मैं जब भी द्रास जाता हूं और टाइगर हिल की ऊंचाइयों को देखता हूं, तो ऐसा लगता है मानो समय वहीं ठहर गया हो, जहां हमारे जवानों ने दुर्गम पहाड़ियों पर मातृभूमि की रक्षा में अपने प्राणों की आहुति दी थी। मैं वहां कई बार गया हूं, और हर बार जब उस धरती पर कदम रखता हूं, एक गहरी अनुभूति होती है, ऐसी अनुभूति जो न तो शब्दों में बंधती है, न ही भूलती है।
कारगिल का वह भयावह दृश्य आज भी स्मृतियों में जीवंत हो उठता है। दुर्गम, नुकीली, घने कोहरे में लिपटी सीधी खड़ी पहाड़ियां — जिन पर दुश्मन की ओर से आग उगलती तोपों और बरसती गोलियों की बौछार के बीच हमारे वीर जवानों ने अदम्य साहस के साथ चढ़ाई की। देश की अस्मिता, भारत माता की रक्षा के लिए उन्होंने अपने प्राणों की आहुति दी। जब भी इस विषय पर लेखनी उठाता हूं, मन मानो उन्हीं वीरभूमियों में विचरने लगता है। मुझे प्रतीत होता है कि मैं स्वयं उन चट्टानों, उन घाटियों और उन कठिन रास्तों से होकर गुजर रहा हूं जहां हमारे जवानों ने अपना रक्त बहाया। कारगिल की हर एक चोटी, हर एक पत्थर, हर एक कंकर, मानो शौर्य का प्रतीक बनकर खड़ा है। वहां की हवाओं में आज भी हमारे जवानों के बलिदान की गूंज है, जो भारत माता की महानता का गान करती हैं।
वहां के स्मारक पर अंकित 559 नाम सिर्फ शहीदों की सूची नहीं हैं, वो भारत मां के वीर सपूतों की अमर गाथाएं हैं। टाइगर हिल को देखते हुए मन में यह भाव आता है कि हमारे सैनिकों ने किन असंभव हालात में लड़ाई लड़ी, चोटियों पर चढ़ाई की और तिरंगा फहराया। वहां की हवा में एक अनकहा गुरुत्व है, जो चेतना को झकझोरता है, जो हर भारतीय को याद दिलाता है कि राष्ट्र की रक्षा केवल शब्दों से नहीं होती, बल्कि बलिदान की आखिरी सीमा तक जाने से होती है।
कारगिल विजय दिवस पर भारत 1999 के कारगिल युद्ध में हमारी सेनाओं की विजय का स्मरण करता है, यह दिन हमारे राष्ट्रीय इतिहास में गर्व से अंकित है। प्रत्येक वर्ष 26 जुलाई को प्रधानमंत्री नई दिल्ली स्थित अमर जवान ज्योति जैसे स्मारकों पर कारगिल के वीर शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए राष्ट्र की ओर से श्रद्धांजलि का नेतृत्व करते हैं। इस विजय के आज 26 वर्ष पूरे होने पर यह दिवस हमारे सैनिकों की वीरता और बलिदान की याद दिलाता है तथा प्रत्येक भारतीय के हृदय में एकता, गर्व और कृतज्ञता का संचार करता है।
कारगिल युद्ध असाधारण वीरता का एक अद्वितीय अध्याय था। पाकिस्तानी सेनाओं द्वारा चोरी-छिपे भारतीय क्षेत्र में घुसपैठ के बाद भारतीय सेना ने मई 1999 में उन घुसपैठियों को कारगिल की बर्फीली चोटियों से खदेड़ने के लिए ऑपरेशन विजय शुरू किया। दो महीनों से अधिक समय तक हमारे जवानों ने 16,000-18,000 फुट की ऊंचाई पर जमा देने वाली ठंड और दुर्गम पहाड़ी परिस्थितियों में भीषण लड़ाइयां लड़ीं। भारतीय वायुसेना ने भी ऑपरेशन सफेद सागर के तहत बर्फ से ढके पहाड़ों पर दुश्मन के ठिकानों को निशाना बनाया। भारत के 559 सैनिकों और अधिकारियों ने मातृभूमि की रक्षा में अपना सर्वोच्च बलिदान दिया। हमारे जवानों के साहस और दृढ़ संकल्प के बल पर सेना ने तोलोलिंग और टाइगर हिल जैसी महत्वपूर्ण चोटियों को दुश्मन के कब्जे से फिर मुक्त कराया। सचमुच, हमें अपने कई सपूत खोने पड़े, लेकिन दुश्मन को अपनी पवित्र भूमि का एक इंच टुकड़ा भी नहीं लेने दिया। राष्ट्र इन वीरों का सदैव ऋणी रहेगा, जिनकी असाधारण वीरता ने कठिनतम परिस्थितियों में भी हमारी संप्रभुता की रक्षा की।
कारगिल युद्ध से कुछ ही माह पहले पूर्व प्रधानमंत्री श्रद्धेय अटल बिहारी वाजपेयी बस लेकर लाहौर गए थे और वहां पाकिस्तान से स्थायी शांति की उम्मीद में दोस्ती का हाथ बढ़ाया था, लेकिन धोखेबाज पाकिस्तान ने इस सद्भावना का जवाब विश्वासघात से दिया – गुपचुप अपनी सेना को कारगिल की पहाड़ियों पर कब्जा जमाने भेज दिया, जिससे दोनों देशों के बीच हुए लाहौर समझौते का खुला उल्लंघन हुआ। वाजपेयी जी ने क्षोभ प्रकट करते हुए कहा था कि पाकिस्तान ने “लाहौर में समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद कारगिल में घुसपैठ करके भारत के साथ विश्वासघात किया।” फिर भी, पाकिस्तान की इस चाल का भारत ने तुरंत और दृढ़ उत्तर दिया। वाजपेयी जी ने हमारी सशस्त्र सेनाओं को मुंहतोड़ जवाब की पूरी छूट दी और साथ ही भारत के पक्ष में वैश्विक समर्थन जुटाया, एवं कारगिल युद्ध में भारत विजयी हुआ।
इस युद्ध ने पूरे भारत को अभूतपूर्व एकता के सूत्र में बांध दिया। पहाड़ों पर हमारे जवान बहादुरी से लड़ रहे थे और इधर देशभर के लोग उनके समर्थन में एकजुट हो गए। देशभक्ति की लहर सी आ गई – नागरिकों ने प्रार्थना सभाएं कीं, स्कूली बच्चों ने मोर्चे पर डटे सैनिकों को पत्र भेजे, और हजारों लोगों ने घायलों के लिए स्वेच्छा से रक्तदान किया। कारगिल के शहीदों के नाम हर जुबान पर थे; कई समुदायों ने उन वीरों के सम्मान में सड़कों, छात्रवृत्तियों और खेल प्रतियोगिताओं के नाम उनके नाम पर रखे। मोर्चे पर दिखा जवानों का साहस और जनता का अटूट संकल्प एक-दूसरे के पूरक थे। इससे स्पष्ट संदेश गया कि भारत की जनता अपनी सशस्त्र सेनाओं के साथ चट्टान की तरह खड़ी है।
राजनीतिक दृष्टि से भी कारगिल विजय ने दिखा दिया कि मज़बूत और निर्णायक नेतृत्व का कोई विकल्प नहीं है। भारतीय जनता पार्टी ने हमेशा भारत के राष्ट्रीय हितों की दृढ़ रक्षा को सर्वोपरि माना है – कारगिल युद्ध ने हमारी इस नीति को सही साबित किया। कुछ लोगों ने समय-समय पर नरम रुख अपनाने या अल्पकालिक शांति के लिए समझौता करने की बात कही, किंतु वाजपेयी जी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने स्पष्ट कर दिया कि आक्रमण का उत्तर दृढ़ प्रतिरोध से ही दिया जाएगा। देशहित के प्रति यही स्पष्टता और राष्ट्रवादी संकल्प – जो भाजपा के मूल सिद्धांतों में है – पाकिस्तान के विश्वासघात को भारत की जीत में बदलने में निर्णायक सिद्ध हुआ।
कारगिल की विरासत सिर्फ स्मरण तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने हमें एक नए संकल्प से भी भर दिया – एक मजबूत और सुरक्षित भारत के निर्माण का संकल्प। 2014 के बाद से प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने देश की रक्षा क्षमताओं को सुदृढ़ करने और हमारे सैनिकों का मान-सम्मान बढ़ाने को अपना लक्ष्य बना लिया है। दशकों से अटकी ‘वन रैंक, वन पेंशन’ जैसी योजना को आखिरकार लागू किया गया, जिससे पूर्व सैनिकों को न्याय मिला। सेनाओं में ऐतिहासिक सुधार, जैसे चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ का नया पद, किए गए हैं, ताकि हमारी सुरक्षा संरचना अधिक प्रभावी और समन्वित हो। हमारी सेनाओं को आधुनिक शस्त्रों और तकनीकों से लैस किया जा रहा है और सीमावर्ती बुनियादी ढांचे को इतना मजबूत बनाया गया है कि सेना किसी भी खतरे का मुंहतोड़ जवाब दे सके।
उतना ही महत्वपूर्ण यह कि जवानों के प्रति सम्मान का एक नया संस्कार स्थापित किया गया है। अब हर दिवाली प्रधानमंत्री अग्रिम चौकियों पर जाकर जवानों के साथ त्योहार मनाते हैं, वर्ष 2022 में प्रधानमंत्री मोदी जी ने कारगिल में जवानों संग दिवाली मनाई, यह संदेश देते हुए कि राष्ट्र हर पल अपने इन प्रहरियों के साथ खड़ा है। एक ऐतिहासिक पहल के तहत अंडमान-निकोबार के 21 द्वीपों को परमवीर चक्र विजेता वीरों, जिनमें कारगिल के नायक भी शामिल हैं, के नाम पर रखा गया है, ताकि उनकी वीरता सदा के लिए अमर हो और आने वाली पीढ़ियों को सदैव प्रेरणा मिलती रहे। पूरे देश में विजय दिवस आज गर्व और उत्साह के साथ मनाया जाता है, द्रास के युद्ध स्मारक पर होने वाले समारोहों से लेकर युवाओं की पहलों तक। उदाहरण के लिए, जम्मू-कश्मीर में भाजपा के युवा मोर्चा की टीमें पूरे प्रदेश में ‘विजय ज्योति’ जलाकर ले जाती हैं, शहीदों को नमन करने के लिए और पाकिस्तान को चेतावनी देने के लिए कि वह किसी नापाक हरकत की हिम्मत न करे। 2016 की सर्जिकल स्ट्राइक से लेकर 2025 के ऑपरेशन सिन्दूर तक, मोदी सरकार ने दिखा दिया है कि भारत आतंकवाद या आक्रामकता के हर कृत्य का मुंहतोड़ जवाब देगा। चाहे नए स्मारकों का निर्माण हो, सैनिक कल्याण के उपाय हों या शत्रुओं के विरुद्ध निर्णायक कार्रवाई – कारगिल का जज़्बा देश के नेतृत्व को लगातार मार्गदर्शन देता आ रहा है कि भारत की सुरक्षा हर कीमत पर सुनिश्चित की जाए।
1999 में जब कारगिल युद्ध जारी था, वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी स्वयं कारगिल पहुंचे थे, जहां उन्होंने युद्धक्षेत्र में डटे भारतीय जवानों से मुलाकात की और उनका मनोबल बढ़ाया। यह वही सोच और जुड़ाव है जो आज भी जारी है। प्रधानमंत्री बनने के बाद भी वे हर साल दीपावली अग्रिम चौकियों पर देश के जवानों के साथ मनाते हैं, चाहे वह सियाचिन हो, कारगिल हो या अरुणाचल की बर्फीली सीमाएं। यह केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि उस निरंतरता का प्रतीक है, जिसमें देश की रक्षा करने वालों के साथ सबसे पहले खड़ा होना उनकी प्राथमिकता है।
आज का भारत आतंकवाद को बर्दाश्त करने वाला भारत नहीं है। कारगिल के समय हमने अपनी ज़मीन पर कब्जा करने वालों को मुंहतोड़ जवाब दिया था, और आज जब भी हमारे निर्दोष नागरिकों पर हमला होता है, भारतीय सेना उसी संकल्प के साथ जवाब देती है। पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारतीय सेना द्वारा शुरू किया गया ऑपरेशन ‘सिन्दूर’ इस नए भारत की सोच का प्रतीक है, जहां आतंकवाद के विरुद्ध शून्य सहिष्णुता की नीति है। यह ऑपरेशन उस क्षेत्र में चलाया गया जहां आतंकियों ने कायरतापूर्वक हमला किया था। सेना ने न केवल इलाके की घेराबंदी की, बल्कि एक-एक आतंकवादी को ढूंढकर समाप्त करने का संकल्प दिखाया। यह स्पष्ट संदेश है कि भारत अब न तो रक्षात्मक है, न मौन। आतंकवाद अब किसी भी रूप में सहन नहीं किया जाएगा, न सीमाओं पर, न सीमाओं के भीतर।
कारगिल युद्ध केवल एक सैन्य संघर्ष नहीं था, बल्कि यह भारत की एकता, साहस और देशभक्ति की जीवंत मिसाल था। युद्ध के दौरान समूचे देश में देशभक्ति की भावना उमड़ पड़ी थी। हर नागरिक भारतीय सेना के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा था और वीर सैनिकों के बलिदान ने राष्ट्र को गर्व से भर दिया। धर्म, जाति, भाषा और क्षेत्रीय भेदभाव से ऊपर उठकर देशवासियों ने एकजुट होकर अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए समर्थन और श्रद्धा व्यक्त की। यह युद्ध न केवल सीमाओं पर लड़ा गया, बल्कि यह देश के हर नागरिक के दिल में लड़ा गया एक भावनात्मक संग्राम था।
कारगिल विजय दिवस हमारे लिए बतौर एक राष्ट्र अपनी एकता और संकल्प को पुनः दृढ़ करने का दिन है। यह हमें याद दिलाता है कि भारत की संप्रभुता और सम्मान पर कोई समझौता नहीं हो सकता, और हमें सदैव सजग व तैयार रहना होगा। जब हम कारगिल के वीर नायकों को सलाम करते हैं, तो हमें यह भी प्रण लेना होगा कि उनके बलिदान की विरासत को आगे बढ़ाते हुए हम सतर्क, देशभक्त और जिम्मेदार नागरिक बनेंगे। हमें भारत मां के उन रक्षकों का हाथ मजबूत करना है, फिर चाहे वे सीमा पर खड़े सैनिक हों या राष्ट्रीय सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देने वाला नेतृत्व। कारगिल में मिली विजय भारत के अदम्य जज़्बे की विजय थी, जो किसी भी चुनौती के सामने नहीं झुकता। आज वही जज़्बा पहले से भी अधिक प्रखर है और हमें इसी भावना के बल पर एक ऐसा भारत गढ़ना है, जो न केवल मज़बूत और एकजुट हो, बल्कि सचमुच अजेय हो।
जय हिंद!
(लेखक भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री हैं)

