शिवप्रकाश
प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने 8 फ़रवरी, 2022 को राज्यसभा में एवं अनेक सार्वजनिक सभाओं के अपने भाषण में कहा कि कांग्रेस अपनी दिशा से भटक गई है। वह अपने जन्मकाल से जिस मार्ग पर चली थी एवं महात्मा गांधी जी सहित उसके राष्ट्रीय नेतृत्व द्वारा जो दिशा उसे दी गई थी उससे भटककर वामपंथियों विचारों से दिशा प्राप्त कर रही है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के आरोप का कारण है, क्योंकि कांग्रेस के सिद्धांत स्वदेशी, स्वावलंबन, पंचायतराज आदि उनके हुआ करते थे। महात्मा गांधी ने मतान्तरण का विरोध एवं गाय का रक्षण आदि विषयों पर प्रखरता से अपने विचार व्यक्त किये थे।
महात्मा गांधी जी द्वारा 1920 के बाद कांग्रेस के कार्यकर्ताओं से जिन विषयों के पालन का आग्रह किया गया था, उनमे अस्पृश्यता, जातिगत भेदभाव, शराबखोरी, पर्दा, महिला उत्पीड़न एवं अशिक्षा आदि थे। कांग्रेस के अनेक सिद्धान्तों में से एक संपूर्ण समाज में राष्ट्रीय भाव का विकास करना भी था। लेकिन यह सिद्धांत आज की कांग्रेस में दिखाई नहीं देते हैं।
कांग्रेसी नेता श्री राहुल गांधी का अभी कुछ समय पूर्व सम्पन्न अमेरिका प्रवास मीडिया में चर्चित रहा, जिसमें उन्होंने सिख युवक को आधार बनाकर जिस प्रकार की टिप्पणी की वह समाज में भेदभाव की रेखा को खींचने का कार्य करती है। उन्होंने कहा कि अब भारत में सिख पहचान पर संकट है, जो वास्तविकता से कोसों दूर है
कांग्रेसी नेता श्री राहुल गांधी का अभी कुछ समय पूर्व सम्पन्न अमेरिका प्रवास मीडिया में चर्चित रहा, जिसमें उन्होंने सिख युवक को आधार बनाकर जिस प्रकार की टिप्पणी की वह समाज में भेदभाव की रेखा को खींचने का कार्य करती है। उन्होंने कहा कि अब भारत में सिख पहचान पर संकट है, जो वास्तविकता से कोसों दूर है। उनकी टिप्पणी को आधार बनाकर आतंकियों एवं खालिस्तान समर्थकों ने इस भेदभाव को बढ़ाने का कार्य किया और उनके वक्तव्य का समर्थन भी किया। भाजपा केवल हिन्दी भाषियों की समर्थक है और वह दक्षिण की भाषाओं को पसंद नहीं करती है, तेलुगू का उदाहरण देकर यह आरोप भी लगाया। लोकसभा 2024 के आम चुनाव में भी संविधान परिवर्तन एवं आरक्षण समाप्ति का भ्रम फैलाकर समाज में असंतोष निर्माण करने का कार्य भी उन्होंने किया, जबकि आपातकाल को थोपकर उनकी ही पार्टी ने संविधान का गला घोंटने का कार्य किया था। आदिवासी, दलित एवं मुस्लिम गठजोड़ बनाकर चुनाव में सफलता प्राप्त करने के लिए ही उन्होंने यह भ्रम फैलाया। इसी के साथ–साथ वे उत्तर-दक्षिण का भेद, दलित, मुस्लिम, आदिवासी, सिख जैसे विभाजनकारी मुद्दे उठाते रहे हैं। अंग्रेजों द्वारा गढ़ित यह सिद्धांत कि भारत एक राष्ट्र नहीं राज्यों का समूह (Union Of States) है, श्री राहुल गांधी यह भी स्थापित कर रहे हैं। जबकि हजारों वर्ष से भारत एक राष्ट्र है, राज्यों का समूह नहीं। “वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः” कहकर वेदों में इस भाव को उद्भाषित किया है। प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरु जी द्वारा यह इच्छा व्यक्त करना कि “मेरी मृत्यु के बाद मेरी राख को गंगा में प्रवाहित किया जाए” भारत मां के प्रति उनमें यह भक्तिभाव ही प्रकट होता है। इस षड्यंत्र में उनके साथ भारत में विभेद उत्पन्न करने वाली शक्तियां, वामपंथी समूह एवं इन्हीं विचारों को पोषित करने वाले आंतरिक-वाह्य समूह पर्दे के पीछे से उनका समर्थन करते रहे हैं।
भारतीय समाज में विभाजक रेखाओं (Fault Line) को विस्तृत कर भारत की सांस्कृतिक व सामाजिक विविधताओं को सामाजिक संघर्ष में बदलने का जो कार्य अंग्रेजों ने किया, वही कांग्रेस व अन्य विपक्षी दल कर रहे हैं। 1857 की क्रांति के उपरांत ब्रिटिश सत्ता को स्थायित्व प्रदान करने के लिए अंग्रेजी हुकूमत, अंग्रेजों द्वारा स्थापित विद्वान एवं चर्च-मिशनरी तीनों ने मिलकर जो एजेण्डा तैयार किया था उसमें दलित एवं आदिवासी को हिन्दू समाज से सेवा एवं मतांतरण द्वारा अलग करने का कुत्सित प्रयास था। अरुण शौरी ने अपनी पुस्तक ‘भारत में ईसाई प्रचार तंत्र’ में इसका विस्तृत वर्णन किया है। कुछ मात्रा में वह इसमें सफल भी हुए हैं। आदिवासी, दलित, मुस्लिम गठजोड़ यह उनकी कल्पना थी। इसी के अंतर्गत मुस्लिम लीग की स्थापना करायी गयी। मुहम्मद अली जिन्ना के साथ आदिवासी नेता श्री जयपाल सिंह मुंडा का मिलन तत्कालीन बिहार के गवर्नर सर मौरिस गार्नियर हैलट द्वारा कराया गया।
इसी क्रम में 1946 में झारखंड, छोटा नागपुर पाकिस्तान सम्मेलन का आयोजन भी राची में हुआ था। अंग्रेज कांग्रेस का राज “हिन्दू राज” होगा यह कहकर आदिवासी एवं दलितों को डराने का कार्य करते थे। तत्कालीन बंगाल के नेता जोगेन्द्र नाथ मण्डल का मुस्लिम लीग के साथ सम्बन्ध उसी शृंखला की कड़ी थी। मद्रास के अपने 28 वें अधिवेशन में मुस्लिम लीग के नेता मुहम्मद अली जिन्ना ने अपने मंच से द्रविड़स्तान की मांग उठायी थी और तमिलनाडु के दलित नेताओं से कहा था कि “मेरी आप लोगो के साथ पूरी संवेदना है और द्रविड़स्तान बनाने के लिए जो मुझसे हो सकेगा वह मैं करूंगा।” इसी मांग को सर्वप्रथम ईसाई पादरी कोल्डवेल ने उठाया था। सिख समाज में यही अलगाव के बीज मैक्स ऑर्थर मैकलिंफ़ ने बोए थे। प्रसिद्ध इतिहासकार सरदार खुशवंत सिंह ने अपने ग्रंथ ‘द सिख गुरूस, सेक्रेड रायटिंग्स एंड ऑथर्स’ की प्रस्तावना में इसका उल्लेख किया है। इन सिद्धांतों को व्यवहार रूप में लाने के लिए मनगढ़ंत तर्क, साहित्य रचना, असत्य प्रचार, मान्यताओं को विकृत करना, इस आधार पर कार्यक्रमों की रचना कर सभी उपक्रम किए गए और इस विभाजनकारी विष बीज का बीजारोपण किया गया।
देश के अंदर राष्ट्रीयता का भाव एवं समाज की एकात्मता की अवधारणा इतनी गहरी थी कि यह षड्यंत्र आंशिक मात्रा में ही सफल हो पाए। मुस्लिम लीग के द्वारा भारत विभाजन के लिए आयोजित डायरेक्ट एक्शन, जिसमे भीषण नरसंहार हुआ एवं 16 हज़ार हिन्दुओं का क़त्लेआम केवल कलकत्ता में ही हुआ था। उसमें जयपाल सिंह मुंडा मुस्लिम लीग का चेहरा पहचान गए थे। वे मुस्लिम लीग से अलग होकर राष्ट्रवादी नेता बने। संविधान सभा में आदिवासी नेता के रूप में चुने गए एवं भारत के लोकतांत्रिक विकास में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जोगेंद्रनाथ मण्डल भी बांग्लादेश में दलितों पर हुए भीषण नरसंहार को देखकर पाकिस्तान सरकार से त्यागपत्र देकर भारत में आकर रहे। दलित समाज के साथ हुए अत्याचार एवं उनकी व्यथा को उनके मंत्री पद से त्याग पत्र देते समय के पत्र से हम समझ सकते हैं। अंत में 1968 में कलकत्ता में उन्होंने अन्तिम सांस ली। आतंकवाद के कारण पंजाब को झुलसते हुए हमने देखा ही है।
आदिवासी, दलित एवं मुस्लिम यह गठजोड़ अस्वाभाविक ही है। यदि यह स्वाभाविक होता तब वर्तमान बांग्लादेशी हिंसा में मरने वाले दलित, आदिवासी एवं बौद्ध अल्पसंख्यक नहीं होते। पाकिस्तान में आदिवासी, दलितों की दुर्दशा न होती।
विभाजन की जो विषवेल अंग्रेजों ने बोयी थी जिसके कारण देश का विभाजन हुआ, समाज में वैमनस्यता आयी। भारत में कुछ दल अज्ञानतावश अथवा राजनीतिक स्वार्थवश उसी बेल की जड़ों को सींचने का प्रयास कर रहे हैं। राजनीतिक पार्टी का आश्रय लेकर तमाम विभाजनकारी शक्तियां नेपथ्य से इसको प्रचारित करने में लगी है। इतिहास से सीख लेकर हम जागरूक रहते हुए इस षड्यंत्र को समझें। हमारी उदासीनता देश के लिए घातक होगी। लोकतंत्र में सरकारों का परिवर्तन स्वाभाविक प्रक्रिया है, लेकिन सत्ता के स्वार्थ में हम देश विघातक षड्यंत्रों का भाग न बने, यह विवेक प्रत्येक राजनीतिक दल एवं मतदाता को रखना होगा।
(लेखक भाजपा के राष्ट्रीय सह संगठन महामंत्री हैं)

