लोकमाता अहिल्याबाई: लोक-कल्याण व अन्त्योदय की प्रतिमूर्ति

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    अरुण सिंह

माता अहिल्याबाई होलकर का नाम इतिहास में नारी सशक्तीकरण, सुशासन और लोक कल्याण के अद्वितीय उदाहरण के रूप में जाना जाता है। उनका जीवन और शासन समाज, धर्मरक्षा और राजनीतिक सुधारों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता का प्रतीक है। 31 मई, 2024 से देवी अहिल्याबाई का तीसरा जन्मशती वर्ष का प्रारंभ हो चुका है, परन्तु उनके द्वारा लोकमंगल हेतु कृतकार्य आज भी इतने जीवंत और प्रासंगिक बने हुए हैं कि लगता नहीं कि उनकी काया कीर्ति के अवतरण की तीन सदियां बीत गईं। अहिल्याबाई केवल एक राज्य की रानी नहीं थीं बल्क़ि उनका लोक कल्याणकारी कार्य अपने राज्य की सीमाओं से बाहर सम्पूर्ण भारत में पहुंचा और उन्होंने लोगों के हृदय पर शासन किया, यही कारण है कि आज भी लोकमानस में वे ‘लोकमाता’ के रूप में पूजनीय हैं।

यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के एक दशक से अधिक के नेतृत्व में जब अन्त्योदय, गरीब-किसान कल्याण, स्वरोजगार, महिलाओं के अधिकार, इंफ्रास्ट्रक्चर विकास, सांस्कृतिक परावर्तन, तकनीकी विकास के क्षेत्र में देश अभूतपूर्व प्रगति सुनिश्चित कर रहा है और भारत देश की प्रतिष्ठा पूरे विश्व में बढ़ रही है, ऐसे में जब माता अहिल्याबाई तथा मोदी जी के जनकल्याणकारी सुशासन का अध्ययन करें तो हमें बहुत समानताएं दिखाई देती हैं और अपने इन भावों के साथ मैं माता अहिल्याबाई की चर्चा अपने इस लेख के माध्यम से करूंगा।

अहिल्याबाई का जीवन और शासनकाल मात्र एक शासक की कहानी नहीं है, बल्कि यह एक प्रेरणा है कि कैसे भारत की नारी शक्ति ने अपने समय में जटिलताओं से भरे समाज को बदलने, जाग्रत करने और बेहतर बनाने का काम किया। उनके धर्म संरक्षण, शिक्षा प्रोत्साहन, कृषि सुधार, जल प्रबंधन, ग्रामीण-आदिवासी समुदाय के उत्थान, सांस्कृतिक संरक्षण और महिलाओं के सशक्तीकरण के क्षेत्र में किए गए कार्य आज भी प्रेरणादायक और प्रासंगिक हैं।

सक्षम और दूरदर्शी शासन

अहिल्याबाई होलकर का शासनकाल लगभग 30 वर्षों तक रहा, जिसमें उन्होंने अपने प्रशासनिक कौशल और अद्वितीय दृष्टिकोण से लोगों के हृदय जीते। वह एक ऐसी शासक थीं, जिनके पास शासन और जनसेवा के लिए स्पष्ट दृष्टिकोण था। उनकी नीतियां राष्ट्र हित और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए बनाई गई थीं। उनका व्यवहार लोगों के प्रति सदा सहानुभूतिपूर्ण रहा, लेकिन जब राष्ट्रीय सुरक्षा या देशहित की बात होती थी, तो वे कठोर निर्णय लेने में पीछे नहीं हटती थीं।

अहिल्याबाई के प्रशासन की खास बात यह थी कि उनके निर्णय केवल उनकी प्रजा तक सीमित नहीं थे, उनका दृष्टिकोण पूरे भारत के कल्याण के लिए था। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि उनके राज्य के बाहर भी सामाजिक और आर्थिक सुधार हों। उनका लक्ष्य न केवल तत्काल लाभ पहुंचाना था, बल्कि एक स्थायी सुधार की दिशा में काम करना था। उन्होंने शिक्षा, बुनियादी ढांचे का विकास, स्वास्थ्य सेवाओं, महिला सशक्तीकरण, सिंचाई और कृषि के क्षेत्र में अनेक कल्याणकारी कार्य किए। माता अहिल्याबाई होलकर ने अपने शासनकाल में स्वास्थ्य सेवाओं के विकास और चिकित्सा के महत्व को समझते हुए चिकित्सकों और वैद्यों को अपने राज्य में बसाने का विशेष प्रयास किया। उस समय जब चिकित्सा सेवाओं की उपलब्धता सीमित थी, अहिल्याबाई ने यह सुनिश्चित किया कि उनके राज्य के नागरिकों को उत्तम स्वास्थ्य सेवाएं मिलें।

कृषि और किसानों के प्रति समर्पण

अहिल्याबाई होलकर के शासनकाल में 1791 ई. में एक भीषण अकाल पड़ा था। इस दौरान उन्होंने किसानों को करों से राहत दी और खाद्यान्न उपलब्ध करवाया। उन्होंने अकाल से प्रभावित किसानों के लिए मुफ्त भोजन वितरण केंद्रों की स्थापना की। इसके अलावा, उन्होंने किसानों को बीज, खाद और कृषि उपकरणों की मुफ्त या रियायती दरों पर उपलब्धता सुनिश्चित की, जिससे वे अकाल के बाद फिर से अपनी फसलें बो सकें। इस प्रकार के राहत कार्यों ने किसानों को बड़ी सहायता प्रदान की और उन्हें पुनः खड़ा होने का अवसर दिया।

अहिल्याबाई का शासनकाल भारतीय कृषि प्रणाली में एक नए युग की शुरुआत के रूप में जाना जाता है। उस समय अधिकतर शासक केवल लगान और टैक्स इकट्ठा करने में ध्यान देते थे, लेकिन अहिल्याबाई ने किसानों की स्थिति को सुधारने के लिए अनेक कदम उठाए। उन्होंने यह समझा कि कृषि देश की रीढ़ है और किसानों की उन्नति से ही राज्य की उन्नति संभव है। उनकी सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक थी नर्मदा नदी के किनारे की उपजाऊ भूमि पर मसालों और फलों की खेती को प्रोत्साहन देना।

अहिल्याबाई ने किसानों को पशुपालन को एक सहायक व्यवसाय के रूप में अपनाने के लिए प्रेरित किया, जिससे उनकी आय में वृद्धि हो सके। इसके साथ ही उन्होंने मिश्रित खेती को प्रोत्साहित किया, जिससे किसानों को दोहरी उपज मिलने लगी। इस नीति के तहत अनाज के साथ मसालों की खेती की भी पहल की गई, जो न केवल किसानों की आमदनी बढ़ाने में सहायक साबित हुई, बल्कि राज्य की अर्थव्यवस्था को भी मजबूत किया।

शिक्षा के क्षेत्र में योगदान

अहिल्याबाई होलकर ने वाराणसी में ब्रह्मपुरी बस्ती का निर्माण कराया। इस बस्ती में विभिन्न वेद, शास्त्र और अन्य प्राचीन विद्याओं के विशेषज्ञ बसाए गए। उन्होंने विद्वानों और शिक्षकों को आमंत्रित किया और उन्हें शिक्षा देने के लिए प्रोत्साहित किया। वाराणसी का यह क्षेत्र वेदों, शास्त्रों और उपनिषदों की शिक्षा का केंद्र बन गया। इसका उद्देश्य न केवल धार्मिक शिक्षा देना था, बल्कि वैदिक ज्ञान को संरक्षित करना और युवा पीढ़ी को इससे जोड़ना था। महेश्वर, जो कि अहिल्याबाई की राजधानी थी, को उन्होंने शिक्षा और संस्कृति का केंद्र बनाया। महेश्वर में भी कई विद्वानों और शिक्षकों को आमंत्रित किया गया और यहां वेद, शास्त्र, दर्शन और विभिन्न कलाओं का अध्ययन और अध्यापन शुरू किया गया। उन्होंने शिक्षा को धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण के साथ जोड़ा।

अहिल्याबाई ने शिक्षा और शासन से संबंधित अपने विचारों को एकत्रित करने और संरक्षित करने के लिए एक विशेष ग्रंथ ‘श्री अहिल्या कामधेनु’ का लेखन और संकलन करवाया। यह ग्रंथ राजधर्म, शासन व्यवस्था और नीति विज्ञान पर आधारित था, जो उस समय के लिए एक अद्वितीय शासकीय नीतियों का संकलन था। इस ग्रंथ का उद्देश्य न केवल शासकों के लिए मार्गदर्शन करना था, बल्कि भावी पीढ़ियों के लिए शिक्षा और शासन कला का एक स्थायी संदर्भ तैयार करना था। इसके अलावा, अहिल्याबाई के संग्रह में ‘गीता गोविंद’, ‘ज्ञानेश्वरी’, और ‘श्रीधरी’ जैसी महत्वपूर्ण धार्मिक पुस्तकों सहित 75 धार्मिक पुस्तकें थीं।

पर्यावरण संरक्षण और जल प्रबंधन

अहिल्याबाई होलकर ने न केवल कृषि में सुधार किए, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और जल प्रबंधन पर भी विशेष ध्यान दिया। उन्होंने समझा कि पानी की उचित व्यवस्था के बिना कृषि का विकास संभव नहीं है। इसीलिए उन्होंने पूरे राज्य में कई तालाब, कुएं और बंध बनाए, जिससे जल संरक्षण और सिंचाई की सुविधा में वृद्धि हुई। महेश्वर और आसपास के क्षेत्रों में उनके द्वारा निर्मित तालाब और कुंड आज भी मौजूद हैं। इंदौर के पास स्थित ‘अहिल्याबाई तलाब’ उन्हीं के प्रयासों का परिणाम है, जो जल संरक्षण के प्रति उनकी दूरदर्शिता को दर्शाता है।

महेश्वर, इंदौर और काशी जैसे स्थानों में उनके द्वारा निर्मित बावड़ियां आज भी ऐतिहासिक धरोहर के रूप में मौजूद हैं, जो उस समय जल संरक्षण के प्रति उनके योगदान को दर्शाती हैं। काशी में गंगा के किनारे पर स्थित अनेक घाटों के पास भी उनके द्वारा निर्मित जलाशय और कुएं हैं, जिनका उपयोग स्थानीय लोग करते थे। अहिल्याबाई के द्वारा नर्मदा नदी के किनारे बनाए गए घाट और वृक्षारोपण आज भी महेश्वर और आसपास के क्षेत्रों में देखे जा सकते हैं। नर्मदा के किनारे वृक्षों की हरियाली और घाटों की सफाई उनके पर्यावरण संरक्षण के प्रति समर्पण को दर्शाती है।

विशेष रूप से, उन्होंने पहाड़ी क्षेत्रों में बहते पानी को रोकने और उसे धरती में समाहित करने के लिए बंध और पत्थरों के गेट का निर्माण करवाया। यह कदम उस समय की जल प्रबंधन प्रणाली में एक अद्वितीय उदाहरण था, जिससे आज भी उन क्षेत्रों में जल की उपलब्धता बनी हुई है।

स्वरोजगार एवं आदिवासी कल्याण

अहिल्याबाई कृषि और पर्यावरण के क्षेत्रों के साथ सामाजिक सुधारों में भी अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने आदिवासी समुदाय को सम्मान और रोजगार देने के लिए विशेष कदम उठाए। आदिवासी समुदाय के पास पारंपरिक ज्ञान और हस्तशिल्प की समृद्ध धरोहर थी, जिसे अहिल्याबाई ने न केवल संरक्षित किया, बल्कि उसे प्रोत्साहित कर एक नई दिशा दी।

अहिल्याबाई के शासन में महेश्वर साड़ी का विकास और उन्नति हुई। इस कला को आदिवासी और स्थानीय बुनकरों ने प्राचीनकाल से संजोया था, लेकिन अहिल्याबाई के शासन में इसे संरक्षित और प्रोत्साहित किया गया। महेश्वर की साड़ियां आज भी अपनी बुनाई और कारीगरी के लिए विश्व प्रसिद्ध हैं, जो अहिल्याबाई के संरक्षण का परिणाम हैं।

अहिल्याबाई ने वन्य उत्पादों, जैसे शहद और जड़ी-बूटियों के लिए बाजारों का विकास किया। विशेष रूप से, मालवा क्षेत्र के आदिवासी समुदायों को शहद उत्पादन और जड़ी-बूटी संग्रहण में प्रशिक्षित किया गया। उन्होंने इन उत्पादों के लिए स्थानीय और बाहरी बाजारों का निर्माण किया, जिससे आदिवासी समुदायों को अतिरिक्त आय का स्रोत मिला। इस कदम से न केवल वन्य उत्पादों का संरक्षण हुआ, बल्कि आदिवासियों के जीवन स्तर में भी सुधार हुआ।

धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहर का संरक्षण

अहिल्याबाई होलकर केवल एक कुशल प्रशासक और समाज सुधारक ही नहीं, बल्कि एक धार्मिक और सांस्कृतिक संरक्षणकर्ता भी थीं। उन्होंने धार्मिक ग्रंथों और पुस्तकों का संरक्षण किया और समाज में विद्वानों को विशेष सम्मान दिया। उनके शासनकाल में धार्मिक और सांस्कृतिक चर्चाओं का आयोजन होता था, जिसमें विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ भाग लेते थे। अहिल्याबाई ने इन विद्वानों को न केवल अपने दरबार में आमंत्रित किया बल्कि उनकी सेवाओं का उचित सम्मान भी किया। उनके संग्रह में ‘श्रीधरी’, ‘गीता गोविंद’, ‘ज्ञानेश्वरी’ जैसी महत्वपूर्ण धार्मिक पुस्तकें शामिल थीं, जिनकी प्रतिलिपियां बनवाकर उन्होंने ज्ञान के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया।

अहिल्याबाई ने कुंभ मेले और अन्य धार्मिक उत्सवों को प्रोत्साहन दिया, ताकि भारतीय संस्कृति और परंपराओं को सहेजा जा सके। उन्होंने इन आयोजनों के लिए वित्तीय सहायता प्रदान की और साधु-संतों को विशेष मान्यता दी। इससे धार्मिक गतिविधियों को एक नया आयाम मिला और समाज में धर्म और संस्कृति के प्रति जागरूकता बढ़ी।

बुनियादी ढांचे का विकास

अहिल्याबाई के शासन में बुनियादी ढांचे के विकास पर विशेष ध्यान दिया गया। उन्होंने न केवल अपने राज्य में बल्कि पूरे भारत में मंदिरों, घाटों, कुओं और जलाशयों का निर्माण और पुनर्निर्माण किया। उनके कार्य उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में हैदराबाद तक और पश्चिम में सोमनाथ से लेकर पूर्व में बंगाल तक फैले हुए थे। उनके द्वारा किए गए धार्मिक स्थलों के पुनर्निर्माण कार्यों में अयोध्या, वाराणसी, मथुरा, चार धाम, पुरी और यहां तक कि नेपाल का पशुपतिनाथ मंदिर भी शामिल है।

1777 ई. में अहिल्याबाई होलकर ने वाराणसी स्थित काशी विश्वनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया, जो औरंगजेब के समय नष्ट कर दिया गया था। वाराणसी में उन्होंने प्रसिद्ध घाटों में से एक, अहिल्याघाट का निर्माण करवाया। यह घाट आज भी उनके योगदान की याद दिलाता है। सोमनाथ मंदिर, जिसे बार-बार आक्रमणों में ध्वस्त किया गया था, का पुनर्निर्माण भी अहिल्याबाई ने करवाया। उन्होंने मथुरा और वृंदावन में भी कई मंदिरों का पुनर्निर्माण करवाया, जो उस समय के धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्र थे।
उन्होंने बंगाल के कर्मनाशिनी नदी पर एक पुल का निर्माण किया, जो इस बात का प्रमाण है कि उन्होंने प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण और समाज के व्यापक हित में काम किया। इस पुल का मुख्य उद्देश्य नदी के पानी को गांवों में घुसने और नुकसान पहुंचाने से रोकना था। उनकी यह दूरदर्शिता बुनियादी ढांचे के विकास के माध्यम से धर्म और संस्कृति के पुनरुत्थान में भी परिलक्षित होती है।

महिलाओं के उत्थान के सार्थक प्रयास

अहिल्याबाई ने महिलाओं के उत्थान के लिए भी विशेष प्रयास किए। उनका शासन एक ऐसे समय में हुआ जब समाज में महिलाओं को सीमित अधिकार मिलते थे, लेकिन उन्होंने न केवल उन सीमाओं को तोड़ा, बल्कि एक नए युग की शुरुआत की। उनके योगदान आज भी भारतीय समाज में गहरे रूप से अंकित हैं। उन्होंने महिलाओं को आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित किया, विशेषकर आदिवासी महिलाओं को। महेश्वरी साड़ियों का उत्पादन और महिलाओं को रोजगार देने की पहल उनके द्वारा महिलाओं के सशक्तीकरण के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण कदम था।

विधवाओं के पुनर्विवाह को लेकर कठोर मान्यताएं थीं, लेकिन अहिल्याबाई ने विधवा पुनर्विवाह का समर्थन किया। उन्होंने अपने दरबार में यह नीति लागू की कि विधवाओं को पुनर्विवाह का अधिकार हो और उन्हें समाज में सम्मानपूर्वक स्थान मिले। अहिल्याबाई ने विधवा महिलाओं के लिए आश्रय गृहों का निर्माण किया, जहां वे सम्मानपूर्वक जीवन बिता सकें। इन आश्रयों में महिलाओं को जीवनयापन के साधन भी उपलब्ध कराए गए। अहिल्याबाई ने महिलाओं को प्रशासनिक कार्यों में शामिल किया और उन्हें अपने दरबार में न्यायिक मामलों की सुनवाई के लिए अवसर प्रदान किया। इससे महिलाओं की राजनीतिक सहभागिता बढ़ी और वे समाज में निर्णायक भूमिकाएं निभाने लगीं।

अहिल्याबाई के शासनकाल में महिलाओं को न केवल आर्थिक सशक्तीकरण मिला, बल्कि सामाजिक सम्मान भी प्राप्त हुआ। उनके इस कदम ने महिलाओं को सामाजिक ढांचे में एक महत्वपूर्ण स्थान दिलाया।

कर प्रणाली में सुधार से जनकल्याण

अहिल्याबाई ने अपनी कर प्रणाली को भी सुधारने का काम किया। उन्होंने राज्य के संसाधनों का उचित उपयोग करते हुए करों का संग्रहण किया, जिससे राज्य की अर्थव्यवस्था मजबूत हुई। अहिल्याबाई ने किसानों से कर वसूलने के लिए एक लचीली प्रणाली लागू की। यह प्रणाली फसल उत्पादन के आधार पर कर तय करती थी, जिससे बुरे मौसम या फसल की खराबी के कारण किसान आर्थिक संकट में न आएं। इससे किसानों को अपने उत्पादन के अनुसार ही कर देना पड़ता था, जो एक न्यायसंगत प्रणाली थी। व्यापार पर लगने वाले करों को न्यूनतम स्तर पर रखा, ताकि व्यापारी आसानी से व्यापार कर सकें। कर संग्रहण की प्रणाली को इस प्रकार व्यवस्थित किया गया कि किसान आत्मनिर्भर बन सकें और राज्य को भी कर के रूप में उचित राजस्व मिल सके।

व्यापक राष्ट्र-धर्म का दृष्टिकोण

अहिल्याबाई होलकर का व्यापक राष्ट्र-धर्म का दृष्टिकोण उनके शासनकाल का एक अनूठा और प्रेरणादायक पहलू था। उन्होंने अपने शासन को केवल एक राज्य की सीमाओं तक सीमित नहीं रखा, बल्कि सम्पूर्ण राष्ट्र और धर्म के उत्थान के लिए कार्य किया। उनका यह दृष्टिकोण उस समय के लिए अत्यंत दूरदर्शी और व्यापक था, क्योंकि उन्होंने समाज, धर्म, संस्कृति और लोक कल्याण के क्षेत्र में सुधार किए जो न केवल उनके राज्य के लिए बल्कि पूरे भारतवर्ष के लिए लाभकारी सिद्ध हुए।

अहिल्याबाई होलकर ने यह विश्वास किया कि धर्म और राष्ट्र का आपस में गहरा संबंध है। उनका मानना था कि धर्म का पालन केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि वह समाज के नैतिक और सांस्कृतिक निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाए। उन्होंने इस दृष्टिकोण को अपने शासनकाल में लागू किया और धर्म एवं राष्ट्र को एक साथ आगे बढ़ाने का प्रयास किया। अहिल्याबाई के राष्ट्र-धर्म के दृष्टिकोण में व्यापार और उद्योग को भी एक महत्वपूर्ण स्थान दिया गया। उनका मानना था कि राष्ट्र की उन्नति के लिए आर्थिक विकास आवश्यक है और इसके लिए उन्होंने व्यापार, उद्योग और कृषि के विकास पर विशेष ध्यान दिया।

अहिल्याबाई होलकर का जीवन और कार्य भारतीय इतिहास के पन्नों में एक अद्वितीय स्थान रखते हैं। उन्होंने अपने 30 वर्षों के शासनकाल में न केवल अपने राज्य का कुशल संचालन किया, बल्कि संपूर्ण भारत के सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक पुनरुत्थान के लिए अभूतपूर्व योगदान दिया। उनकी लोकसेवा और प्रशासनिक क्षमता आज भी प्रेरणा का स्रोत है।

लोकमाता अहिल्याबाई होलकर का जीवन एक संदेश है कि सच्ची सेवा और राष्ट्र निर्माण के लिए व्यक्ति को न केवल व्यक्तिगत और राज्य हित की सोच से ऊपर उठना चाहिए, बल्कि सम्पूर्ण मानवता के कल्याण की दिशा में कार्य करना चाहिए। उनके कार्य और योगदान आज भी भारतीय समाज में गहराई से बसे हुए हैं। अहिल्याबाई भारतीय इतिहास की अमूल्य धरोहर हैं और श्री नरेन्द्र मोदी के शासनकाल में हो रही देश की प्रगति और जनकल्याण माता अहिल्याबाई को एक सच्ची आदरांजलि है।

(लेखक भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री व सांसद हैं)