31 मई, 1725 को अहमदनगर के चौंडी ग्राम में जन्मी अहिल्याबाई होलकर भारत की वो बेटी हैं जो अपने समय से बहुत आगे थीं। 300 वर्ष पहले ही उन्होंने भारत की कई कुरीतियों का उन्मूलन किया। चाहे बात बालिका शिक्षा की हो या स्त्री अधिकारों की, संकट के समय घोड़े पर चढ़कर युद्ध में जाने की बात हो या समाज को संवारने और समृद्ध करने की; अहिल्या एक आधुनिक महिला व शासक थीं।
अहिल्याबाई अनन्य शिवभक्त, सहृदय, उदारमना, परोपकारी, दूरदर्शी, साहित्य, संगीत एवं कला के प्रति समर्पित सशक्त महिला थीं। उनके व्यक्तित्व की इन्हीं विशेषताओं ने उन्हें एक साधारण कृषक कन्या से प्रतिष्ठित होल्कर घराने की वधू बना दिया। कहते हैं कि मल्हार राव होल्कर ऐसी पुत्रवधू चाहते थे जो उनके पुत्र के साथ-साथ उनके राज्य को भी संभाल सके, क्योंकि उनके पुत्र खांडे राव की रुचि राजकाज में कम थी और वो अपने पिता की तरह पराक्रमी भी नहीं थे। एक बार एक मुहिम से लौटते
अहिल्याबाई ने अपने राज्य की रक्षा के लिए सदैव असाधारण साहस दिखाया। आक्रमणकारियों की धमकियों से कभी भी वह विचलित नहीं हुईं। उन्होंने सदैव सैनिकों के साथ रहकर नेतृत्व किया और दूर से आदेश देने तक स्वयं को सीमित नहीं रखा। पूरे क्षेत्र में उनका प्रथम प्रयास शान्ति, सुरक्षा और सहयोग को बढ़ाने का रहा
समय मल्हार राव होल्कर ने चौंडी ग्राम में पड़ाव डाला। शाम का समय था गांव के शिव मंदिर में आरती हो रही थी। आरती के मधुर स्वर ने मल्हार राव को रोक लिया, मोह लिया, कुल मिलाकर प्रभावित कर दिया। पास जाकर देखा तो एक 7-8 वर्ष की एक बालिका दिखी जिसके चेहरे पर शान्ति थी और स्वर में सम्मोहन। बालिका का परिचय जानकर मल्हार राव होल्कर उनके पिता मंकोजी शिंदे से मिलते हैं और उनके आग्रह पर उस रात उनके अतिथि बनते हैं। रात्रि भोज के उपरांत वो अहिल्या का हाथ अपने पुत्र के लिए मांगते हैं जिसे मंकोजी शिंदे सहर्ष स्वीकार कर लेते हैं और इस तरह अहिल्या 8 वर्ष की उम्र में होल्कर घराने की रानी बन जाती हैं। अहिल्या उनकी उम्मीद पर एकदम खरी उतरीं भी। पिता के घर में पढ़ने-लिखने के साथ ही धर्मग्रंथों के प्रति श्रद्धा एवं बड़ों के प्रति सेवा संस्कार के जो बीज अहिल्या के मन में अंकुरित हुए थे, उन्हीं के बल पर अहिल्या ने सभी को अपना बना लिया। उनके पिता मंकोजी शिंदे ने उस समय की व्यवस्था के खिलाफ जाकर अपनी बेटी की शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया जो उस समय लड़कियों के लिए दुर्लभ थी। इसी शिक्षा ने अहिल्याबाई को आगे चलकर सशक्त बनाया और इस दिशा में अहिल्याबाई ने उल्लेखनीय कार्य भी किया। अहिल्याबाई ने महिलाओं की शिक्षा और विकास के लिए शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना से लेकर विधवा पुनर्विवाह तक अनेक प्रभावशाली कदम उठाये, जो तत्कालीन परिस्थितियों में आसान नहीं था। विधवाओं के हित को देखते हुए कानून-व्यवस्था में भी बड़ा बदलाव किया, क्योंकि उस समय विधवाओं की स्थिति ठीक नहीं थी और तो और पति की मृत्यु के बाद सती हो जाना ही एकमात्र विकल्प था। अपने पति की मृत्यु पर वह स्वयं भी सती होना चाहती थीं, लेकिन ससुर के समझाने पर उन्होंने अपना मन बदल दिया और अपने दायित्वों के प्रति सजग और समर्पित हो गयीं। अहिल्याबाई सदियों पुरानी मानसिकता से लोहा लेने में कभी पीछे नहीं रहीं और इसकी शुरुआत उन्होंने अपने जीवन और अपने घर से ही की। अपनी पुत्री मुक्ताबाई का विवाह चलन के विपरीत एक गरीब परिवार में की। वह कठिन निर्णय भी बड़ी बेबाकी से लिया करती थीं। इन सब कुरीतियों को दूर करने के लिए जिस प्रभावशाली व्यक्तित्व की आवश्यकता थी वो अहिल्याबाई ही थीं।
एक बात जो यहां विशेष रूप से ध्यातव्य है वो यह कि अहिल्याबाई के जिस प्रभावशाली व्यक्तित्व की बात की जाती है उसमें सिर्फ उनके माता-पिता एवं पारिवारिक पृष्ठभूमि का ही योगदान नहीं, अपितु उनकी सास गौतमा बाई एवं ससुर मल्हार राव होल्कर का भी विशेष योगदान है। उन्होंने अपनी सास से गृह एवं ससुर से राज्य संचालन सीखा था। 1754 में कुंभेर युद्ध में पति खांडे राव की मृत्यु के बाद ही अहिल्याबाई सत्ता में सक्रिय हो गयीं। अपने ससुर मल्हार राव होल्कर के मार्गदर्शन एवं समर्थन से अहिल्याबाई ने सैन्य रणनीतियों एवं प्रशासनिक दायित्वों की समझ विकसित की। अहिल्याबाई ने अपने राज्य की रक्षा के लिए सदैव असाधारण साहस दिखाया। आक्रमणकारियों की धमकियों से कभी भी वह विचलित नहीं हुईं। उन्होंने सदैव सैनिकों के साथ रहकर नेतृत्व किया और दूर से आदेश देने तक स्वयं को सीमित नहीं रखा। पूरे क्षेत्र में उनका प्रथम प्रयास शान्ति, सुरक्षा और सहयोग को बढ़ाने का रहा। उनका कार्यकाल अविस्मरणीय और उल्लेखनीय रहा जिसे सदैव याद किया जाएगा। एक आदर्श शासन, आदर्श न्याय एवं सामाजिक, सांस्कृतिक समृद्धि के लिए उनका प्रयास कभी भी भुलाया नहीं जा सकता। पुरुष प्रधान समाज में वह शक्ति बनकर स्थापित हो गयीं, जो उनकी दूरदर्शी सोच और सभी को एक सूत्र में बांधकर रखने की प्रभावशालिनी व्यक्तित्व की ही देन है।
अनन्य शिवभक्त अहिल्याबाई होल्कर का जीवन कभी आसान नहीं था। शिव की तरह ही उन्हें भी विषपान से गुजरना पड़ा और शिव के शिवत्व की तरह ही हर आघात से उनका व्यक्तित्व निखरता ही गया। पति, ससुर, पुत्र और पुत्री क्रमशः सभी अपनों को धीरे-धीरे अहिल्याबाई ने खो दिया, पर साहस और प्रजा के प्रति प्रेम व समर्पण समय के साथ बढ़ता ही गया। उसमें कभी कहीं कोई क्षरण परिलक्षित नहीं हुआ।
अहिल्याबाई होल्कर के व्यक्तित्व की एक बड़ी विशेषता थी उनकी न्यायप्रियता। न्यायप्रियता ऐसी कि सुनते हैं अपने पुत्र को ही मृत्युदण्ड देने पर आमादा थीं। एक प्रसंग सुनने में आता है कि उनके पुत्र
होल्कर राज्य को स्थायित्व देने वाली असाधारण व्यक्तित्व अहिल्याबाई महान शिवभक्त थीं। वो अपनी सभी राजाज्ञाओं पर श्री शंकर लिखती थीं। तत्कालीन पैसों पर नंदी का चित्र, रुपयों पर भगवान शंकर और बेलपत्र का चित्र बना होता था। पूजा से पहले जल भी नहीं ग्रहण करती थीं। भगवान शिव की ऐसी अनन्य आराधक थीं मां अहिल्या
मालेराव एक बार इन्दौर के एक बाजार से गुजर रहे थे और उनकी लापरवाही से एक बछड़ा उनके रथ से घायल हो जाता है और मौके पर ही उसकी मृत्यु हो जाती है। इस घटना से अहिल्याबाई बहुत ही ज्यादा दु:खी होतीं हैं और अपने पुत्र को भी बेजुबानों की तरह हाथ-पैर बांधकर रास्ते पर छोड़ देने का आदेश देती हैं। और जब ऐसा किया गया तो कोई भी उस रास्ते पर रथ ले जाने को तैयार नहीं होता, तब स्वयं अहिल्याबाई रथ लेकर निकलती हैं लेकिन उस बछड़े की मां अर्थात् गाय बार-बार रथ का रास्ता रोकती है जिसको लोग मानते हैं कि वह माफ करना चाहती है तब जाकर अहिल्याबाई पुत्र को माफ करती हैं और तबसे उस बाजार का नाम आड़ा बाजार पड़ गया। ऐसी थीं लोकमाता अहिल्या। प्रजा से प्रतिदिन संवाद करती थीं। समाज के प्रति उदारवादी दृष्टि एवं बेसहारा लोगों के प्रति उनके हृदय में स्नेह बचपन से ही था। उन्हें आमजन और सेना का समर्थन सदैव मिला, इसलिए तमाम विरोधों के बाद भी उन्होंने हर क्षेत्र में कीर्तिमान स्थापित किया।
1767 में पुत्र मालेराव की मृत्यु के बाद अहिल्याबाई ने सत्ता अपने हाथ में ली। शोक में डूबी मालवा पर इस समय कुछ लोगों की बुरी नजर थी, लेकिन अहिल्याबाई बेखबर नहीं थीं, उन्हें पूरी प्रजा दिख रही थी, दिख रही थी अपनी जिम्मेदारी जो पहले से कहीं अधिक बढ़ चुकी थी। आभास होते ही उन्होंने तैयारी शुरू कर दी थी। राशन और अस्त्र-शस्त्र जुटाए जाने लगे। महिलाओं की एक टुकड़ी भी प्रशिक्षित हुई और वह स्वयं तैयार थीं अगुवाई के लिए। जैसे ही उन्हें पता चला कि शिप्रा नदी के उस पार राघोबा आ चुके हैं आक्रमण की मंशा से उन्होंने राघोबा को पत्र लिखा। और पत्र में स्पष्ट लिखा कि आपकी सेना के शिप्रा नदी के इस पार आते ही हमारी तलवार चलेगी, आपकी इच्छा पूरी नहीं होगी। हम हारे तो कोई जगहंसाई नहीं होगी लेकिन यदि आप हारे तो सोचिए महिलाओं से हार पर क्या आप मुंह दिखा पायेंगे। पत्र पढ़ते ही राघोबा के होश उड़ गए उनके मुंह से निकला— ये अबला के स्वर हैं या शेरनी के, और इस तरह उनका मन बदल गया, बिना लड़े अहिल्याबाई ने युद्ध जीत लिया। बिना लड़े अहिल्याबाई ने कई युद्ध जीते। इनके रहते कोई मालवा पर आक्रमण नहीं कर सका, जबकि यह वह समय था जब पूरे भारतवर्ष में सत्ता के लिए संघर्ष चल रहा था। ऐसा प्रभावी व्यक्तित्व था अहिल्याबाई होल्कर का।
होल्कर राज्य को स्थायित्व देने वाली असाधारण व्यक्तित्व अहिल्याबाई महान शिवभक्त थीं। वो अपनी सभी राजाज्ञाओं पर श्री शंकर लिखती थीं। तत्कालीन पैसों पर नंदी का चित्र, रुपयों पर भगवान शंकर और बेलपत्र का चित्र बना होता था। पूजा से पहले जल भी नहीं ग्रहण करती थीं। भगवान शिव की ऐसी अनन्य आराधक थीं मां अहिल्या। आपने काशी विश्वनाथ मंदिर और सोमनाथ मंदिर जैसे असंख्य मंदिरों का पुनर्निर्माण कराया। बद्रीनाथ, द्वारका, ओमकारेश्वर से पुरी, गया और रामेश्वरम तक हर एक तीर्थ स्थान पर किसी न किसी रूप में अहिल्याबाई का योगदान रहा है। लगभग 100 मंदिरों और 30 धर्मशालाओं का निर्माण आपने कराया, अनगिनत कुओं और घाटों का निर्माण करवाया। धार्मिक विरासत सहेजने में आपका योगदान अति महत्वपूर्ण है। काशी विश्वनाथ मंदिर, जिसे 1669 में औरंगजेब ने नष्ट कर दिया था, अहिल्याबाई होल्कर ने 1780 में पुनः उसे स्थापित किया, पुनर्निर्माण करवाया इस योगदान के लिए हम सभी सदैव आपके आभारी रहेंगे। माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने जब वाराणसी के काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर का उद्घाटन किया, तो इसी कॉरिडोर में मराठा साम्राज्य की महारानी की भी प्रतिमा स्थापित की गयी। नि:संदेह आपके योगदान के लिए ये सब तो बहुत छोटा है। जिसे कई जन्मों में नहीं किया जा सकता उसे आपने एक जन्म में कर डाला।
अहिल्याबाई का व्यक्तित्व साहित्य, संगीत और कला तथा उद्योग के संरक्षक के रूप में भी एक अमिट छाप छोड़ता है। आपके नेतृत्व और सहयोग ने महेश्वर शहर को समृद्धि प्रदान की। महेश्वर एक समृद्ध वाणिज्यिक केंद्र बन गया। यहां की माहेश्वरी साड़ियां पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हैं। कारीगरों के साथ-साथ विद्वानों और संगीतकारों को भी अहिल्याबाई ने संरक्षण प्रदान किया, जिससे एक सकारात्मक और अनुकूल तथा जीवंत वातावरण सृजित हुआ। सामाजिक उन्नयन हेतु उन्होंने करोड़ों की व्यक्तिगत धनराशि भी लगायी और व्यापारियों और बुनकरों के लिए भी जहां जितना संभव था हर प्रयास किया।
उन्होंने सामाजिक उत्सवों में भी विशेष योगदान दिया। इतना ही नहीं, उन्होंने अपने राज्य से डाकुओं और पिंडारियों का संकट सदा के लिए मिटा दिया। उन्हें उन मार्गों की जिम्मेदारी सौंप दी जिस पर वो लूटपाट करते थे। इस तरह भील और गोंड जनजातियों को भी शांति से जीवन-यापन करना सिखाया। वो बाद के दिनों में आमजन के निकट रहने के लिए तीर्थस्थान महेश्वर में रहने लगीं थीं। वह सभी की मां बन गई थीं, सभी की पीड़ा किसी बुजुर्ग की भांति सुनकर उसका निराकरण करती थीं। जब चारों ओर हाहाकार मची हुई थी, शासन और व्यवस्था के नाम पर घोर अत्याचार हो रहे थे, साधारण गृहस्थ और किसान, मजदूर सब अत्यंत हीन अवस्था में थे तब महेश्वर की जनता का सुखद सौभाग्य था कि उन्हें अहिल्याबाई जैसी दैवीय व्यक्तित्व का सानिध्य और संरक्षण प्राप्त हो रहा था। ऐसा विराट व्यक्तित्व उन्होंने देखा ही कहां था। तभी तो समवेत स्वर में अहिल्याबाई को सभी ‘देवी’ कहने और समझने लगे।
अहिल्या से अहिल्याबाई होल्कर और फिर उत्तरोत्तर लोकमाता, पुण्यश्लोक और देवी कहलायीं अहिल्याबाई होल्कर। सिर्फ मराठों के लिए ही नहीं, अपितु पूरे भारतीय इतिहास के लिए यह गर्व की बात है
अहिल्याबाई होल्कर का व्यक्तित्व इतना विराट और प्रभावशाली था कि सिर्फ भारत तक ही नहीं अपितु दूर-दूर विदेशों तक आपकी ख्याति फैली हुई थी। आपकी तुलना रसियन क्वीन ‘कैथरीन द् ग्रेट’, इंग्लैंड की क्वीन ‘एलिजाबेथ’, डेनमार्क की क्वीन ‘मारगेट 1’ के साथ की जाती है। अहिल्याबाई को ब्रिटिश इतिहासकार जॉन क्यास ने ‘द् फिलास्पर क्वीन’ कहकर संबोधित किया था। अहिल्याबाई होल्कर का जीवन और व्यक्तित्व पीढ़ियों तक हमारा मार्ग प्रशस्त करता रहेगा।
अहिल्या से अहिल्याबाई होल्कर और फिर उत्तरोत्तर लोकमाता, पुण्यश्लोक और देवी कहलायीं अहिल्याबाई होल्कर। सिर्फ मराठों के लिए ही नहीं, अपितु पूरे भारतीय इतिहास के लिए यह गर्व की बात है। ये सभी प्रसंग इतिहास के सुनहरे पन्नों पर दर्ज हैं। इतिहास गर्वित है, हर्षित है इन्हें स्वयं में सहेजकर, समेटकर। मां अहिल्या का व्यक्तित्व सतत् सादर स्मरणीय है, नमनीय है। आपके सम्पूर्ण जीवन एवं व्यक्तित्व पर निम्नलिखित पंक्तियां कितनी सटीक हैं—
चपल हूं, धीर हूं, मैं तो आधार हूं
शक्ति हूं, तेज हूं, मैं ही लाचार हूं
विधि का नवनीत हूं, सार संसार हूं
शिव जटाओं में सिमटी प्रबल धार हूं।।
(लेखिका सुपरिचित साहित्यकार हैं)
पं. कृष्णशास्त्री चिपलणकर ने स्वरचित अहिल्याबाई के चरित्र में एक स्थान पर लिखा है- ‘परस्पर विरोधी जो गुण हैं, वे सब उनके चरित्र में पाए जाते हैं। … स्वधर्म पर अटूट प्रेम होने पर भी विधर्मियों के साथ उन्होंने कभी द्वेष नहीं किया। इतना ही नहीं, उनके ऊपर पूरी कृपा ही रखी। युवावस्था में विधवा हो जाने पर भी उन्होंने पूर्ण रूप से पतिव्रत धर्म का पालन किया। अपार संपत्ति की स्वामिनी होने पर भी एक तपस्विनी के समान अपना जीवन व्यतीत किया। अमर्यादित विशाल राज्य की स्वतंत्र स्वामिनी होते हुए भी अप्रतिमेय चातुर्य से संचालित करने पर भी उनमें अहंकार का लेश तक नहीं आने पाया। वे जो कुछ भी करती थीं उसमें परमेश्वर का भय रखती थीं। वे स्वतः अत्यंत शुद्ध व निर्मल मन की थीं। दूसरों के दोषों की ओर तिरस्कार की दृष्टि से वे कभी भी नहीं देखती थीं। बल्कि अपनी शक्ति भर उन दोषों पर पर्दा डालकर उन्हें सुधारने का प्रयत्न करती थीं। इससे कहना पड़ता है कि अहिल्याबाई मनुष्य रूप में किसी देवी का ही अवतार थीं।’

