अहिल्याबाई के जनकल्याणकारी कार्य व शासन प्रबंध

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अहिल्याबाई होलकर ने होलकर राज्य की उस समय बागडोर संभाली जब संपूर्ण भारत में अराजकता व आपसी मतभेद चरम पर था तथा अंग्रेजों की क्रूरता दिनोंदिन बढ़ती जा रही थी। उस समय भरतपुर का युद्ध मल्हारराव, खंडेराव और देवी अहिल्याबाई की मानो परीक्षा लेने ही आया था। जाटों और मराठों के बीच घमासान युद्ध हुआ और युद्ध का परिणाम खंडेराव के जीवन से चुकाना पड़ा। मल्हार राव के लिए पुत्र की मृत्यु की वेदना सहन करना असहनीय था। वहीं अहिल्याबाई ने सती होने का प्रण लिया कि प्राणों से प्रिय पति अगर जीवित नहीं हैं तो मेरे जीवन का भी कोई अर्थ नहीं है। श्वसुर मल्हारराव के लाख समझाने के बाद ही अहिल्याबाई ने सती होने का विचार त्यागा और पूर्ण निष्ठा से प्रजा की सेवा करने का दायित्व निभाया

लोकमाता अहिल्याबाई होलकर का यह 300वां जन्म शताब्दी वर्ष है। इस अवसर पर भारतवर्ष उत्सव मना रहा है। भारत ऐसे ही विश्वगुरु नहीं बना था। यहां की महिलाओं ने इतिहास में वह स्थान अर्जित किया है जिससे देवता भी वंचित रहे हैं। लौह महिला व लोकमाता महारानी अहिल्याबाई होलकर का व्यक्तित्व व कृतित्व उन्हें विश्व की श्रेष्ठतम महिलाओं की पंक्ति में अग्रणी बनाता है, जिनका भारत के इतिहास और जनमानस पर विशेष व गहरा प्रभाव रहा है। विश्व के सबसे बड़े महिला संगठन राष्ट्र सेविका समिति कर्तृत्व के आदर्श के रूप में लोकमाता अहिल्याबाई होलकर का अनुसरण करती है।

‘बहुजन हिताय-बहुजन सुखाय’ के मूल मंत्र को अपने जीवन में उतार राजसी सुखों का त्याग कर दु:खी, पीड़ित जनों की सेवा को ही उन्होंने अपने जीवन का परम लक्ष्य बना लिया। श्वसुर मल्हारराव से मिले संस्कारों व मार्गदर्शन का यह प्रभाव रहा कि रानी अहिल्याबाई में एक कुशल शासक के सभी गुण विद्यमान थे। प्रजा के हित में उठाए कदमों ने उन्हें लोकमाता की उपाधि दी

अगर हम दुनिया के प्रमुख और प्राचीन देशों के इतिहास पर नजर डालेंगे तो हमें दिखेगा कि ऐसी बहुत कम महिलाएं हैं, जिनका उस देश के इतिहास और जनमानस पर इतना अधिक प्रभाव रहा हो, लेकिन यह बात भारत के बारे में कहना उचित नहीं होगा, क्योंकि भारत में ऐसी कई महिलाएं थीं, जिन्होंने अलग-अलग क्षेत्रों में काम करके अपनी अमिट छाप समाज पर छोड़ी है। ऐसी महिलाओं में से एक है महेश्वर (आज के मध्यप्रदेश) की महारानी व इंदौर-मालवा क्षेत्र को एक अलग पहचान देने वाली पुण्यश्लोक देवी अहिल्याबाई होलकर, जिन्हें इतिहास की पुस्तकों में कुछ पश्चिमी व वामपंथी इतिहासकारों ने जानबूझकर कम ही स्थान दिया। साथ ही यह कहना भी अतिशयोक्ति नहीं होगी कि हमने उन्हें वह उचित स्थान नहीं दिया जिनकी वे पूर्णतः अधिकारी थी।

अहिल्याबाई होलकर ने 1767 में होलकर राज्य की उस समय बागडोर संभाली जब संपूर्ण भारत में अराजकता व आपसी मतभेद चरम पर था तथा अंग्रेजों की क्रूरता दिनोंदिन बढ़ती जा रही थी। उस समय भरतपुर का युद्ध मल्हारराव, खंडेराव और देवी अहिल्याबाई की मानो परीक्षा लेने ही आया था। जाटों और मराठों के बीच घमासान युद्ध हुआ और युद्ध का परिणाम खंडेराव के जीवन से चुकाना पड़ा। मल्हार राव के लिए पुत्र की मृत्यु की वेदना सहन करना असहनीय था। वहीं अहिल्याबाई ने सती होने का प्रण लिया कि प्राणों से प्रिय पति अगर जीवित नहीं हैं तो मेरे जीवन का भी कोई अर्थ नहीं है। श्वसुर मल्हारराव के लाख समझाने के बाद ही अहिल्याबाई ने सती होने का विचार त्यागा और पूर्ण निष्ठा से प्रजा की सेवा करने का दायित्व निभाया।

‘बहुजन हिताय-बहुजन सुखाय’ के मूल मंत्र को अपने जीवन में उतार राजसी सुखों का त्याग कर दु:खी, पीड़ित जनों की सेवा को ही उन्होंने अपने जीवन का परम लक्ष्य बना लिया। श्वसुर मल्हारराव से मिले संस्कारों व मार्गदर्शन का यह प्रभाव रहा कि रानी अहिल्याबाई में एक कुशल शासक के सभी गुण विद्यमान थे। प्रजा के हित में उठाए कदमों ने उन्हें लोकमाता की उपाधि दी। प्रजा की भलाई, सुरक्षा, सुख-सुविधा जुटाना, बाहरी आक्रमण, विद्रोहियों और डाकुओं से राज्य की रक्षा करने व राज्य की जनता के लिए सुशासन की मजबूत नींव रखने जैसे हर संभव प्रयास रानी ने किए। एक और जहां राज्य को चोर डाकुओं से सुरक्षित रखा, वहीं दूसरी ओर राज्य के शत्रुओं से भी राज्य की अंतिम समय तक रक्षा की तथा अपने राज्य के समग्र विकास के लिए कई ऐतिहासिक सुधार किए।

श्वसुर के देहावसान के पश्चात् अहिल्याबाई के नेतृत्व में उनके बेटे मालेराव होल्कर ने शासन की बागडोर संभाली। पर उस समय अहिल्याबाई और मालवा पर विपत्ति का पहाड़ टूट पड़ा, जब 5 अप्रैल, 1767 को शासन की बागडोर संभालने के कुछ ही महीने बाद उनके बेटे की मृत्यु हो गई। कोई भी स्त्री जिससे थोड़े-थोड़े अंतराल पर उसके पति, श्वसुर, पुत्र का सहारा छिन जाए, उसके दुःख एवं मनःस्थिति की सहज ही कल्पना की जा सकती है! परंतु रानी अहिल्याबाई ने नियति एवं परिस्थिति के आगे घुटने नहीं टेके। उन्होंने मालवा राज्य की प्रजा को अपनी संतान मानते हुए 11 दिसंबर, 1767 ई. को शासन की बागडोर अपने हाथों में ली। थोड़े ही दिनों में महारानी की लोकप्रियता राज्य भर में फैल गई।

परिस्थितियों का लाभ उठाने के उद्देश्य से मालवा पर कुदृष्टि रखने वाले लोगों को मुंह की खानी पड़ी। अपने राज्य एवं प्रजा की रक्षा के लिए उन्होंने न केवल अस्त्र-शस्त्र उठाया, बल्कि अनेक युद्धों-मोर्चों पर स्वयं आगे आकर अपनी सेना का कुशल नेतृत्व किया। वहीं, अपने राज्य की शासन-व्यवस्था को सुचारू रूप से आगे बढ़ाने के लिए सीमित संसाधनों के बाद भी उचित प्रबंध किया व राज्य की प्रगति में अभूतपूर्व कार्य किये।

उन्होंने अपनी प्रजा के हर वर्ग की प्रगति, समृद्धि पर अपना ध्यान केंद्रित रखा। उनके 30 वर्षों के शासन के दौरान सभी जातियों, लिंग और धर्मों समेत समाज के हर वर्ग ने अपने आप को सुरक्षित

भारतीय संस्कृति में महिलाओं को दुर्गा व चण्डी के रूप में दर्शाया गया है। वैसे ही अहिल्याबाई ने स्त्रियों को उनका उचित स्थान दिया। नारीशक्ति का भरपूर उपयोग किया। उन्होंने यह बता दिया कि स्त्री किसी भी स्थिति में पुरुष से कम नहीं है। वे स्वयं भी पति के साथ रणक्षेत्र में जाया करती थीं। पति के देहान्त के बाद भी वे युद्ध क्षेत्र में उतरती थीं और सेनाओं का नेतृत्व करती थीं

अनुभव किया। मल्हारराव द्वारा सौंपे गए राज्य का उन्होंने अपने बेटे जैसा पालन ही किया, उन्होंने पूरे भारत में यात्रियों के लिए कुएं और विश्राम गृहों का निर्माण करवाया। उन्होंने न सिर्फ अपने राज्य की प्रजा के लिए काम किया, बल्कि बाकी राज्यों की प्रजा के लिए भी काम किया। उनके द्वारा बनवाए गए कुछ कुएं और विश्रामगृह वर्तमान में भी प्रयोग हो रहे हैं। अहिल्याबाई के ऐतिहासिक जनकल्याणकारी कार्यों को वर्तमान में भी महेश्वर, इंदौर, उज्जैन, नर्मदा नदी घाटों पर, काशी, सोमनाथ आदि भारत के विभिन्न नगरों व धार्मिक स्थलों पर देखा जा सकता है। वर्तमान में उनके नाम पर भारत के कई राज्यों में जनकल्याण की योजनाएं चल रही हैं। वर्तमान में भी अधिकांश लोग जानते हैं कि उन्होंने काशी विश्वेश्वर के मंदिर का पुनर्निर्माण कैसे करवाया था। इसके साथ ही उन्होंने पूरे देश के मंदिरों का निर्माण और बहुत सारे मंदिरों का पुनर्निर्माण भी करवाया था। उन्होंने 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग में तीर्थयात्रियों के लिए विश्रामगृह बनवाया था। अयोध्या और नासिक में भगवान राम के मंदिर का निर्माण करवाया, उज्जयिनी में चिंतामणि गणपति मंदिर का निर्माण करवाया, सोमनाथ व सुदूर दक्षिण के घन जंगलों से घिरा श्रीशैलम के मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया आदि। उन्होंने कल्याणकारी व परोपकारी कार्यों द्वारा राष्ट्र निर्माण का महती कार्य भी किया तथा देश में धार्मिक, सामाजिक, राष्ट्रीय एकता कायम करने के लिए सराहनीय प्रयास किए। इन सभी कार्यों के लिए वे केवल व केवल ‘खासगी संपत्ति’ ही खर्च करती थी, जिस पर पूर्णतया राज परिवार का अधिकार था।

भारतीय संस्कृति में महिलाओं को दुर्गा व चण्डी के रूप में दर्शाया गया है। वैसे ही अहिल्याबाई ने स्त्रियों को उनका उचित स्थान दिया। नारीशक्ति का भरपूर उपयोग किया। उन्होंने यह बता दिया कि स्त्री किसी भी स्थिति में पुरुष से कम नहीं है। वे स्वयं भी पति के साथ रणक्षेत्र में जाया करती थीं। पति के देहान्त के बाद भी वे युद्ध क्षेत्र में उतरती थीं और सेनाओं का नेतृत्व करती थीं।

वर्तमान में महिला सशक्तीकरण की बहुत बातें की जाती है, लेकिन 300 वर्ष पहले अहिल्याबाई ने महिलाओं के कल्याण व उनके मूलभूत अधिकारों के कई सुधार किए।

अहिल्याबाई के गद्दी पर बैठने के पहले शासन का ऐसा नियम था कि यदि किसी महिला का पति मर जाए और उसका पुत्र न हो तो उसकी संपूर्ण संपत्ति राजकोष में जमा कर दी जाती थी, परंतु अहिल्याबाई ने इस क़ानून को बदल दिया और मृतक की विधवा को यह अधिकार दिया कि वह पति द्वारा छोड़ी हुई संपत्ति की वारिस रहेगी और अपनी इच्छानुसार पति की संपत्ति अपने उपयोग में लाए और चाहे तो उसका सुख भोगे या अपनी संपत्ति से जनकल्याण के काम करे। जनकल्याण के रुप में यह निर्णय उस समय में बहुत महत्वपूर्ण रहा। अहिल्याबाई की ख़ास विशेष सेवक एक महिला ही थी। अपने शासनकाल में उन्होंने नदियों पर जो घाट स्नान आदि के लिए बनवाए थे, उनमें महिलाओं के लिए अलग व्यवस्था भी हुआ करती थी। स्त्रियों के मान-सम्मान का बड़ा ध्यान रखा जाता था। लड़कियों को पढ़ाने-लिखाने का जो घरों में थोड़ा-सा चलन था, उसे विस्तार दिया गया। दान-दक्षिणा देने में महिलाओं का वे विशेष ध्यान रखती थीं।

लोकमाता अहिल्याबाई की शासन-व्यवस्था व प्रबंध का सबसे बड़ा बदलाव था सेना को राज्य से अलग करना। आपने अपने विश्वासपात्र सूबेदार तुकोजीराव होलकर को अपना सेनापति बनाया था, जिनके पास सेना की पूरी कमान थी वहीं राजमाता ने शासन और प्रशासन की जिम्मेदारी खुद के पास रखी थी। आपने राज्य और अपने स्वयं के खर्चे को भी अलग किया यानी जो खर्चा वो खुद पर करती वो उनका अपना संचित धन रहता था और राज्य के बेहतरी के लिए खर्चा राजकोष से आता था। लोकमाता अहिल्या के पास खासगी व सरंजामी नामक दो कोष थे। इसमें खासगी उनका निजी कोष था जो उन्हें उनके ससुर से विरासत में मिला था। इस कोष में सोलह करोड़ रुपए उस समय उन्हें मिले थे, साथ ही नियमित आय भी इस ट्रस्ट के अंतर्गत आने वाले गांवों से प्राप्त होती थी। जबकि सरंजामी कोष से प्रशासन व सेना का खर्च चलता था। उन्होंने अपने निजी कोष के समस्त धन को भी सार्वजनिक हित में ही लगा दिया। यानी शासन-व्यवस्था में उस समय उन्होंने एक अलग स्तर की पारदर्शिता को स्थापित किया। धन व शासन-व्यवस्था का ऐसा अद्भुत प्रबंध बाद के बड़े-बड़े विकसित राष्ट्रों व राज्यों में देखने को नहीं मिला।

अहिल्याबाई के शासन व राज्य प्रबंध की बात की जाए तो उन्होंने राज्य के विस्तार को व्यवस्थित करके उसे तहसीलों और ज़िलों में बांट दिया गया ओर प्रजा तथा शासन की सुविधा को ध्यान में रखते हुए तहसीलों और ज़िलों के केंद्र स्थापित करके जहां-जहां आवश्यकता प्रतीत हुई, न्यायालयों की स्थापना भी कर दी गई। कई भूमि सुधार कार्य किए। भूमि को मापने के लिए अंक देने की प्रक्रिया ‛खसरा’ उनके समय ही शुरू हुआ था। राज्य की सारी पंचायतों के काम को व्यवस्थित किया और न्याय पाने की सीढ़ियां बना दी गईं। आख़िरी अपील मंत्री सुनते थे, परंतु यदि उनके फैसले से किसी को संतोष न होता तो महारानी खुद भी अपील सुनती थीं।

लोकमाता अहिल्या की प्रतिष्ठा का प्रमुख कारण यह नहीं है कि उन्होंने देशभर के तीर्थों, चारों धामों, बारह ज्योतिर्लिंगों व अनेक मंदिरों में पुनरुद्धार के कार्य कराए, अन्न क्षेत्र आरंभ किए, धर्मशालाएं बनवाईं, नदियों पर बांध बंधवाए, वृक्षारोपण कराया, सड़कें व बावड़ियां बनवाईं और मस्जिदों तथा पीर दरगाहों की भी मदद की, बल्कि लोक उन्हें इसलिए पूजता है क्योंकि उन्होंने स्वयं को एक ऐसे

अहिल्याबाई ने जो-जो जनकल्याणकारी व शासन प्रबंध के श्रेष्ठ काम किये वह इतिहास के पृष्ठों में स्वर्णाक्षरों में अंकित है। चाहे माहेश्वर को राजधानी बनाने का अभिनव प्रयोग हो, महेश्वर को साड़ी व अन्य वस्तुओं के व्यापार की दृष्टि से बड़ा केंद्र बनाना हो, इंदौर जैसे छोटे नगर को एक बड़े नगर का रूप देना या फिर संपूर्ण हिंदू समाज के गौरव और सनातन संस्कृति के केंद्र काशी विश्वनाथ मंदिर का निर्माण व जीर्णोद्धार या अन्य लोक-मंगल की भावना से संचालित निःस्वार्थ सेवा-कार्य— उन सबके पीछे महारानी अहिल्याबाई की सनातन जीवन-दृष्टि, प्रजावत्सलता, जनकल्याण की प्रचंड भावना एवं कर्त्तव्यपरायणता थी

उदाहरण के रूप में स्थापित किया जिसका सब कुछ था लेकिन स्वयं के लिए कुछ भी नहीं था। जो कुछ भी था वह लोक के लिए था, उनके लिए जनकल्याण सर्वोपरि था। उन्होंने अपनी निजता को समग्रता के लिए न्योछावर कर दिया था। उनके निजस्व की धारा समग्रता के सागर में विलीन हो गई थी और इसी कारण वे सरिता नहीं रहीं समुद्र हो गईं। संसार में सरिताएं तो बहुतेरी हैं लेकिन समुद्र गिने चुने।

लोकमाता अहिल्याबाई राजश्री से राजर्षि के रूप में संसार में प्रसिद्ध हुईं। कवि मोरोपंत के शब्दों में—
“देवी अहिल्याबाई का निष्ठावान और कर्तव्यपरायण चरित्र महाराष्ट्र ही नहीं अपितु पूरे देश में लोकप्रिय है। वह गंगा नदी के समान पवित्र हैं। सदा सद्भावना युक्त कार्य कर सभी का कल्याण करती हैं। इन्हीं सद्गुणों के कारण वह जन-जन के हृदय में स्थान ग्रहण किए हुए है।” यहां तक कि जवाहरलाल नेहरू ने अपनी पुस्तक (भारत एक खोज) में कहा, “मध्य भारत में, इंदौर की अहिल्याबाई का शासन तीस वर्षों तक चला। यह एक ऐसे काल के रूप में प्रसिद्ध है जिसके दौरान (इंदौर में) एक उत्तम व्यवस्था व अच्छी सरकार बनी तथा लोगों को समृद्धि प्राप्त हुई। वे एक बहुत ही योग्य शासक व प्रबंधक थीं, जिन्हें अपने जीवनकाल में बहुत सम्मान प्राप्त हुआ। उनकी मृत्यु के बाद कृतज्ञ लोगों द्वारा उन्हें एक संत के रूप में माना गया।”

मां अहिल्या परम शिव भक्त थीं तथा राजाज्ञाओं पर ‘श्री शंकर आज्ञा’ लिखा रहता था। लेकिन यह उनकी अंधभक्ति नहीं थी और जैसाकि प्रख्यात चिंतक काशीनाथ त्रिवेदी कहते हैं कि उनका मत था कि सत्ता मेरी नहीं, सम्पत्ति भी मेरी नहीं, जो कुछ है भगवान का है और उसके प्रतिनिधि स्वरूप समाज का है। इस प्रकार उन्होंने समाज को भगवान का प्रतिनिधि माना और उसी को अपनी समूची सम्पदा सौंप दी। वे अपने समय में ही इतनी श्रद्धास्पद बनीं कि समाज ने उन्हें अवतार मान लिया। 8 मार्च, 1787 के ‘बंगाल गजट’ ने यह लिखा कि देवी अहिल्या की मूर्ति भी सर्वसामान्य द्वारा देवी रूप से प्रतिष्ठित व पूजित की जाएगी।

13 अगस्त, 1795 को उनकी जीवन-लीला समाप्त हो गई, पर उससे पूर्व उन्होंने जो-जो जनकल्याणकारी व शासन प्रबंध के श्रेष्ठ काम किये वह इतिहास के पृष्ठों में स्वर्णाक्षरों में अंकित है। चाहे माहेश्वर को राजधानी बनाने का अभिनव प्रयोग हो, महेश्वर को साड़ी व अन्य वस्तुओं के व्यापार की दृष्टि से बड़ा केंद्र बनाना हो, इंदौर जैसे छोटे नगर को एक बड़े नगर का रूप देना या फिर संपूर्ण हिंदू समाज के गौरव और सनातन संस्कृति के केंद्र काशी विश्वनाथ मंदिर का निर्माण व जीर्णोद्धार या अन्य लोक-मंगल की भावना से संचालित निःस्वार्थ सेवा-कार्य— उन सबके पीछे महारानी अहिल्याबाई की सनातन जीवन-दृष्टि, प्रजावत्सलता, जनकल्याण की प्रचंड भावना एवं कर्त्तव्यपरायणता थी। निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि लोकमाता अहिल्याबाई ने न केवल अपने समय एवं समाज पर गहरा व व्यापक प्रभाव डाला, बल्कि सनातन संस्कृति एवं सरोकारों को जीने, समझने और अक्षुण्ण रखने के कारण उनके जनकल्याणकारी व शासन प्रबंधन का योगदान सदियों तक अमर एवं अविस्मरणीय रहेगा।

(लेखक सुपरिचित विधि विशेषज्ञ हैं)