मन्त्राणां मातृका देवी शब्दानां ज्ञानरूपिणी
ज्ञानानां चिन्मयातीता शून्यानां शून्यसाक्षिणी
यस्याः परतरं नास्ति सैषा दुर्गा प्रकीर्तिता
(बृहदारण्यक उपनिषद्)
दुर्गा पूजा भारत का एक महत्वपूर्ण त्योहार है जो हिंदू देवी दुर्गा के विभिन्न अवतारों का सम्मान करता है। मां दुर्गा शक्ति का प्रतीक हैं और दिव्य नारीवाद का गौरवशाली प्रतिनिधित्व करती हैं। दुर्गा पूजा समाज में महिलाओं के प्रति सम्मान, मान्यता और प्रेम व्यक्त करने का अवसर प्रदान करता है या हम ये कह सकते हैं कि दुर्गा पूजा समाज में महिलाओं के प्रति सम्मान और प्रेम का प्रतीक है। दुर्गा पूजा शक्ति के साहस और सहनशक्ति पर प्रकाश डालती है, जो अंततः महिलाओं की ताकत को दर्शाती है। मां
देवी अहिल्याबाई के आदर्श आज भी प्रासंगिक हैं और भारतीय समाज के वर्तमान मानकों को परिभाषित करने और आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। सामाजिक न्याय और नेतृत्व के प्रति उनकी प्रतिबद्धता ने समकालीन भारत में महिलाओं के अधिकारों को समझने और आगे बढ़ाने के लिए एक मजबूत आधार तैयार किया है
शक्ति के संदर्भ में देवी अहिल्याबाई को याद करना अत्यंत सुखद होगा। वह सच्ची शक्ति का उज्ज्वल उदाहरण हैं और 21वीं सदी में नारी सशक्तीकरण का एक प्रकाशमान उदाहरण हैं। भारत ने वर्ष 2024 में देवी अहिल्याबाई की 300वीं जयंती मनाई। हम भारत के इतिहास में उनकी महानता और शोहरत को महसूस कर सकते हैं। उनका गौरवपूर्ण जीवनचरित्र नैतिकता, साहस और नेतृत्व का प्रतीक है। देवी अहिल्याबाई ने सनातन धर्म के उत्थान में महत्वपूर्ण योगदान दिया। हक़ीक़त में, उन्होंने भारत की समृद्ध ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को आकार देने में गहरा प्रभाव डाला।
भारतीय इतिहास की धारा को आकार देने में शक्ति
देवी अहिल्याबाई होल्कर का जन्म 1725 में एक छोटे से गांव चोंडी में हुआ था। उन्होंने बहुत कम उम्र में ही भारतीय समाज की कठोरता का सामना किया। सिर्फ 8 वर्ष की आयु में 1733 में, उनका विवाह खांडेराव होल्कर से हुआ। 1754 में केवल 29 वर्ष की उम्र में ही वे विधवा हो गईं। उन्होंने इन कठिन परिस्थितियों का डटकर सामना किया और आखिरकार उन्हें कामयाबी हासिल हुई। उन्हें शक्ति की संज्ञा दी जा सकती है, क्योंकि उन्होंने उस समय के भारतीय समाज की सामाजिक चुनौतियों से डटकर मुकाबला किया था। देवी अहिल्याबाई ने उस ज़माने में प्रशासनिक और सैन्य प्रशिक्षण भी हासिल किया था। उनके परिवार ने उनकी शिक्षा में पूरा सहयोग दिया। उन्होंने 1767 में मध्य भारत के मालवा राज्य का शासन प्राप्त किया। मालवा पर उनका शासन भारत के विभिन्न क्षेत्रों में वास्तविक प्रगति का प्रतीक रहा। भारतीय आधारभूत संरचना, कला, शिक्षा आदि उनके नेतृत्व में काफी फली-फूली। वे सच्चे नेतृत्व की मिसाल थीं। उन्होंने समाज कल्याण के लिए बहुत से कार्य किए और वाणिज्य के क्षेत्र में भी उनका योगदान अत्यंत महत्त्वपूर्ण रहा।
नारीवाद की एक जीवित किंवदंती
देवी अहिल्याबाई के आदर्श आज भी प्रासंगिक हैं और भारतीय समाज के वर्तमान मानकों को परिभाषित करने और आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। सामाजिक न्याय और नेतृत्व के प्रति उनकी प्रतिबद्धता ने समकालीन भारत में महिलाओं के अधिकारों को समझने और आगे बढ़ाने के लिए एक मजबूत आधार तैयार किया है। देवी अहिल्याबाई देवी शक्ति का सच्चा स्वरूप थीं। देवी शक्ति और अहिल्याबाई नारी शक्ति के दो रूपों का प्रतिनिधित्व करती हैं। देवी शक्ति जहां आध्यात्मिक स्वरूप में इस शक्ति का दर्शन कराती हैं, वहीं अहिल्याबाई सेवा और नेतृत्व के माध्यम से इसे जीवन में चरितार्थ करती हैं।
देवी अहिल्याबाई की धर्म के प्रति निष्ठा और धार्मिकता ने उनके व्यक्तित्व और शासन को परिभाषित किया। देवी अहिल्याबाई गहन नैतिकता और न्याय के प्रति समर्पण के साथ नेतृत्व में विश्वास करती थीं। उन्होंने नैतिक सिद्धांतों के आधार पर शासन किया और अपने नागरिकों के कल्याण को सबसे ऊपर रखा। वह न्यायपूर्ण शासन में पूर्ण विश्वास रखती थीं।
देवी अहिल्याबाई का सनातन धर्म में योगदान
देवी अहिल्याबाई असाधारण थीं और उनके उत्कृष्ट शासन के लिए उन्हें आज भी याद किया जाता है। वह एक धर्मनिष्ठ हिंदू थीं। उन्होंने भारत में कई घाटों के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया और मंदिरों का निर्माण भी किया। देवी अहिल्याबाई का हृदय भगवान शिव के प्रति पूर्णतः समर्पित था। अपने शासनकाल के दौरान उन्होंने कई शिव मंदिरों के पुनर्निर्माण और निर्माण पर विशेष ध्यान दिया।
देवी अहिल्याबाई अपने राज्य में अनेक यज्ञों में सम्मिलित होती थीं। भारतीय इतिहास ने मुग़ल सम्राट औरंगज़ेब के शासनकाल के दौरान अत्यधिक विनाश का सामना किया। उन विनाशकारी वर्षों के पश्चात् देवी अहिल्याबाई ही थीं जिन्होंने ध्वस्त ढांचों के पुनर्निर्माण और पुनर्सृजन की जिम्मेदारी अपने कंधों पर ली। देवी अहिल्याबाई के नेतृत्व में 1780 में काशी विश्वनाथ मंदिर, वाराणसी के पुनर्निर्माण का कार्य किया गया। वर्ष 1783 में उन्होंने महेश्वर मंदिर और सोमनाथ मंदिर के निर्माण की भी ज़िम्मेदारी संभाली। देवी अहिल्याबाई ने 1787 में बिहार स्थित विष्णुपद मंदिर, गया का पुनर्निर्माण कराया। ऐसा कहा जाता है कि अहिल्याबाई होल्कर ने रामेश्वरम, गया, द्वारका, ओंकारेश्वर और बद्रीनाथ के प्रसिद्ध घाटों के पुनर्निर्माण में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया।
उन्होंने यात्रियों के लिए धर्मशालाओं का निर्माण किया, जिससे उनके यात्रा अनुभव को बेहतर बनाया जा सके। 18वीं शताब्दी के दौरान उनके शासनकाल में यात्रियों ने बुनियादी ढांचे में हुए महत्वपूर्ण परिवर्तनों का प्रत्यक्ष अनुभव किया। इसके अतिरिक्त उन्होंने धर्मशालाओं के लिए भंडारण सुविधाओं का भी

देवी अहिल्याबाई का व्यक्तित्व एक साहसी और दृढ़ नारी नेता के रूप में पहचाना जाता है। ऐसा नेतृत्व शुद्ध शक्ति, अटूट संकल्प और अपनी प्रजा के प्रति पूर्ण समर्पण का प्रतीक है। इसमें कोई शक नहीं कि वे आज भी भारत में हजारों और लाखों लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी हुई हैं
विकास कराया जिससे तीर्थ स्थलों पर यात्रियों के ठहरने की व्यवस्था और अधिक सुगम हो गई। मालवा पर उनका शासन उनकी संस्कृति और आस्था का उदाहरण है। वह एक साहसी और महान नेता थीं। उन्होंने अपने राज्य में नैतिक मूल्यों को बनाए रखा। उनके शासनकाल के दौरान उनके दार्शनिक विचार उनकी प्रामाणिक हिंदू आस्था और उसके प्रति उनके योगदान को प्रदर्शित करते हैं।
भारत का सामाजिक कल्याण
देवी अहिल्याबाई ने समाज के लोगों के विकास में अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनका मुख्य लक्ष्य राज्य के कल्याण और समृद्धि को बढ़ाना था। वह समाज में फैली अन्यायों के खिलाफ कठोर थीं, जो उन दिनों असाधारण रूप से प्रचलित थे। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि उनके द्वारा निर्मित घाटों और धर्मशालाओं तक सभी लोगों की सहज पहुंच हो। उन्होंने भारतीय महिलाओं और बच्चों के विकास और उन्नति में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
महिला सशक्तीकरण
देवी अहिल्याबाई एक विशिष्ट महिला व्यक्तित्व थीं और शक्ति, वीरता, मानवतावाद और समर्पण का प्रत्यक्ष उदाहरण थीं। उनके मालवा के शासनकाल ने उनके उत्कृष्ट गुणों को उजागर किया, जिसमें कुशल कर व्यवस्था, रेशम बुनाई उद्योग का विकास और अनेक सामाजिक सुधार शामिल थे। वह वास्तव में एक अद्भुत नेता और शासिका थीं। उन्होंने साहस का परिचय दिया, लेकिन साथ ही साथ उनके भीतर गहरी सहानुभूति भी थी। उन्होंने अपने राज्य के लोगों के प्रति करुणा और सच्ची देखभाल का प्रदर्शन किया। उस समय के संदर्भ में वह एक आधुनिक दृष्टिकोण रखती थीं। उन्हें एक सच्चे उदारवादी नारी व्यक्तित्व के रूप में वर्णित किया जा सकता है। उन्होंने कला, संस्कृति और शिक्षा के क्षेत्र में बहुत बड़ा योगदान दिया।
देवी अहिल्याबाई का व्यक्तित्व एक साहसी और दृढ़ नारी नेता के रूप में पहचाना जाता है। ऐसा नेतृत्व शुद्ध शक्ति, अटूट संकल्प और अपनी प्रजा के प्रति पूर्ण समर्पण का प्रतीक है। इसमें कोई शक नहीं कि वे आज भी भारत में हजारों और लाखों लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी हुई हैं। देवी अहिल्याबाई और देवी शक्ति नारी सशक्तीकरण की महत्वपूर्ण प्रतीक हैं। दोनों महिलाओं के साहस और दृढ़ संकल्प का प्रतिनिधित्व करती हैं। देवी अहिल्याबाई वास्तव में सच्ची शक्ति थीं, जिन्होंने सामाजिक मानदंडों को परिभाषित करने और आधुनिक भारतीय समाज के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
(लेखक राज्यसभा सदस्य हैं)

