चिरप्रासंगिक है ‘लोकमाता’ अहिल्याबाई की श्रेष्ठ सुरक्षा नीति

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    भारत के सांस्कृतिक और राजनीतिक इतिहास की ओर जब हम दृष्टिपात करते हैं तो हमें एक नई दृष्टि मिलती है। साथ ही एक समृद्ध, नवोन्मेषी दूरदृष्टि से सम्पन्न दिशाबोध मिलता है। भारत वर्ष के अतीत का जब हम सिंहावलोकन करते हैं तो शौर्य, पराक्रम, साहस से भरी वीरता की असंख्य गाथाएं मिलती हैं। यद्यपि भारत का इतिहास कई सारे उतार-चढ़ावों का रहा है। समय-समय पर राष्ट्र के विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग राजवंशों का शासन रहा है। उनके मध्य राज्य को लेकर पारस्परिक संघर्ष और युद्धों का क्रम चलता रहा है। किन्तु इन सबके बीच भारतीय राजवंशों में सांस्कृतिक एकता और राष्ट्रीयता के मूल्यों को लेकर एकात्मता से परिपूर्ण अखिल भारतीय दृष्टि रही है। शूरवीर प्रतापी राजाओं के साथ-साथ भारत की वीरांगना महारानियों ने भी शासन और सत्ता की बागडोर अपने हाथों में ली। फिर एक नया इतिहास रचा।

देवी अहिल्याबाई इन्दौर राजवंश की एक ऐसी कुशल साम्राज्ञी जिन्होंने अपनी धर्मनिष्ठा, कर्त्तव्यपारायणता, नीति, धर्म, न्याय, सुशासन, दूरदर्शितापूर्ण निर्णयों और कार्यों से इतिहास का एक नवीन अध्याय लिखा। वे प्रजाहितैषी, लोकमङ्गलकारी शासन करने, युद्धनीति, कूटनीतिक चातुर्य, रणनीतिक कौशल में निपुण और भली-भांति दक्ष थीं

भारत की उन्हीं वीरांगना नारीशक्ति का प्रतिनिधित्व करती हैं ‘लोकमाता’ पुण्य श्लोक देवी अहिल्याबाई होलकर। उनकी जन्मभूमि महाराष्ट्र रही, किन्तु उनकी कर्मभूमि के रूप में महेश्वर एवं इन्दौर समेत समूचा भारतवर्ष रहा। देवी अहिल्याबाई इन्दौर राजवंश की एक ऐसी कुशल साम्राज्ञी जिन्होंने अपनी धर्मनिष्ठा, कर्त्तव्यपारायणता, नीति, धर्म, न्याय, सुशासन, दूरदर्शितापूर्ण निर्णयों और कार्यों से इतिहास का एक नवीन अध्याय लिखा। वे प्रजाहितैषी, लोकमङ्गलकारी शासन करने, युद्धनीति, कूटनीतिक चातुर्य, रणनीतिक कौशल में निपुण और भली-भांति दक्ष थीं। त्याग, तप, वीरता, साहस और बलिदान जैसे विशेषण उनकी महिमा में कम पड़ते हैं। यद्यपि उनके शासनकाल का कालखंड 1767 से 1795 ईस्वी सन् के मध्य का ही था, लेकिन उनकी दूरदृष्टि आधुनिकता के तथाकथित वर्तमान मापदंडों पर भारी पड़ती है। विपरीत से विपरीत परिस्थितियों और जीवन को ध्वंस में परिवर्तित कर देने वाले घटनाक्रम भी लोकमाता अहिल्याबाई को उनके ध्येय पथ से पृथक नहीं कर पाए। एक ऐसी नारी जिसके पति युद्ध में वीरगति को प्राप्त हो गए हों, वैधव्य का महासंकट आ गया हो, पिता समान श्वसुर वृद्ध हो चले हों, राज्य पर बाह्य शत्रुओं और आंतरिक उपद्रवियों के आतंक का साया मंडरा रहा हो; उस बीच लोकमाता अहिल्याबाई भगवान शिव को राज्य समर्पित कर राजसिंहासन में आरुढ़ होती हैं। वे सर्वदा यही कहती थीं कि– “मैं भगवान शिव की आज्ञा से राज्य को संचालित कर रही हूं।” फिर उन्होंने यहां से सत्ता की कमान जब अपने हाथों में ली तो आजीवन एक श्रेष्ठ वीरांगना की भांति कुशल राज्य संचालन का आदर्श समाज के समक्ष प्रस्तुत किया। अपने न्यायप्रिय, धर्मप्रिय शासन संचालन में उन्होंने देश भर में ख्याति अर्जित की। उनकी धर्मनिष्ठा के चलते ही उन्हें ‘पुण्यश्लोक’ अर्थात् श्लोक के समान पुण्य और ‘लोकमाता’, देवी जैसी उपमाओं से जाना जाने लगा। किसी भी शासक के लिए जब जनता में समर्पण और विश्वास के ऐसे भाव निर्मित हो जाएं तो यह अपने आप में अद्वितीय होता है। अपनी अखिल भारतीय दृष्टि के साथ उन्होंने प्रजाहित, राष्ट्रहित में कार्य किए जो सर्वदा चिरस्मरणीय और अनुकरणीय हैं। किन्तु कोई भी राज्य कैसे श्रेष्ठ राज्य बनेगा? शासन तन्त्र कैसे सुव्यवस्थित ढंग से चलेगा? प्रजा में शांति हो और सब समृद्धि के रास्ते पर गतिमान बने रहें। इसके लिए उस राज्य की स्पष्ट और सशक्त ‘सुरक्षा नीति’ का होना अनिवार्य हो जाता है। लोकमाता अहिल्याबाई अपने शासन तन्त्र को सुरक्षित अभेद्य और अपराजेय बना पाने में इसीलिए सफल हुईं, क्योंकि उन्होंने राज्य की बाह्य और आंतरिक शत्रुओं से रक्षा करने के लिए ऐसे प्रत्येक कार्य किए जो आवश्यक थे।

वे अपने समय से काफी आगे का विचार लेकर चल रही थीं। उनके रणनीतिक कौशल और कूटनीतिक चातुर्य से जुड़ा हुआ एक स्मरणीय महत्वपूर्ण प्रसंग है। प्रसंग इस प्रकार है कि इधर अहिल्याबाई क्रमशः पति, श्वसुर और बेटे की मृत्यु से दु:खी और विचलित चल रही थीं। उधर राज्य के ही विद्रोही तत्व बाह्य शत्रुओं को आक्रमण करने का न्यौता दे रहे थे। गंगोबा तात्या ने पेशवा माधवराव के चाचा रघुनाथराव यानी राघोबा को महेश्वर पर आक्रमण करने के लिए आमंत्रित किया। अहिल्याबाई को जैसे ही गंगोबा के इस षड्यंत्र की भनक लगी, उन्होंने मन ही में अपनी अलग रणनीति का खाका तैयार कर लिया। उन्होंने होलकर शासन के विश्वासपात्रों में से एक सरदार महादजी शिंदे और तुकोजी होलकर को मदद के लिए पत्र भेजा। वे दोनों अहिल्याबाई की सहायता के लिए महेश्वर की ओर आने लगे। वहीं, दूसरी ओर अहिल्याबाई ने राघोबा को पत्र लिखा। इसमें उन्होंने कहा कि वे अपने राज्य की रक्षा के लिए महिला सेना के साथ युद्ध के लिए तैयार हैं। अपनी अंतिम सांस तक वे राज्य के लिए युद्ध करेंगी, किन्तु यदि राघोबा आप महिला सेना से हार गए तो यह आपके लिए अपमानजनक होगा। चारों ओर आपका अपयश होगा। इसके बाद भी राघोबा महेश्वर पर आक्रमण करने के लिए क्षिप्रा नदी के समीप आ पहुंचे। इसी बीच तुकोजी होलकर का अहिल्याबाई के पक्ष में राघोबा को चेतावनी भरा पत्र मिला। इससे राघोबा घबरा गए और युद्ध किए बिना ही वापस लौट चले।

इस प्रसंग में लोकमाता अहिल्याबाई की त्वरित निर्णयन शक्ति, दूरदर्शिता और कुशल समन्वय प्रबंधन की स्पष्ट झलक मिलती है। उन्होंने अपने मन में जो व्यूह बना रखा था, उस अनुरूप बिना युद्ध के ही अपने शत्रु को परास्त कर दिया। उसे वापस लौटने के लिए विवश कर दिया। कूटनीतिक चातुर्य का यह रणनीतिक कौशल अपने आप में विरला था। अहिल्याबाई ने उस समय महिलाओं को सैन्य सेवा से जोड़ा जब इसके बारे में कोई कल्पना नहीं कर पाता था। उन्होंने महिलाओं की सभी क्षेत्रों की भांति सुरक्षा के क्षेत्र में भी भागीदारी सुनिश्चित करने का भगीरथ कार्य किया। उन्होंने महिलाओं की सेना तैयार की। उनके सैन्य प्रशिक्षण के समुचित प्रबंध किए। महिलाओं को उन्होंने अस्त्र-शस्त्र चलाना सिखाया। युद्ध कौशल, रणनीति बनाने में पारंगत किया। ताकि किसी भी स्थिति परिस्थिति में पुरुष सैनिकों की भांति महिलाएं भी युद्ध आदि में भाग ले सकें।

इसी प्रकार अपनी सेना को आधुनिक बनाने और हथियारों में आत्मनिर्भर बनाने, अपनी तकनीक के साथ हथियार निर्माण की भी महत्वपूर्ण पहल की। 17वीं-18वीं सदी के मध्य के अपने शासन के दौरान उन्होंने अपनी सेना के लिए– छोटी, बड़ी और मध्यम आकार की तोपें तैयार करवाई। तोप के गोले और बंदूकों के गोले आदि का बारीकी के साथ निर्माण करवाया। इसके साथ ही लोकमाता अहिल्याबाई ने विशेष प्रकार के धनुष, तीर, भाले, ढाल और तत्कालीन समय की आवश्यकतानुसार उत्कृष्ट युद्ध सामग्रियों का निर्माण करवाया। उन्होंने सेना को समय के साथ क्रियाशील और आधुनिक बनाने पर विशेष बल दिया। इतना ही नहीं, अहिल्याबाई अपनी सेना का विशेष ध्यान रखती थीं। माता के समान प्रजापालन करने वाली अहिल्याबाई सैनिकों के सुख-दु:ख और उनकी उन्नति का भरसक प्रयत्न करती थीं। इसी कड़ी में वे शौर्यपूर्ण काम करने वाले राज्य के कर्मठ स्वामिभक्त सैनिकों का सार्वजनिक तौर पर सम्मान करती थीं। उत्कृष्ट और विशेष सेवाएं देने वाले सैनिकों को पुरस्कृत कर सेना का मनोबल बढ़ाती थीं। इससे सैनिकों में अपने कार्य के प्रति स्वस्थ प्रतिस्पर्धा स्वमेव निर्मित हो जाती थी।

एक उत्कृष्ट शासक-प्रशासक का उत्कृष्ट गुण ये भी होता है कि वह प्रत्येक समय, परिस्थिति और घटनाक्रम को अपने पक्ष में करने में कुशल और पारंगत हो‌। अहिल्याबाई तो इस मामले में सिद्धहस्त ही थीं। उनकी विरली दृष्टि का कोई सानी नहीं था। वे राज्य को बाह्य आक्रमणों और आंतरिक उपद्रवों से बचाने की रणनीति बनाने में कुशल प्रवीण थीं। जहां उन्होंने सेना को सशक्त, सर्वसमर्थ और आत्मनिर्भर बनाने की ओर विशेष काम किया। वहीं दूसरी ओर, आंतरिक उपद्रवों और समस्याओं के हल के लिए भी अपनी मौलिक सोच को परिणाम में परिवर्तित करने में सफल हुईं। उनके शासनकाल से जुड़ा हुआ दूसरा प्रसंग है कि भील जनजाति के लोग उस समय हिंसा, लूट-पाट करते थे। इससे राज्य संचालन में बाधा आती थी। प्रजा में अशांति की स्थिति उत्पन्न हो रही थी। अतएव इस समस्या के दीर्घकालिक समाधान के लिए अहिल्याबाई ने अनूठी पहल की। उन्होंने भील जनजाति के लोगों को समझाया व सुझाव दिया और उन्हें कृषि और अन्य व्यवसायों से जोड़कर मुख्यधारा में लाने का महत्वपूर्ण काम किया। ठीक इसी प्रकार से उन्होंने राज्य में चोर, डाकुओं के आतंक से मुक्ति पाने के लिए भी एक विशेष घोषणा की। लोकमाता अहिल्याबाई ने घोषणा की कि जो व्यक्ति राज्य से डाकुओं को समाप्त कर देगा, उससे वे अपनी पुत्री मुक्ताबाई का विवाह कर देंगी। उनकी घोषणा के बाद उनके ही राज्य के एक वीर प्रतापी यशवंत राव फणसे ने यह कर दिखाया। फिर अहिल्याबाई ने भी अपना वचन निभाते हुए यशवंत राव फणसे और मुक्ताबाई का विवाह संपन्न कराया।

पुण्यश्लोक देवी अहिल्याबाई के जीवन से जुड़े हुए इन प्रसंगों से यही संदेश मिलता है कि उन्होंने अपनी बुद्धिमत्ता के साथ राज्य की सुरक्षा के लिए विविध मौलिक उपाय किए। नवाचारों के साथ राज्य की बाह्य और आंतरिक सुरक्षा सुनिश्चित की। राज्य की सुख शांति और समृद्धि को रोकने वाले यदि कोई अवरोध आए तो उन्होंने उन अवरोधों का शमन किया। नवीन पथ की ओर कदम बढ़ाए और प्रजा को शांतिपूर्ण वातावरण प्रदान किया। किसी भी राज्य की सुरक्षा नीति के लिए एक और महत्वपूर्ण कदम आवश्यक होता है, वह यह कि पड़ोसी और अन्य राज्यों से मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध हों। लोकमाता अहिल्याबाई ने होलकर शासन के पुराने सहयोगियों के साथ-साथ लगभग सभी पड़ोसी राज्यों से मधुर संबंध स्थापित किए थे। देश भर के विभिन्न राज्यों में देवी अहिल्याबाई की विशिष्ट कार्यशैली के चलते उनका विशेष सम्मान था‌।

यह उनकी उसी दूरदर्शी सोच का सुफल था कि उनके राज्य की चहुंओर कीर्ति थी। सुराज और ‘स्व’ आधारित उनके उत्कृष्ट शासन की गूंज चारों ओर गुञ्जित हो रही थी। 13 अगस्त, 1795 ईस्वी सन् को लोकमाता ने अपने देवी स्वरूप की दिव्य देह का त्याग कर महाप्रस्थान की अनंत यात्रा पर निकल गईं। किन्तु उन्होंने अपने विराट, सर्वदा अनुकरणीय व्यक्तित्व और कृतित्व से शासन संचालन और उत्कृष्ट समाज की सरंचना के आदर्श सौंपे। उन्होंने यह सिद्ध किया कि भारतीय समाज की नारी का आदर्श क्या होना चाहिए? साथ ही उन्होंने बतलाया कि भारत की नारीशक्ति जब अपने संकल्पों को साकार करती है तो वह लोक में पुण्यश्लोक और देवी के रूप में पूजी जाती है। उनके कार्य और विचार भारत के रग-रग में तब-तक प्रवाहित होते रहेंगे, जब-तक भारत का अस्तित्व है। उनकी सुरक्षा नीति से लेकर विविध क्षेत्रों में उनके द्वारा सम्पन्न कार्य वर्तमान ही नहीं, बल्कि भावी भारत को गढ़ने का अमृत संदेश देते हैं। लोकमाता अहिल्याबाई का युगबोध-दिशाबोध के दर्शन नवचैतन्यता का सूत्रपात करते हैं और विश्वगुरु भारत के मूल अधिष्ठान की ओर बढ़ने का पथ प्रशस्त करते हैं।

(लेखक साहित्यकार एवं पत्रकार हैं)