आज जब पूरा विश्व 11वां अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मना रहा है, योग के महत्व को पूरी दुनिया में और भी अधिक स्वीकारा एवं अपनाया जा रहा है। विश्व के विभिन्न भागों में योग की बढ़ती लोकप्रियता को उभरते जनांदोलनों के रूप में देखा जा सकता है। आधुनिक समाज जिन चुनौतियों को समस्त मानव जाति के समक्ष प्रस्तुत कर रहा है, योग जन-जन का आध्यात्मिक, नैतिक, मानसिक एवं शारीरिक प्रगति का मार्ग प्रशस्त कर उनका समाधान प्रस्तुत करता है। योग से किसी भी व्यक्ति के स्वास्थ्य रक्षण के साथ-साथ सर्वांगीण विकास सुनिश्चित संभव है। यह विश्व को भारत का एक प्राचीन उपहार है जो मानव-कल्याण को समर्पित है। यह अत्यंत हर्ष का विषय है कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के आह्वान पर 177 देशों ने संयुक्त राष्ट्रसंघ में 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस घोषित करने का संयुक्त प्रस्ताव प्रस्तुत किया। जहां यह संख्या अभूतपूर्व थी, वहीं 193 देशों ने इस प्रस्ताव का समर्थन कर इसे सर्वसम्मति से पारित किया जो एक रिकॉर्ड है। जहां पूरा विश्व अंतरराष्ट्रीय योग दिवस को अद्भुत उत्साह के साथ मना रहा है, वहीं भारत में ही कुछ ऐसे लोग हैं जो राजनैतिक कारणों से इस राष्ट्रीय उपलब्धि को स्वीकार करने से हिचकते हैं। जहां इस प्रकार की मानसिकता उन्हें निरंतर राजनैतिक हाशिए पर ले जा रही है, वहीं योग दिनोंदिन और अधिक लोकप्रिय होता जा रहा है।
आपातकाल के 50वें वर्ष को पूरे देश ने ‘संविधान हत्या दिवस’ के रूप में मनाया। संविधान हत्या दिवस’, यह नाम स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् भारतीय इतिहास के उन काले पन्नों के लिए सटीक प्रतीत होता है, जब लोकतंत्र की हत्या हुई थी तथा देश पर तानाशाही थोपने के प्रयास हुए थे। मौलिक अधिकारों का गला घोंट दिया गया था, विपक्ष के नेता जेलों में डाल दिए गए थे। मीडिया पर सेंसरशिप लागू किया गया था। न्यायपालिका के हाथ बांध दिए गए थे, संविधान की आत्मा को कुचलकर संसद को पंगु बना दिया गया था। यह सर्व-स्वीकार्य तथ्य है कि देश पर आपातकाल तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की कुर्सी को बचाने के लिए लगाया गया था। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इंदिरा गांधी का सांसद के रूप में निर्वाचन अवैध घोषित कर उन्हें छह वर्षों के लिए चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगा दिया था। जब सर्वोच्च न्यायालय से भी राहत नहीं मिली, तब इसके जवाब में इंदिरा गांधी ने अपनी सत्ता बचाने के लिए देश पर आपातकाल थोप दिया। उन काले दिनों में पूरा देश एक बड़े जेलखाने में बदल दिया
आधुनिक समाज जिन चुनौतियों को समस्त मानव जाति के समक्ष प्रस्तुत कर रहा है, योग जन-जन का आध्यात्मिक, नैतिक, मानसिक एवं शारीरिक प्रगति का मार्ग प्रशस्त कर उनका समाधान प्रस्तुत करता है
गया। जयप्रकाश नारायण, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, जॉर्ज फर्नांडीस, चौधरी चरण सिंह, मोरारजी देसाई, नानाजी देशमुख, मधु दंडवते एवं अरुण जेटली जैसे विपक्ष के वरिष्ठ नेता जेल में डाल दिए गए। एक अनुमान के अनुसार 3 लाख से अधिक लोग पूरे देश में गिरफ्तार किए गए तथा 30 हजार से अधिक लोग काला कानून ‘मीसा’ के अंतर्गत बंदी बनाए गए। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगा दिया गया। आपातकाल के विरुद्ध पूरे देश में लोकतंत्र की रक्षा के लिए ऐतिहासिक आंदोलन हुए तथा आंदोलन में शामिल लोगों को इसकी भारी कीमत भी चुकानी पड़ी। बड़ी संख्या में लोगों को अपने प्राणों की आहुतियां भी देनी पड़ीं। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने उस दौर में आपातकाल के विरुद्ध भूमिगत रहकर आंदोलन चलाया। देश की लोकतांत्रिक शक्तियों के एकजुट एवं अथक संघर्ष के कारण देश में लोकतंत्र पुनः स्थापित हुआ। आम चुनावों में इंदिरा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस की करारी हार हुई।
जहां, सभी लोकतांत्रिक शक्तियों के गैर-समझौतावादी व अटल एवं अडिग रहने वाले संघर्षों के परिणामस्वरूप लोकतंत्र पुनः स्थापित हुआ वहीं देश के सामने आज भी लोकतंत्र विरोधी राजनैतिक मानसिकता की चुनौती समाप्त नहीं हुई है। यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश के कई राजनैतिक दल पूरी तरह से अलोकतांत्रिक हो गए हैं तथा किसी न किसी वंश, परिवार या स्वार्थी तत्वों के समूह के बंधक बने हुए हैं। वे देश पर पुनः तानाशाही थोपने के लिए सत्ता प्राप्त करना चाहते हैं। ‘संविधान हत्या दिवस’ न केवल पूर्व में हुए ऐसे कुप्रयासों की याद दिलाता है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को लोकतंत्र को जीवित रखने के लिए दिए गए बलिदानों एवं संघर्षों का स्मरण भी दिलाता है। राष्ट्र को लोकतंत्र की रक्षा के लिए हमेशा सजग रहकर लोकतांत्रिक मूल्यों, आदर्शों एवं सिद्धांतों से प्रेरणा लेते हुए भविष्य में तानाशाही मानसिकता के विरुद्ध एकजुट रहना पड़ेगा।

