‘महात्मा गांधी के आदर्शों पर चल रहे हैं प्रधानमंत्री मोदी’

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महात्मा गांधी की पौत्री ने गांधी जी और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी दोनों के साथ अपने अनुभवों को बयान करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री मोदी की राष्ट्रीय मुद्दों को लेकर समझ एवं विकास के प्रति उनका समर्पण गांधी जी के आदर्शों के अनुरूप है। उनका कहना है कि मोदी की नीतियां एवं कार्य गांधी जी द्वारा भारत के लिए देखे गए बदलाव के स्वप्न को मूर्त रूप दे रहे हैं

हात्मा गांधी, या जैसाकि मैं उन्हें पुकारती हूं बापूजी, मेरे दादा थे। मुझे 19 वर्ष की आयु तक उनके साथ रहने का सौभाग्य मिला। इस साल, मैं 95 वर्ष की हो गयी हूं और मुझे प्रधानमंत्री मोदी एवं गांधीजी के बारे में अपने विचार लिखने की इच्छा महसूस हो रही थी, ताकि आने वाली पीढ़ियां गांधीजी के परिवार के किसी ऐसे सदस्य के विचार जानना चाहेंगी, जिसे एक वयस्क के तौर पर दोनों के साथ रहने का मौका मिला हो।

नरेन्द्रभाई के साथ मेरा जुड़ाव आपातकाल के चुनौतीपूर्ण दौर में हुआ। नरेन्द्रभाई उस समय आरएसएस के एक युवा एवं उर्जावान प्रचारक थे। 1970 के दशक में ‘सांप्रदायिकता’ हमारे राष्ट्रीय ताने-बाने को नुकसान पहुंचा रही थी। गुजरात से राज्यसभा सदस्य के रूप में मैं पाकिस्तान से भारी घुसपैठ के कारण सीमावर्ती जिलों में हो रहे जनसांख्यिकीय परिवर्तन से बहुत चिंतित थी। असम में घुसपैठ की समस्या और भी अधिक व्यापक थी।

मेरी पार्टी कांग्रेस में किसी ने भी इस मुद्दे पर गंभीरता से नहीं लिया, लेकिन मुझे अच्छी तरह याद है कि कैसे नरेन्द्रभाई उस छोटी सी उम्र में भी ऐसे मामलों को लेकर चिंतित रहा करते थे। वह स्वाभाविक ही राष्ट्रीय मुद्दों के प्रति प्रतिबद्ध थे एवं तात्कालिक राजनीति के प्रलोभनों के बावजूद वह अपने मार्ग पर अडिग रहे।

कोविड-19 महामारी के दौरान उनका ‘मानवता सर्वप्रथम’ सिद्धांत केवल देश की सीमाओं तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि पूरी दुनिया को इसका लाभ मिला। फिर उन्होंने धारा के विपरीत जाकर अनुच्छेद 370 जैसे प्रावधान को हटाने का साहस दिखाया। वे व्यवस्थित रूप से उस एजेंडे को पूरा कर रहे हैं जिसे स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद पूरा किया जाना चाहिए था। सीएए इसका एक अन्य उदाहरण है

इस दौरान वह ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं के सामने आने वाली चुनौतियों जैसे व्यक्तिगत स्वच्छता, स्वच्छ पेयजल एवं परिवार के लिए प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल को लेकर चिंतित थे । इसी क्रम में प्रधानमंत्री बनने के तुरंत बाद उन्होंने स्वतंत्रता दिवस के भाषण में ‘राष्ट्रीय स्वच्छता’ की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने ‘स्वच्छ भारत’ अभियान शुरू किया, जिससे स्वच्छता मानकों में सुधार हुआ और साथ ही पूरे भारत में महिलाओं को गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार प्राप्त हुआ।

मेरे दादाजी ‘जन आंदोलन ‘ में विश्वास करते थे – लोगों का आंदोलन स्थायी सामाजिक परिवर्तन का आधार है। नरेन्द्रभाई का ‘सबका’ शब्द पर अटूट विश्वास है— जैसे ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास ‘ और विकसित भारत। यह उनके लिए महज चर्चा का विषय नहीं हैं। यह उन्हें प्रेरणा देते हैं।
कोविड-19 महामारी के दौरान उनका ‘मानवता सर्वप्रथम’ सिद्धांत केवल देश की सीमाओं तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि पूरी दुनिया को इसका लाभ मिला। फिर उन्होंने धारा के विपरीत जाकर अनुच्छेद 370 जैसे प्रावधान को हटाने का साहस दिखाया। वे व्यवस्थित रूप से उस एजेंडे को पूरा कर रहे हैं जिसे स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद पूरा किया जाना चाहिए था। सीएए इसका एक अन्य उदाहरण है।

सनातन धर्म की इस महान भूमि पर राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त करने में शिरडी के साईं नाथ और श्री रमण महर्षि जैसे कई गुरुओं की आध्यात्मिक शक्ति के उपयोग से हमें प्रेरणा मिलती रहेगी। गांधीजी इसके अगुआ बने। यह कोई संयोग नहीं है कि दशकों बाद नरेन्द्रभाई हमें औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्त करने का प्रयास कर रहे हैं।

स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए द्वितीय संघर्ष

मेरे दादाजी हमेशा कहा करते थे, ‘दुनिया में जो बदलाव आप देखना चाहते हैं, उसके पुरोधा आप स्वयं बनें।’ आरएसएस कार्यकर्ता से लेकर भारत के प्रधानमंत्री तक नरेन्द्रभाई की यात्रा को करीब से देखने के बाद मैं नि:संदेह होकर यह बात कह सकती हूं कि वह उस बदलाव का प्रतीक हैं, जिसकी अभिलाषा हम सभी को अपने प्यारे ‘भारत’ के लिए है।

बापूजी और नरेन्द्रभाई के बीच सबसे खास समानता यह है कि इन दोनों के सार्वजनिक जीवन को प्रभावित करने वाला मूल कारक हमारे सनातन धर्म का आध्यात्मिक पहलू है। यह दोनों ही स्थितप्रज्ञ हैं – जो प्रशंसा और आलोचना दोनों से प्रभावित नहीं होते हैं। ऐसा व्यक्ति जानता है कि अंततः सत्य की जीत होती है और इसलिए वह धैर्यपूर्वक इसका इंतजार करते हैं। इस बात को नरेन्द्रभाई पर होने वाले राजनीतिक हमलों पर उनकी खामोशी से समझा जा सकता है। यह राजऋषि का लक्षण है।

हमारे शास्त्रों के अनुसार धर्म की पुनर्स्थापना से पहले हमेशा मंथन होता है। इस मंथन का पहला परिणाम नकारात्मकता होती है और ये नकारात्मक शक्तियां सत्य का विरोध करती हैं। राजनीतिक लाभ के लिए राष्ट्रीय हितों से भी समझौता किया जाता है।

ऐसी परिस्थितियों में एक ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता होती है, जिसकी सत्ता में कोई रुचि न हो तथा जो भ्रष्टाचार से परे हो, एवं जो गरीबों और राष्ट्र के हितों को अन्य सभी चीजों से ऊपर रखे।

यदि आज बापूजी जीवित होते तो वह नरेन्द्रभाई के बहुत बड़े समर्थक होते। साथ ही, बापूजी वह पहले व्यक्ति होते जो, हमें उन लोगों के बारे में चेतावनी देते, जो उनके नाम का दुरुपयोग करते हैं और जिन्होंने अपने राजनीतिक हितों के लिए हमें विभाजित करना अपने जीवन का मिशन बना लिया है।

नरेन्द्रभाई के कई आलोचकों को यह जानकर आश्चर्य होगा कि उन्होंने गांधीजी के आदर्शों को आधुनिक भारत के विकास एजेंडे में शामिल करके उन्हें पुनर्जीवित कर दिया है। राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांत राज्य की नीति बन गए हैं। ऐसा करके उन्होंने यह सुनिश्चित किया है कि गांधीजी की विरासत हमारे राष्ट्र के मानस में दृढ़तापूर्वक एवं निरंतर रूप से समाहित होती रहे।

नरेन्द्रभाई को भी जनता की कसौटी पर खरा उतरना होगा, लेकिन, जैसाकि भगवान कृष्ण ने अर्जुन से कहा था, महत्वपूर्ण बात यह है कि आप अपना काम करते रहें और परिणाम सत्य पर छोड़ दें – जो अंततः जीतेगा। मुझे विश्वास है कि इतिहास अंततः बापूजी और नरेन्द्रभाई दोनों के साथ न्याय करेगा।

(लेखिका महात्मा गांधी की पौत्री हैं)