पं. दीनदयाल उपाध्याय पुण्यतिथि (11 फरवरी) पर विशेष
दीनदयाल उपाध्याय
भारतीय जनसंघ के 14वें वार्षिक अधिवेशन (28, 29 व 30 दिसम्बर 1967, श्री नारायण नगर, कालीकट) में तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष पं. दीनदयाल उपाध्याय द्वारा दिए गए अध्यक्षीय उद्बोधन का पहला भाग
प्रतिनिधि साथियों,
इस वर्ष आपने मुझे प्रधान के नाते कार्यभार सौंपा है। हमारा दल एक कार्यकर्ताओं का संघटन है। प्रत्येक कार्यकर्ता समान भाव से अधिकाधिक जिम्मेदारी और अहमअहमिकावृत्ति से काम में जुटा है। इस एकजुट एवं वर्धमान संघटन की संवैधानिक आवश्यकता की पूर्ति में आपने मेरे प्रति जो विश्वास प्रकट कर मुझे गौरव प्रदान किया है वह आपके हृदय की विशालता और स्नेहशीलता का परिचायक है। इस पूंजी के सहारे ही मैं पिछले पन्द्रह वर्षों से महामन्त्री के नाते काम करता रहा। आगे भी यही मेरा सम्बल रहेगा।
संक्रमण की वेला
आज हम दो युगों की सन्धिवेला में भगवान परशुराम की तपोभूमि केरल में मिल रहे हैं। विगत अर्थ-शताब्दी में देश के मन और मस्तिष्क पर कांग्रेस तथा उसकी विचारधारा का प्रभाव रहा। उसके नेता राष्ट्र की नीति के ही नहीं, उसके जीवन-मूल्यों के भी नियामक रहे। स्वराज्य के बाद शासन के सूत्र भी उन्हीं के हाथों में आये। उन्होंने जो कुछ किया उसका लेखा-जोखा लेने का यह अवसर नहीं है। इतना
आज हम दो युगों की सन्धिवेला में भगवान परशुराम की तपोभूमि केरल में मिल रहे हैं। विगत अर्थ-शताब्दी में देश के मन और मस्तिष्क पर कांग्रेस तथा उसकी विचारधारा का प्रभाव रहा। उसके नेता राष्ट्र की नीति के ही नहीं, उसके जीवन-मूल्यों के भी नियामक रहे। स्वराज्य के बाद शासन के सूत्र भी उन्हीं के हाथों में आये। उन्होंने जो कुछ किया उसका लेखा-जोखा लेने का यह अवसर नहीं है। इतना अवश्य कहना होगा कि सामान्य जन में राजनीतिक चेतना का जागरण इस युग की सबसे बड़ी देन है। यदि इस चेतना को तात्कालिक राजनीति की भूलभुलैयों से बचाकर एक भावात्मक राष्ट्रीय अधिष्ठान पर सृजन का साधन बनाया जाता तो हम और आगे बढ़ गये होते तथा आज की अनेक समस्याओं से मुक्त रहते
अवश्य कहना होगा कि सामान्य जन में राजनीतिक चेतना का जागरण इस युग की सबसे बड़ी देन है। यदि इस चेतना को तात्कालिक राजनीति की भूलभुलैयों से बचाकर एक भावात्मक राष्ट्रीय अधिष्ठान पर सृजन का साधन बनाया जाता तो हम और आगे बढ़ गये होते तथा आज की अनेक समस्याओं से मुक्त रहते। किन्तु देश में ऐसे अनेक लोग हैं जो या तो बीते युग से ही जकड़े हैं या राष्ट्रमानस से अनभिज्ञ अथवा उसके प्रति सहानुभूतिपूर्ण एवं अश्रद्धालु होने के कारण विदेशीपन से प्रभावित एवं व्यामूढ़ हैं। फलतः युग-परिवर्तन सहज न होकर संघर्षपूर्ण हो गया है। हमें सभी विद्यमान समस्याओं का विश्लेषण इस पार्श्वभूमि में करते हुए देश और काल के अनुसार अपनी नीति निर्धारित करनी होगी।
विकल्प की खोज
इस युग-संक्रमण का संकेत अगस्त-सितम्बर 1965 में ही मिल गया था, जबकि भारत की वीरवाहिनियों ने पाकिस्तानी आक्रमण के विरुद्ध अपने पराक्रम एवं विजिगीषा का परिचय दिया। किन्तु कांग्रेस शासन ने जो नीतियां बाद में अपनाई उनसे यह सिद्ध हो गया कि उसमें नये युग का साधन बनने का सामर्थ्य नहीं रहा। फलतः जनता आतुरता के साथ मुक्ति की कामना करने लगी। चतुर्थ आम चुनावों में अनेक प्रान्तों में कांग्रेस का पराभव इस प्रक्रिया का श्रीगणेश है। यदि गैर-कांग्रेसी दल अधिक मजबूत होते तो परिणाम और भी अच्छा रहता। अन्य सभी गैर-कांग्रेसी दलों की तुलना में जनसंघ की अधिक उपलब्धियां महत्वपूर्ण हैं। पर परिस्थिति की मांग के मुकाबले समाधानकारक नहीं हां, इतना अवश्य सिद्ध हो गया है। कि जनसंघ में एक विकल्प के रूप में विकसित होने के बीज विद्यमान हैं। चुनाव के बाद तेजी से बढ़ता हुआ जनसहयोग और संघटन का विस्तार इसी विश्वास का परिणाम है।
समस्याओं का स्वरूप
चुनाव के बाद तीन प्रकार की समस्यायें सामने आयी हैं। प्रथम तो वे प्रश्न हैं जिनका सम्बन्ध संक्रमण-काल की राजनीति से है। विभिन्न दलों के बीच जोड़-तोड़, मंत्रिमंडलों की अस्थिरता, दल-परिवर्तन आदि के प्रश्न इस कक्षा में आते हैं। दूसरी श्रेणी में वे प्रश्न आते हैं जिनके बीज भारत के संवैधानिक ढांचे में होते हुए भी जो पिछले वर्षों में उभरे नहीं थे अथवा उनका वर्तमान गंभीर रूप प्रकट नहीं हुआ था। केन्द्र और प्रान्तों के सम्बन्ध तथा अन्तरप्रान्तीय समस्याएं इस दृष्टि से उल्लेखनीय हैं। तीसरे वर्ग में देश की अर्थव्यवस्था, गृह, सुरक्षा तथा विदेश नीति सम्बन्धी प्रश्न हैं जो कांग्रेस शासन की गलत एवं अयथार्थवादी नीतियों के कारण आज काफी गंभीर बन गये हैं। सामयिक होने के कारण पहली श्रेणी के प्रश्नों की यद्यपि विशेष चर्चा हो रही है फिर भी वे इतने महत्वपूर्ण नहीं हैं। पर दूसरी और तीसरी श्रेणी के प्रश्न ऐसे हैं, जिनकी ओर ठीक ध्यान नहीं दिया गया तो देश की एकता और हितों को भारी खतरा पैदा हो सकता है।
राज्यपालों का व्यवहार
आम चुनावों के बाद दिल्ली और मद्रास को छोड़कर अन्य प्रान्तों में किसी भी एक दल के बहुमत में न आने के कारण पहला प्रश्न सरकार बनाने का था। जहां एक ओर गैर-कांग्रेसी दलों ने जनभावना का समादर करते हुए तथा परिस्थिति और प्रजातंत्रीय मांग को समझकर पंजाब, बिहार, पश्चिम बंगाल और
जहां एक ओर गैर-कांग्रेसी दलों ने जनभावना का समादर करते हुए तथा परिस्थिति और प्रजातंत्रीय मांग को समझकर पंजाब, बिहार, पश्चिम बंगाल और केरल में मिले-जुले मंत्रिमंडल बनाये, वहां दूसरी ओर राजस्थान और उत्तर प्रदेश में कांग्रेस ने जनक्षोभ के बावजूद, राज्यपालों के सहारे सत्ता हथियाई। उत्तर प्रदेश में तो वह सत्ता टिकाये नहीं रख पायी, किन्तु राजस्थान में उसने अनेक भ्रष्ट उपायों से अपना बहुमत काफी बढ़ा लिया है
केरल में मिले-जुले मंत्रिमंडल बनाये, वहां दूसरी ओर राजस्थान और उत्तर प्रदेश में कांग्रेस ने जनक्षोभ के बावजूद, राज्यपालों के सहारे सत्ता हथियाई। उत्तर प्रदेश में तो वह सत्ता टिकाये नहीं रख पायी, किन्तु राजस्थान में उसने अनेक भ्रष्ट उपायों से अपना बहुमत काफी बढ़ा लिया है। मिश्र-मंत्रिमंडल के पतन के समय मध्य प्रदेश में और हाल में पश्चिम बंगाल, हरियाणा और पंजाब में राज्यपालों ने जिन मनमाने ढंग से आचरण किया है उससे इस पद की प्रतिष्ठा को तथा संविधान को भारी आघात पहुंचा है। जब राज्यपाल केन्द्र के प्रतिनिधि हैं तो केन्द्र शासन को उनके व्यवहार की पूरी जिम्मेदारी संभालनी चाहिए। इस जिम्मेदारी से भागने का अर्थ यही है कि केन्द्र के नेताओं के मन में पाप है तथा वे टट्टी की ओट में शिकार खेलना चाहते हैं। इस अवसर पर कुछ क्षेत्रों में चुने हुए राज्यपालों की मांग की जा रही है। मैं इसे उपयुक्त नहीं समझता। यह रोग का इलाज नहीं। इससे केन्द्रापसारी वृत्ति के बढ़ने की ही संभावना है। विशेष अवसरों को छोड़कर राज्यपाल एक संवैधानिक प्रमुख मात्र है। उसे न तो प्रदेश सरकार की मुहर बनना चाहिए और न केन्द्र की दलीय सरकार का हस्तक। अतः इस पद पर ऐसे व्यक्तियों की नियुक्ति होनी चाहिए, जो सही माने में स्वविवेक का प्रयोग कर सकें, तथा जिनकी निष्पक्ष पात्रता में सन्देह की गुंजायश न हो। हारे हुए राजनीतिज्ञों अथवा सेवानिवृत्त न्यायधीशों को यह स्थान दें। सेवानिवृत्ति की तिथि के अनुसार इनकी तालिका बना ली जाय तथा जब राज्यपाल का स्थान रिक्त हो, तब उनकी क्रमानुसार नियुक्ति की जाय। इसमें न तो राज्य सरकार की सहमति का प्रश्न रहेगा और न गृह मंत्रालय की मर्जी का।
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मातृभूमि के अनन्य उपासक पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी को उनकी पुण्यतिथि पर सादर नमन। मूल्यों पर आधारित उनके सिद्धांत और विचार देश की हर पीढ़ी के लिए पथ-प्रदर्शक बने रहेंगे।
– नरेन्द्र मोदी, प्रधानमंत्री
राष्ट्रसेवा एवं समर्पण के प्रतीक, भारतीय जनसंघ के संस्थापक एवं हमारे मार्गदर्शक श्रद्धेय पं. दीनदयाल उपाध्याय जी की पुण्यतिथि पर उन्हें शत-शत नमन।
उनके एकात्म मानववाद और अंत्योदय की विचारधारा ने सेवा-भाव को राजनीति की आत्मा के रूप में स्थापित किया है, जो राष्ट्र निर्माण के पथ पर सदैव दिशा और प्रेरणा प्रदान करती रहेगी।।
– नितिन नवीन, भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष

