भारत की सांस्कृतिक चेतना का एक और उत्कर्ष ‘श्री राम मंदिर ध्वजारोहण’

| Published on:

पावन अयोध्या धाम के श्री राम मंदिर परिसर में ‘ध्वजारोहण उत्सव’ के साथ ही प्रभु श्री राम के धर्म का प्रतीक पवित्र केसरिया ‘धर्म ध्वज’ फहराया गया और मंदिर का निर्माण कार्य औपचारिक रूप से पूर्ण हुआ। इसके साथ ही यह पवित्र अवसर इतिहास में सुनहरे अक्षरों में दर्ज हो गया। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में यह ऐतिहासिक घटना मंदिर के आध्यात्मिक उत्कर्ष और उसके एक संप्रभु दिव्य मंदिर के रूप में रूपांतरण का प्रतीक है। ध्वजारोहण न केवल वास्तुकला की पूर्णता का संकेत देता है, बल्कि सदियों पुराने श्री राम जन्मभूमि आंदोलन से जुड़े सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पुनरुत्थान का भी प्रतिनिधित्व करता है। साथ ही, यह सभ्यतागत चेतना और निरंतरता की एक नई भावना को दर्शाता है। कुछ पुजारियों ने इसे ‘दूसरा अभिषेक’ कहा, जो मंदिर के सभी 44 दरवाज़ों को इस आयोजन के लिए खोलता है। यह धर्म एवं धैर्य की विजय का प्रतीक है। भारत को ‘लोकतंत्र की जननी’ बताते हुए और यह कहते हुए कि लोकतंत्र हमारे डीएनए में है, प्रधानमंत्री जी ने लोगों से अपने भीतर ‘राम’ को जगाने का आह्वान किया, ताकि समाज सशक्त हो तथा ‘विकसित भारत’ का मार्ग प्रशस्त हो सके।

ध्वजारोहण न केवल वास्तुकला की पूर्णता का संकेत देता है, बल्कि सदियों पुराने श्री राम जन्मभूमि आंदोलन से जुड़े सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पुनरुत्थान का भी प्रतिनिधित्व करता है। साथ ही, यह सभ्यतागत चेतना और निरंतरता की एक नई भावना को दर्शाता है

भारत की नई श्रम संहिताएं एक ऐतिहासिक सुधार हैं, जो 29 पुराने कानूनों को चार संहिताओं— वेतन, औद्योगिक संबंध, सामाजिक सुरक्षा तथा व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य-शर्त—में समाहित करती हैं। ये सुधार एनडीए सरकार के एक दशक की मजबूत रोजगार वृद्धि पर आधारित हैं, जो सभी के लिए न्यूनतम मजदूरी दर को सुनिश्चित करते हैं, गिग और प्लेटफॉर्म श्रमिकों तक सामाजिक सुरक्षा का विस्तार करते हैं, और व्यापक सुरक्षा तथा परिचालन लचीलेपन के साथ औद्योगिक संबंधों का आधुनिकीकरण करते हैं। ये संहिताएं एकीकृत ढांचे के माध्यम से कार्यस्थल सुरक्षा को बढ़ाती हैं और सिविल पेनल्टी व डिजिटाइज़्ड प्रक्रियाओं को अपनाकर अनुपालन को सरल बनाती हैं, जिससे मज़दूरों के अधिकारों से समझौता किए बिना व्यापार वृद्धि के लिए एक सक्षम वातावरण तैयार होता है। अनिवार्य नियुक्ति पत्र, वेतन समानता और महिला कार्यबल की बढ़ी हुई भागीदारी जैसे प्रावधानों के साथ, ये कानून समावेशन, पारदर्शिता और भविष्योन्मुख श्रम पारिस्थितिकी तंत्र को प्रोत्साहित करते हैं। 21 नवंबर, 2025 से लागू हुई इन संहिताओं का पूर्ण प्रभाव तब सामने आएगा, जब सभी राज्य अपने-अपने स्तर पर नियमों को अधिसूचित करेंगे और केंद्रीय बोर्ड की शासन संरचनाएं स्थापित होंगी। चरणबद्ध कार्यान्वयन से एक सुगम संक्रमण सुनिश्चित होगा, जबकि पुराने कानून कुछ समय तक समानांतर रूप से लागू रहेंगे। यह सुधार भारत के बदलते श्रम बाजार और आर्थिक आकांक्षाओं के अनुरूप सुरक्षित कार्यस्थलों, उचित वेतन और अधिक प्रतिस्पर्धी औद्योगिक माहौल की नींव रखता है। ये श्रम संहिताएं एक आधुनिक, कुशल और समावेशी श्रम पारिस्थितिकी तंत्र बनाने के लिए तैयार हैं, जो न केवल आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को आगे बढ़ाएंगी, बल्कि मजदूरों के कल्याण को भी सुदृढ़ करेंगी।

देश अब हर वर्ष 15 नवंबर को ‘जनजातीय गौरव दिवस’ मना रहा है और इस वर्ष धरती आबा भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती इसे और भी विशेष बनाती है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत अपने आदिवासी नायकों के वीरतापूर्ण संघर्षों और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को पुनः प्रतिष्ठित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। देशभर में लागू विभिन्न कल्याणकारी योजनाएं आदिवासी समुदायों के जीवन में परिवर्तन ला रही हैं। ऐसे समय में प्रधानमंत्री जी द्वारा भारत के औपनिवेशिक शासन और उपनिवेशवादी सोच के विरुद्ध संघर्ष में आदिवासी समाज के योगदान को सम्मानित करने की व्यक्तिगत पहल उल्लेखनीय है। आज ‘पंच प्रण’ का मंत्र देश को प्रेरित कर रहा है और ‘विकसित भारत’ के मार्ग को प्रशस्त कर रहा है।

[email protected]