जहां एक ओर भारतीय जनता पार्टी पूरे देश में अपना 47वां स्थापना दिवस मना रही है, वहीं, दूसरी ओर उसके करोड़ों कार्यकर्ताओं का एक और संकल्प पूर्ण हो रहा है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के दृढ़ एवं निर्णायक नेतृत्व में ‘नक्सल-मुक्त भारत’ का सपना साकार हुआ है और अब ‘विकसित भारत’ के विजन को प्राप्त करने की राह में एक और रुकावट दूर हो गई है। यह ध्यान देने योग्य है कि पिछले 11 वर्षों में भारत की आंतरिक सुरक्षा के परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण बदलाव आया है, जो पहले की प्रतिक्रियात्मक और कमजोर सोच से इतर अब सक्रिय, इंटेलिजेंस-आधारित रणनीतियों और सर्वांगीण विकास पर आधारित है, जिसके परिणामस्वरूप पूरे देश से वामपंथी उग्रवादी तत्वों का सफाया हो गया है। केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने संसद में वामपंथी उग्रवाद पर बहस का उत्तर देते हुए बिल्कुल सही कहा कि पहले वामपंथी उग्रवाद को लेकर प्रतिक्रियाएं अक्सर कमजोर तालमेल और सीमित रणनीतिक स्पष्टता के कारण बाधित होती थीं, जिसके परिणामस्वरूप 2010 के दंतेवाड़ा हमले जैसी जघन्य घटनाओं को अंजाम दिया जाता था, जिसमें जान-माल का भारी नुकसान होता था तथा अन्य हजारों हिंसक वारदातें आम थीं। लेकिन अब श्री नरेन्द्र मोदी के सुदृढ़ एवं निर्णायक नेतृत्व में सरकार ने एक व्यापक और बहुआयामी रणनीति अपनाई है, जो मजबूत सुरक्षा अभियानों को विकास एवं शासन के साथ एकीकृत करती है। यह दृष्टिकोण बेहतर इंटेलिजेंस तालमेल, उग्रवाद-रोधी लक्षित उपायों, बुनियादी ढांचे के विस्तार और सामुदायिक सशक्तीकरण पर जोर देता है। इसके परिणामस्वरूप हिंसा और हत्या में लगातार कमी आई है, साथ ही जनता में नए सिरे से विश्वास जगा है।
इस बदलाव का एक महत्वपूर्ण हिस्सा सुरक्षा इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करना रहा है। 576 से अधिक मजबूत पुलिस थानों और 361 सुरक्षा कैंपों के साथ-साथ 68 नाइट-लैंडिंग हेलीपैड बनाने से ऑपरेशनल
कभी बहुत विशाल रहा ‘रेड कॉरिडोर’— जो पहले 12 राज्यों तक फैला था और बड़ी आबादी को प्रभावित करता था— अब हमारे अभियानों और विकास कार्यों की वजह से लगातार सिकुड़ता जा रहा है। एक अहम बात यह है कि नक्सलवाद मुख्य रूप से एक वैचारिक समस्या है, न कि केवल गरीबी या पिछड़ेपन का परिणाम
तैयारी और आवाजाही की क्षमता बढ़ी है। इससे सुरक्षा बलों को उन इलाकों तक पहुंचने में मदद मिली है जहां पहले पहुंचना कठिन था, जैसेकि अबूझमाड़, बूढ़ा पहाड़ और पारसनाथ पहाड़ियां। नतीजतन, प्रभावित जिलों की संख्या 2014 के 126 से घटकर 2026 में केवल 02 रह गई हैं तथा साथ ही, हजारों नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया। सरकार ने उग्रवाद को बढ़ावा देने वाले अर्थ तंत्र को भी निशाना बनाया है। राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (एनआईए) और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) जैसी एजेंसियों ने गैर-कानूनी फंडिंग पर कड़ी कार्रवाई की है, जिससे उग्रवादियों की ताकत कमजोर हुई है। इसके अलावा बैंकिंग इंफ्रास्ट्रक्चर के विस्तार और प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (डीबीटी) ने पारदर्शी तरीके से कल्याणकारी योजनाओं का लाभ सुनिश्चित किया है, जिससे समानांतर व्यवस्थाओं पर निर्भरता कम हुई है। जहां इस रणनीति का मुख्य बिंदु ‘विकास’ रहा है, वहीं बेहतर सड़क संपर्क, प्रशासनिक मौजूदगी का विस्तार, एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालय जैसी शैक्षिक पहल और बस्तरिया बटालियन जैसे सामुदायिक कार्यक्रमों ने अलगाव की मूल जड़ों पर प्रहार किया है। मतदाताओं की बढ़ती भागीदारी— जिसमें 2024 में कांकेर में 76 प्रतिशत से अधिक मतदान शामिल है— लोकतंत्र में नए सिरे से जगे भरोसे को दिखाती है, जो बोडोलैंड शांति समझौता 2020 जैसी सफलताओं की याद दिलाता है। इस मिले-जुले मॉडल ने लंबे समय तक चलने वाली शांति और स्थिरता की नींव रखी है।
‘नक्सल-मुक्त भारत’ का सपना वास्तविकता बन रहा है और इसको लेकर श्री अमित शाह ने संसद में कहा भी है कि नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई अपने निर्णायक और अंतिम चरण में पहुंच गई है और सरकार इसे पूरी तरह से खत्म करने को लेकर आश्वस्त है। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि कभी बहुत विशाल रहा ‘रेड कॉरिडोर’— जो पहले 12 राज्यों तक फैला था और बड़ी आबादी को प्रभावित करता था— अब हमारे अभियानों और विकास कार्यों की वजह से लगातार सिकुड़ता जा रहा है। एक अहम बात यह है कि नक्सलवाद मुख्य रूप से एक वैचारिक समस्या है, न कि केवल गरीबी या पिछड़ेपन का परिणाम। उग्रवादी समूह अपना दबदबा बनाए रखने के लिए जान-बूझकर विकास कार्यों में रुकावट डालते हैं। जो लोग आत्मसमर्पण करते हैं, उनका मुख्यधारा में स्वागत किया जाता है, उन्हें पुनर्वास के अवसर दिए जाते हैं और उन्हें देश की विकास गाथा का हिस्सा बनाया जाता है। यह उपलब्धि न केवल भारत की आंतरिक सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ी कामयाबी है, बल्कि भारतीय जनता पार्टी के लिए एक वैचारिक जीत भी है। यह उसकी शासन प्रतिबद्धता की जीत को रेखांकित करता है— जो राष्ट्रवाद, विकास और समावेशी विकास पर आधारित है— और विभाजनकारी तथा हिंसक विचारधाराओं पर भारी पड़ती है। यह सफलता एक सुसंगत सोच, निर्णायक नेतृत्व और जमीनी स्तर पर प्रतिबद्धता की शक्ति को दर्शाती है और लोकतांत्रिक संस्थाओं में जनता के विश्वास को और मजबूत करती है। जैसे-जैसे भारत ‘विकसित भारत’ के पथ पर आगे बढ़ रहा है, यह जीत एक सुरक्षित, एकजुट और प्रगतिशील राष्ट्र के निर्माण के लिए भाजपा के अटूट संकल्प का एक जीता-जागता प्रमाण बन गयी है।
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