लोकतंत्र में महिलाओं को उनका उचित स्थान दिलाने का प्रयास जारी रहेगा

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     यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि कांग्रेस और उसके नेतृत्व वाले विपक्ष ने उन विधेयकों के विरुद्ध वोट दिया, जिनका उद्देश्य 2029 तक लोकसभा एवं राज्यों की विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण सुनिश्चित करना था। वास्तव में विपक्ष के इस प्रतिगामी कदम से पूरे देश की महिलाएं संसदीय लोकतंत्र में समुचित भागीदारी के अपने अधिकार से वंचित रह गईं। यह देखना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण था कि कांग्रेस के नेतृत्व वाली विपक्षी पार्टियां अपने संकीर्ण राजनीतिक हितों से ऊपर नहीं उठ पाईं और देश की विधायी यात्रा में महिलाओं की समुचित भागीदारी सुनिश्चित करने के इस प्रयास को विफल कर दिया। यह पहली बार नहीं है कि इन राजनीतिक पार्टियों ने किसी न किसी बहाने से ऐसा किया हो; बल्कि पिछले तीन दशकों में उन्होंने बार-बार ऐसा करके अपना घोर महिला-विरोधी चेहरा बेनकाब किया है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी, जिन्होंने इन विधेयकों को सहजता से पारित कराने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी, ने विपक्षी पार्टियों को ठीक ही ‘सुधार-विरोधी’ करार दिया है। उन्होंने कहा कि इन पार्टियों ने महिलाओं के सशक्तीकरण के बजाय अपने राजनीतिक हितों को अधिक महत्व दिया। एक बेहद भावुक वक्तव्य में उन्होंने इस विधेयक के पारित न होने की तुलना ‘भ्रूण-हत्या’ से की और दु:ख जताते हुए कहा कि संसद के पटल पर करोड़ों महिलाओं के सपनों की हत्या कर दी गई। उन्होंने विपक्षी दलों को विधेयक की नाकामी का जश्न मनाते देख गहरी निराशा व्यक्त की और उनके इस व्यवहार को देश की हर महिला की गरिमा का सीधा अपमान बताया।

यह ध्यान देने योग्य है कि महिला आरक्षण विधेयक लगभग तीन दशकों तक लंबित रहा है और वर्तमान मोदी सरकार द्वारा इसे पूरी निष्ठा एवं प्रतिबद्धता के साथ आगे बढ़ाया गया, जबकि इसके पूर्व के प्रयास राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के कारण असफल रहे। ये विधेयक महिला सशक्तीकरण को बढ़ावा देने, अधिक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने और संघीय ढांचे को मजबूत करने के उद्देश्य से प्रस्तुत किए गए थे, ताकि संवैधानिक प्रावधानों को समकालीन राजनीति और शासन की आवश्यकताओं के अनुरूप बनाया जा सके। चूंकि ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023’ में वर्ष 2026 के बाद होने वाली जनगणना

भले ही कांग्रेस के नेतृत्व वाला विपक्ष महिलाओं के लिए आरक्षण लागू होने में बाधा डालकर कुछ समय के लिए प्रसन्न हो सकता है, लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं है कि देश की महिलाओं से भारतीय लोकतंत्र में उनका अधिकार लंबे समय तक नहीं छीना जा सकेगा

के पश्चात परिसीमन के माध्यम से महिलाओं के लिए आरक्षण लागू करने का प्रावधान है, इसलिए इसमें संशोधन करना आवश्यक हो गया था, ताकि इसे बिना किसी देरी के वर्ष 2029 तक लागू किया जा सके। हालांकि जनगणना कराने में देरी कोविड-19 वैश्विक महामारी के कारण हुई, लेकिन जातिगत गणना कराने के निर्णय ने इस पूरी प्रक्रिया को और अधिक व्यापक बना दिया। देश की महिलाओं को 2029 तक संसदीय लोकतंत्र में उनका उचित स्थान सुनिश्चित करने के लिए इन संशोधनों की आवश्यकता थी; किंतु कांग्रेस के नेतृत्व वाले विपक्ष ने इन्हें बाधित कर दिया, क्योंकि इनके पारित होने के लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता थी।

‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023’ के लागू होने को रोकने के अपने निराशाजनक प्रयास में विपक्ष ने मुस्लिम और ओबीसी महिलाओं के लिए आरक्षण की असंवैधानिक मांगें उठाईं। चूंकि, धर्म के आधार पर आरक्षण के लिए संविधान में कोई प्रावधान नहीं है, इसलिए यह संविधान के अनुसार असंभव है। यह भी उल्लेखनीय है कि विपक्ष ने पूर्व में ओबीसी आरक्षण और पिछड़ा वर्ग-आधारित सकारात्मक उपायों का भी विरोध किया है— जिसमें काका कालेलकर और मंडल आयोग की सिफारिशें शामिल हैं। जहां एक ओर महिला आरक्षण के ढांचे को संसद में तीन बार (1996, 1998 और 2003) पारित नहीं किया जा सका, क्योंकि विपक्ष ने इसे रोक दिया था; वहीं दूसरी ओर 2023 में मोदी सरकार के दृढ़ इरादों के चलते ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ को नए संसद भवन में पारित होने वाले पहले विधेयक के रूप में स्वीकृति मिली। हालांकि, यह बेहद निंदनीय है कि अपने पूर्व वादों के बावजूद विपक्ष अब इसके लागू होने का विरोध कर रहा है और भारत के संसदीय लोकतंत्र में महिलाओं की समुचित भागीदारी सुनिश्चित करने की दिशा में उठाए जा रहे कदमों को बाधित कर रहा है।

भले ही कांग्रेस के नेतृत्व वाला विपक्ष महिलाओं के लिए आरक्षण लागू होने में बाधा डालकर कुछ समय के लिए जश्न मना सकता है, लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं है कि देश की महिलाओं से भारतीय लोकतंत्र में उनका अधिकार लंबे समय तक नहीं छीना जा सकेगा। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने बिल्कुल सही कहा है कि वंशवादी पार्टियों ने इस विधेयक को इसलिए रोका, क्योंकि उन्हें आशंका थी कि आम महिलाएं, एक बार सशक्त हो जाने के बाद, उनके पारंपरिक पारिवारिक गढ़ों को चुनौती देंगी। उन्होंने भरोसा दिलाया है कि भले ही इस विधेयक को सदन में कुछ समय के लिए बाधित हुआ हो, लेकिन उनका संकल्प अटल है और लोकतंत्र में महिलाओं को उनका उचित स्थान दिलाने का यह प्रयास निरंतर जारी रहेगा।

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