पुण्यश्लोक देवी अहिल्याबाई होलकर धर्म, संस्कृति और सेवा की अमर ज्योति

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तीन शताब्दियों पूर्व जन्मी अहिल्याबाई होलकर का जीवन त्याग, सेवा और राष्ट्र के प्रति समर्पण का अद्वितीय उदाहरण है। उन्होंने 18वीं सदी में धार्मिक और सामाजिक पुनर्जागरण की जिस मशाल को प्रज्वलित किया, उसकी रोशनी आज भी भारत के हृदय को आलोकित कर रही है

31 मई, 2025 को भारत महान मराठा महारानी पुण्यश्लोक देवी अहिल्याबाई होलकर की 300वीं जयंती मना रहा है। तीन शताब्दियों पूर्व जन्मी अहिल्याबाई होलकर का जीवन त्याग, सेवा और राष्ट्र के प्रति समर्पण का अद्वितीय उदाहरण है। उन्होंने 18वीं सदी में धार्मिक और सामाजिक पुनर्जागरण की जिस मशाल को प्रज्वलित किया, उसकी रोशनी आज भी भारत के हृदय को आलोकित कर रही है। यह प्रेरणादायक गाथा न सिर्फ इतिहास के पन्नों में दर्ज है, बल्कि राष्ट्रवादी चेतना में भी जीवंत है।

देवी अहिल्याबाई होलकर का जन्म 31 मई, 1725 को महाराष्ट्र के अहमदनगर ज़िले के चौंडी नामक गांव में हुआ था। एक साधारण किसान परिवार में जन्मी अहिल्या के पिता मानकोजी शिंदे उस क्षेत्र के पाटिल (ग्राम प्रधान) थे। मराठा सेनानायक मल्हारराव होलकर ने उनकी धार्मिक प्रवृत्ति और सहज

अहिल्याबाई ने मुगल काल और मध्ययुगीन आक्रमणों में ध्वस्त हुए सैकड़ों मंदिरों का पुनर्निर्माण करवाया। काशी विश्वनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार उनके सबसे महान कार्यों में से एक है, जिससे शिवनगरी काशी की आध्यात्मिक पहचान को पुनर्जीवित किया गया

बुद्धिमत्ता से प्रभावित होकर अपने पुत्र खंडेराव से उनका विवाह किया।

1754 में पति की युद्ध में मृत्यु और 1766 में ससुर मल्हारराव के देहांत के बाद उन्होंने मालवा रियासत की बागडोर संभाली। 1767 में उन्होंने विधिवत शासन संभाला और महेश्वर को राजधानी बनाकर, तुकोजीराव होलकर को सैन्य संचालन की जिम्मेदारी सौंपते हुए एक धर्मनिष्ठ, न्यायप्रिय और लोक-कल्याणकारी प्रशासन की नींव रखी।

अहिल्याबाई ने मुगल काल और मध्ययुगीन आक्रमणों में ध्वस्त हुए सैकड़ों मंदिरों का पुनर्निर्माण करवाया। काशी विश्वनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार उनके सबसे महान कार्यों में से एक है, जिससे शिवनगरी काशी की आध्यात्मिक पहचान को पुनर्जीवित किया गया।

उन्होंने गुजरात में सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण करवाकर भारत के सांस्कृतिक गौरव को फिर से स्थापित किया। इसके अतिरिक्त अयोध्या, मथुरा, द्वारका, उज्जैन, प्रयाग, त्र्यंबकेश्वर, बद्रीनाथ और रामेश्वरम जैसे तीर्थस्थलों में न सिर्फ मंदिरों का पुनर्निर्माण करवाया, बल्कि धर्मशालाएं, घाट, कुएं और यात्रियों के लिए सुविधाएं भी उपलब्ध कराईं।

देवी अहिल्याबाई का शासन लोकहित पर आधारित था। उन्होंने निर्धनों, दलितों, महिलाओं और उपेक्षितों के कल्याण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। न्यायप्रियता इतनी थी कि वे स्वयं दरबार में बैठकर जन-सुनवाई करती थीं और अपराधी चाहे कोई भी हो, उसे दंडित करती थीं।

उन्होंने भिक्षाटन, छुआछूत और स्त्री-वंचना जैसी सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध सामाजिक चेतना का निर्माण किया। विधवा जीवन की पीड़ा को स्वयं सहन करते हुए भी उन्होंने सती प्रथा का विरोध किया और समाज में महिलाओं की गरिमा बढ़ाई।

उनके प्रयासों से भिल, गोंड और अन्य जनजातियों को मुख्यधारा में जोड़ा गया। उन्होंने उन्हें खेती, सेवा और सैन्य क्षेत्र में अवसर देकर आत्मनिर्भर बनाया। महेश्वर को उन्होंने कला, वस्त्र (विशेषकर महेश्वरी साड़ी) और साहित्य का केंद्र बनाया, जहां संगीतज्ञों और विद्वानों को संरक्षण मिला।

आजादी के बाद अहिल्याबाई को जितना सम्मान मिलना चाहिए था, वह लंबे समय तक उपेक्षित रहा, लेकिन प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने उनके योगदान को राष्ट्र के समक्ष पुनः प्रतिष्ठित किया।

काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर के लोकार्पण अवसर पर प्रधानमंत्री ने विशेष रूप से देवी अहिल्याबाई को श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने मंदिर परिसर में उनकी भव्य प्रतिमा स्थापित करवाकर राष्ट्र को यह

संदेश दिया कि यह वही देवी थीं, जिन्होंने कठिन काल में मंदिर की महिमा को बचाकर रखा। प्रधानमंत्री श्री मोदी ने कहा, “काशी विश्वनाथ से सोमनाथ तक, भारत की सांस्कृतिक आत्मा को जिन्होंने पुनर्जीवित किया, वे देवी अहिल्याबाई होलकर आज भी हमारी प्रेरणा हैं।”

पुण्यश्लोक देवी अहिल्याबाई होलकर न केवल एक रानी थीं, बल्कि एक संस्कृति-संरक्षिका, जननीति-निर्माता और धर्मप्राण राष्ट्रनेता थीं। उन्होंने उस युग में मंदिरों को बचाया, जब आस्था पर आघात हो रहा था; उन्होंने समाज को जोड़ा, जब विभाजन और छुआछूत गहरा था; उन्होंने महिलाओं को सम्मान दिया, जब उनका कोई स्थान नहीं था

यह सिर्फ मूर्ति स्थापना नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक पुनर्पुष्टि थी – कि भारत अपने सनातन मूल्यों और पुनर्निर्माण के प्रतीकों को भूला नहीं है।

प्रधानमंत्री श्री मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार द्वारा शुरू की गई अनेक योजनाएं देवी अहिल्याबाई की नीति-दृष्टि की आधुनिक अभिव्यक्ति हैं। ‘स्वच्छ भारत अभियान’, ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’, ‘हर घर जल’, ‘प्रधानमंत्री आवास योजना’, ‘उज्ज्वला योजना’ आदि योजनाएं ठीक वैसी ही लोककल्याणकारी सोच को दर्शाती हैं, जिसे देवी अहिल्याबाई ने 18वीं सदी में अपने राज्य में लागू किया था।

गरीबों को भोजन, जल और आश्रय देने की जो भावना अहिल्याबाई के शासन में थी, वही आज मोदी सरकार की योजनाओं में स्पष्ट रूप से झलकती है। ‘सभी के लिए न्याय, सभी का विकास’ – यह मंत्र उसी परंपरा का विस्तार है।

पुण्यश्लोक देवी अहिल्याबाई होलकर न केवल एक रानी थीं, बल्कि एक संस्कृति-संरक्षिका, जननीति-निर्माता और धर्मप्राण राष्ट्रनेता थीं। उन्होंने उस युग में मंदिरों को बचाया, जब आस्था पर आघात हो रहा था; उन्होंने समाज को जोड़ा, जब विभाजन और छुआछूत गहरा था; उन्होंने महिलाओं को सम्मान दिया, जब उनका कोई स्थान नहीं था।

आज जब भारत ‘नए युग के राष्ट्र निर्माण’ की ओर अग्रसर है, तब देवी अहिल्याबाई होलकर की स्मृति हमें यह सिखाती है कि सच्चा नेतृत्व वह होता है जो धर्म, सेवा और समरसता के त्रिवेणी संगम से राष्ट्र को दिशा दे।

उनकी 300वीं जयंती, एक अवसर है — स्मरण का भी, संकल्प का भी।

जय पुण्यश्लोक अहिल्याबाई!
जय भारत!

(लेखक भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री हैं)