परफॉर्मेंस की राजनीति हमेशा जीतेगी

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     बजट सत्र 2026 का पहला चरण समाप्त हो चुका है। इसने एक बार फिर भारतीय राजनीति में बढ़ते विरोधाभास को उजागर किया है— एक ओर विकास के लिए प्रतिबद्ध सरकार और दूसरी ओर अवरोधों पर आमादा विपक्ष। ऐसे समय में, जब भारत बदलाव और त्वरित विकास की दहलीज पर खड़ा है, प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के निर्णायक नेतृत्व में सरकार ने बजट के माध्यम से ‘विकसित भारत 2047’ की यात्रा को और अधिक गति देने हेतु एक साहसिक रोडमैप प्रस्तुत किया है। किंतु सुधारों पर चर्चा करने के बजाय विपक्ष ने दिखावे की राजनीति को चुना और उसी संस्था की कार्यवाही बाधित की, जिसकी रक्षा का वह दावा करता है।

पिछले ग्यारह वर्षों में भारत ने सेवा, संकल्प और समर्पण पर आधारित शासन को देखा है, जो प्रधानसेवक श्री नरेन्द्र मोदी के अथक समर्पण में परिलक्षित होता है। वस्तु एवं सेवा कर के सफल

बजट 2026 ने विकास के स्तंभों को और सुदृढ़ किया है—पूंजीगत व्यय के लिए ऐतिहासिक आवंटन, एमएसएमई के लिए नई पहल, लॉजिस्टिक्स और उच्च गति रेल कॉरिडोर, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना तथा किसान-केंद्रित सुधार

क्रियान्वयन से लेकर अभूतपूर्व बुनियादी ढांचा विस्तार तक, जन धन–आधार–मोबाइल एकीकरण के माध्यम से डिजिटल समावेशन से लेकर विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था के रूप में भारत के उभरने तक, मोदी सरकार ने लगातार परिणाम दिए हैं। पीएम गति शक्ति, मेक इन इंडिया और स्टार्टअप इंडिया जैसे प्रमुख कार्यक्रमों तथा पूंजीगत व्यय में बड़े प्रोत्साहन ने विकास के परिदृश्य को मूल रूप से बदल दिया है। जी-20 की अध्यक्षता के दौरान नेतृत्व से लेकर राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने वाली निर्णायक आर्थिक कूटनीति तक, भारत की वैश्विक प्रतिष्ठा भी बढ़ी है।

इसी पृष्ठभूमि में बजट 2026 ने विकास के स्तंभों को और सुदृढ़ किया है— पूंजीगत व्यय के लिए ऐतिहासिक आवंटन, एमएसएमई के लिए नई पहल, लॉजिस्टिक्स और उच्च गति रेल कॉरिडोर, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना तथा किसान-केंद्रित सुधार। इन ठोस उपायों पर बहस करने के बजाय विपक्ष ने नारेबाजी, सदन के वेल में आने और भारत-अमेरिका व्यापार ढांचे को लेकर आधारहीन आरोपों को बढ़ावा देने का रास्ता चुना। इन आरोपों के समर्थन में न तो कोई ठोस आधार था और न ही कोई विश्वसनीय प्रमाण। ऐसे प्रयास संसदीय कार्यवाही को आगे बढ़ाने के बजाय केवल भ्रम उत्पन्न करने वाले प्रतीत होते हैं।

यह व्यवधान पीठासीन अधिकारी तक भी पहुंची, जब लोकसभा अध्यक्ष श्री ओम बिरला की अवमानना की गई और एक अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दिया गया। इस कदम की कड़ी निंदा हो रही है।

उत्तरदायित्व सुनिश्चित करने के लिए बनाए गए संसदीय नियमों को सुर्खियां बटोरने की राजनीति का साधन बना दिया गया। सबसे दुर्भाग्यपूर्ण यह रहा कि षड्यंत्रपूर्ण तरीके से अव्यवस्था उत्पन्न कर प्रधानमंत्री को लोकसभा में धन्यवाद प्रस्ताव पर उत्तर देने से रोका गया, जिससे सदन एक व्यापक नीतिगत उत्तर सुनने के अवसर से वंचित रह गया। जब विपक्ष ने संसदीय नियमों और परंपराओं का सम्मान करने से इनकार किया, तब संसद की गरिमा बनाए रखने के लिए सदस्यों का निलंबन आवश्यक हो गया। यह समझना चाहिए कि जनता बहस चाहती है, अव्यवस्था नहीं; जवाबदेही चाहती है, अराजकता नहीं।

जैसे-जैसे सत्र अवकाश की ओर बढ़ा, संदेश स्पष्ट था: भारत की विकास यात्रा इस प्रकार के अवरोधों के कारण पटरी से नहीं उतरेगी। मोदी सरकार भारत को एक विकसित, आत्मनिर्भर और वैश्विक रूप से सम्मानित राष्ट्र बनाने के अपने मिशन पर दृढ़ है। वास्तव में ‘व्यवधान’ केवल सुर्खियां बटोर सकते हैं, परफॉर्मेंस ही शासन की पहचान बनी रहेगी— जनादेश से निर्देशित, सुधारों से सशक्त और 140 करोड़ भारतीयों की आकांक्षाओं से प्रेरित मोदी सरकार आगे बढ़ती रहेगी। यह दिशा भाजपा के ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास, सबका प्रयास’ के अनुरूप है, जहां ध्यान वाक्-युद्ध के बजाय ठोस परिणामों पर केंद्रित रहा है। इसमें कोई संदेह नहीं कि परफॉर्मेंस की राजनीति हमेशा जीतेगी और अवरोधों की राजनीति बार-बार पराजित होगी।

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