में विद्वानों की नियुक्ति की। उनके अन्नसत्र और सदावर्त में लोगों को प्रतिदिन मुफ्त भोजन मिलता था। उन्होंने कलकत्ता से बनारस तक सड़क बनवाई, बनारस में मां अन्नपूर्णा मंदिर का निर्माण कराया, गया में विष्णु मंदिर बनवाया। उन्होंने काशी, गया, सोमनाथ, अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार, द्वारिका, बद्रीनारायण, रामेश्वर, जगन्नाथ पुरी, पैठण, महेश्वर, वृंदावन, सुपलेश्वर, उज्जैन, पुष्कर, पंढरपुर, चिंचवाड़, चिखलदा, आलमपुर, देवप्रयाग, राजापुर इत्यादि प्रसिद्ध तीर्थस्थानों पर भी मंदिर बनवाए।

उन्होंने मुगलों द्वारा क्षतिग्रस्त किए गए काशी विश्वनाथ, सोमनाथ जैसे सनातन संस्कृति के प्रमुख स्तंभों का पुनरुद्धार भी करवाया। त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग में विश्रामगृह तथा अयोध्या, नासिक में प्रभु श्रीराम के मंदिरों का निर्माण, उज्जैन में चिंतामणि गणपति मंदिर निर्माण जैसे कार्य भी उन्होंने किए। काशी में गंगा किनारे उन्होंने ही मणिकर्णिका घाट का निर्माण करवाया था। इसके अलावा मांडू स्थित नीलकंठ महादेव मंदिर का निर्माण भी उन्होंने ही करवाया था। इतना ही नहीं, वे ओडिशा के महाराजा से लेकर हैदराबाद-अवध के नवाबों तक को मंदिर निर्माण के लिए लिखती रहीं। साथ ही, उन्होंने इंदौर को एक छोटे-से गांव से खूबसूरत शहर बनाया। कहा जाता है कि इन सभी कार्यों के लिए भी वह राज्य का धन नहीं बल्कि ‘खासगी संपत्ति’ मतलब राज परिवार की आधिकारिक निजी संपत्ति ही खर्च करती थीं।

देश के कोने-कोने में स्थापित आध्यात्मिक ऊर्जा के सशक्त केन्द्रों को आक्रांताओं द्वारा जो बार-बार पद दलित किया गया, उसके जीर्णोद्धार का कार्य लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर की तरह आगे कौन करेगा – इसको लेकर देश के तमाम नागरिकों, संतों, विद्वानों के मन में संशय का भाव था क्योंकि वोट बैंक और तुष्टीकरण की नीति ने इस तरह देश की राजनीति को बंधक बना लिया था कि लोगों ने काशी विश्वनाथ धाम, अयोध्या में प्रभु श्रीराम मंदिर, मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि जैसे सनातन के अलौकिक केंद्रों के पुनरुत्थान की आस ही छोड़ दी थी लेकिन किसे पता था कि माता अहिल्याबाई की तरह भारत माता श्री नरेन्द्र मोदी के रूप में अपने एक ऐसे पुत्र को भेजेगी जो माता अहिल्याबाई होल्कर की तरह ही उनके सपनों को भी पूरा करेगा। आज अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि में अपने भव्य मंदिर में रामलला भी मुस्करा रहे हैं, काशी विश्वनाथ की चमक भी अक्षय ऊर्जा बिखेर रही है, सोमनाथ दादा भी दिव्य रूप में विराजमान हैं और सनातन संस्कृति के सभी केंद्र अपने दिव्यतम आभा से हम सबको आलोकित कर रहे हैं।

इतिहास, वर्तमान और भविष्य में केवल एक ही व्यक्ति में इतने गुणों का समावेश होना संभव ही नहीं है जो माता अहिल्याबाई होल्कर के कृतित्व में है। माता अहिल्याबाई होल्कर का त्याग, उनकी वीरता, उनका बलिदान, साहस, शौर्य, सनातन संस्कृति की रक्षा का उनका भाव, न्याय एवं उनकी दानशीलता युगों-युगों तक संपूर्ण ब्रह्मांड में गाई जाती रहेंगी

न्याय और शासन के प्रति माता अहिल्याबाई होल्कर की प्रतिबद्धता ऐसी थी कि अपने बेटे को मृत्युदंड देने के आदेश से भी वो नहीं झिझकीं। अपने जीवन में कई चुनौतियों का सामना करने के बाद भी उन्होंने कभी हार नहीं मानी और अपनी प्रजा को सुख-समृद्धि से भरा जीवन देने के लिए हमेशा लगी रहीं। यही भाव हम अपने प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के जीवन सूत्र में भी प्रकट रूप में पाते हैं।

युद्ध क्षेत्र में अपने पति की असामयिक बलिदान के पश्चात् देवी अहिल्याबाई ने सती होने का प्रण ले लिया था यह सोचते हुए कि प्राणों से प्रिय पति अगर जीवित नहीं हैं तो उनके जीवन का भी कोई अर्थ नहीं है लेकिन अपने श्वसुर मल्हार राव जी के समझाने के बाद उन्होंने सती होने का विचार त्याग दिया और जी-जान से अपनी प्रजा की सेवा करने का दायित्व निभाया। प्रजा कल्याण के मूल मंत्र को अपने जीवन में उतार, राजसी सुखों का त्याग कर दु:खी, शोषित, वंचित एवं पीड़ित जन की सेवा को ही उन्होंने अपने जीवन का परम लक्ष्य बना लिया।

अपने नागरिकों के कल्याण के लिए माता अहिल्याबाई होल्कर इतनी दृढ़ निश्चयी थीं कि राज्य में चोर, डाकुओं के आतंक से त्रस्त व्यापारी, यात्री और प्रजा को बचाने के लिए उन्होंने घोषणा कर दी कि जो भी व्यक्ति इन डाकुओं का राज्य से सफाया कर देगा, उससे वह अपनी पुत्री का विवाह कर देंगी। यशवंत राव फणसे ने माता की शर्त पूरी की और इस तरह मुक्ताबाई का विवाह वीर व बुद्धिमान योद्धा यशवंत से हुआ। इतना ही नहीं, वे समाज सुधारक भी इस उच्च कोटि की थीं कि उन्होंने चोर, डाकुओं को सही रास्ते पर लाकर उनके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन करके उनका पुनर्वास भी किया। दानी भी वह ऐसी थीं कि कहा जाता है— काशी में एक ब्राह्मण का घर जलकर राख हो गया था। वह सहायता के लिए माता के पास आया तो उन्होंने इस बात की सत्यता जानने पर उसे नया घर बनवा कर भेंट किया।

अपने जीवन में आये अनेक झंझावातों और अनगिनत कष्टों, चुनौतियों से पार पाते हुए माता अहिल्याबाई होल्कर ने अपने कर्तव्यों से कभी भी मुंह नहीं मोड़ा। पहले पति के बलिदान, फिर पिता समान श्वसुर की मृत्यु, फिर लंबी बीमारी से अल्पायु में ही अपने नवासे की मृत्यु, उसके बाद अपने दामाद यशवंत राव फणसे की दु:खद मृत्यु, फिर पुत्री मुक्ताबाई का सती होना— एक के बाद एक आघात उन्होंने झेला लेकिन तब भी अपनी प्रजा के हित व संरक्षण के लिए माता अहिल्याबाई ने परिश्रम की ऐसी पराकाष्ठा की कि आज भी पूरी दुनिया उनके सामने नतमस्तक है। प्रजा के हित में उठाये गए क़दमों ने ही उन्हें ‘लोकमाता’ की उपाधि दी।

कवि मोरोपंत के शब्दों में, “देवी अहिल्याबाई का निष्ठावान और कर्तव्यपरायण चरित्र महाराष्ट्र ही नहीं, अपितु पूरे देश में लोकप्रिय है। वह गंगा नदी के समान पवित्र हैं। सदा सद्भावना-युक्त कार्य कर सभी का कल्याण करती हैं। इन्हीं सद्गुणों के कारण वह जन-जन के हृदय में हैं।”

इतिहास, वर्तमान और भविष्य में केवल एक ही व्यक्ति में इतने गुणों का समावेश होना संभव ही नहीं है जो माता अहिल्याबाई होल्कर के कृतित्व में है। माता अहिल्याबाई होल्कर का त्याग, उनकी वीरता, उनका बलिदान, साहस, शौर्य, सनातन संस्कृति की रक्षा का उनका भाव, न्याय एवं उनकी दानशीलता युगों-युगों तक संपूर्ण ब्रह्मांड में गाई जाती रहेंगी। संपूर्ण भारत उनका ऋणी है। हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने उनके सपनों को, उनके कार्यों को, उनके द्वारा दिखाए रास्ते को पूरा करने का जो बीड़ा उठाया है, वह न केवल अनुकरणीय है बल्कि उसकी जितनी भी सराहना की जाय, कम है। यही समय है कि हम सब एकजुट होकर प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के कंधों को और मजबूत करें ताकि भारतवर्ष अपने वैभवशाली और गौरवशाली स्वरूप में एक बार फिर स्थापित होकर संपूर्ण विश्व में मानव कल्याण, शांति और विश्वबंधुत्व की छटा बिखेर सके।

(लेखक भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं)