श्रद्धेय अटलजी जन्मशताब्दी पर विशेष
डॉ. शिव शक्ति नाथ बक्सी
अटलजी ने पीढ़ी-दर-पीढ़ी देश के लोगों को देशभक्ति एवं राष्ट्र प्रेम की भावना के साथ राष्ट्र हित में योगदान देने के लिए प्रेरित किया है। भारतीय राजनीति में एक विकल्प देने के उद्देश्य से शुरू हुआ एक राजनीतिक आंदोलन का उन्होंने दशकों तक नेतृत्व किया तथा वह भारत के पहले ऐसे गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री बने, जिन्होंने अपना कार्यकाल पूरा किया। भारतीय राजनीति में एक महान व्यक्तित्व अटलजी एक सच्चे राजनेता, लोकतंत्रवादी, नेतृत्वकर्ता, आम सहमति निर्माता और सबसे बढ़कर राजनीति में एक भद्र पुरुष थे। एक राजनेता और एक कवि के रूप में उन्हें देश के भीतर एवं सीमाओं से परे समान रूप से प्यार और प्रशंसा मिली। वह एक बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी थे और बचपन से ही
अटलजी प्रेस की स्वतंत्रता और लोकतंत्र में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका को समझते थे और इसमें दृढ़ विश्वास रखते थे। उनका हमेशा से मानना था कि प्रेस की स्वतंत्रता को बनाए रखने से लोकतंत्र मजबूत होगा। वह कहते थे, “प्रेस की स्वतंत्रता हमारे लोकतंत्र की एक मूल्यवान संपत्ति है”
विभिन्न क्षेत्रों में उनकी प्रतिभा की झलक देखने को मिलने लगी थी, यह कारण है कि उन्होंने आगे चलकर भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में भाग लिया। जहां एक ओर उनकी वक्तृत्व-कला एवं कविता के लिए उनकी प्रशंसा की गई, वहीं उनकी बौद्धिक क्षमताओं, लेखन कौशल और विभिन्न मुद्दों की समझ को बहुत कम उम्र में ही पहचान मिली, यही कारण है कि उन्हें राष्ट्रीय महत्व के कार्य सौंपे गए। उन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में भी एक अमिट छाप छोड़ी और सार्वजनिक जीवन में उच्च मानदंड स्थापित किए।
श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत एक पत्रकार के रूप में की और उन्हें अपने शुरुआती दिनों में राष्ट्रधर्म, पांचजन्य और दैनिक स्वदेश के संपादन की जिम्मेदारी सौंपी गई। पंडित दीनदयाल उपाध्याय, जो ‘राष्ट्रधर्म’ नाम से एक मासिक पत्रिका शुरू करने की योजना बना रहे थे, ने अटलजी को लखनऊ जाने के लिए कहा, जहां से पत्रिका का प्रकाशन होना था। श्री राजीव लोचन अग्निहोत्री के साथ अटलजी को ‘राष्ट्रधर्म’ पत्रिका के संपादन की जिम्मेदारी सौंपी गई, जिसे तुरंत सफलता मिली। ‘राष्ट्रधर्म’ के प्रशंसकों की संख्या बढ़ रही थी, वहीं वामपंथी बौद्धिक वर्ग के बीच इसकी बढ़ती प्रतिष्ठा से बेचैनी थी। अटलजी के लेखन ने उन्हें बौद्धिक बिरादरी के बीच एक सम्मानित व्यक्ति के रूप में स्थापित किया और ‘राष्ट्रधर्म’ एक राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त अग्रणी प्रकाशन बन गया। इस बीच ‘पांचजन्य’ का प्रकाशन शुरू हुआ और अटलजी को इसके संपादन की जिम्मेदारी भी सौंपी गयी। इसमें कोई संदेह नहीं था कि इसके पहले अंक की ही हर ओर व्यापक प्रशंसा हुई।
लेकिन जल्द ही 1948 में प्रशासन ने ‘राष्ट्रधर्म’ के कार्यालय को सील कर दिया और कर्मचारियों को जेल में डाल दिया। अटलजी किसी तरह बच निकले और कुछ समय तक इलाहाबाद में रहे। इसी बीच, न्यायालय ने ‘राष्ट्रधर्म’ के पक्ष में आदेश दिया और उसे पुनः प्रकाशन की अनुमति दे दी गई। अटलजी ने उसी कार्यालय से ‘दैनिक स्वदेश’ का प्रकाशन शुरू किया, लेकिन कार्यालय को फिर से सील कर दिया गया। इसके बाद अटलजी काशी चले गए और वहां से ‘चेतना’ नामक साप्ताहिक पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया। 1950 में उन्होंने फिर से ‘दैनिक स्वदेश’ के संपादक का दायित्व संभाला। लेकिन सरकार से कोई सहायता न मिलने के कारण एवं वित्तीय कठिनाइयों के चलते प्रकाशन अधिक समय तक नहीं चल सका। तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए सरकारी विज्ञापन मिलने की कोई संभावना नहीं थी। अटलजी को भारी मन से ‘दैनिक स्वदेश’ का प्रकाशन बंद करना पड़ा और उन्होंने अंतिम संपादकीय ‘अलविदा’ में अपनी पीड़ा व्यक्त की। इसके बाद वह लखनऊ से दिल्ली चले गए और ‘वीर अर्जुन’ का संपादन किया। उनके नेतृत्व में ‘वीर अर्जुन’ ने भी ख्याति अर्जित करना शुरू कर दिया, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। जब भारतीय जनसंघ का गठन हुआ, तो अटलजी को इस नवगठित राजनीतिक दल की नींव मजबूत करने के लिए भेजा गया। फिर, बाकी सब इतिहास है।
अटलजी प्रेस की स्वतंत्रता और लोकतंत्र में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका को समझते थे और इसमें दृढ़ विश्वास रखते थे। उनका हमेशा से मानना था कि प्रेस की स्वतंत्रता को बनाए रखने से लोकतंत्र मजबूत होगा। वह कहते थे, “प्रेस की स्वतंत्रता हमारे लोकतंत्र की एक मूल्यवान संपत्ति है।” वह समाज में संपादकों द्वारा निभाई जाने वाली महत्वपूर्ण भूमिका को बहुत महत्व देते थे और कहते थे, “संपादक को समाज के प्रति उत्तरदायी होना चाहिए और स्वयं के प्रति सच्चा होना चाहिए। किसी को आत्मा के विरुद्ध काम नहीं करना चाहिए, लेकिन यह आवश्यक है कि पहले आत्मा को जीवित रखा जाए।” उनका मानना था कि सरकार एवं मीडिया के बीच एक स्वस्थ संबंध होना चाहिए और वह किसी भी प्रेस सेंसरशिप के पक्ष में नहीं थे। उनका मानना था कि “सरकार को सेंसरशिप की व्यवस्था को लागू करने जैसे कठोर कदम उठाने से पहले प्रेस के प्रतिनिधियों के साथ बातचीत करनी चाहिए।” उन्हें भारतीय मीडिया की कर्तव्य भावना पर बहुत भरोसा था, वह कहते थे, “कुछ अपवादों को छोड़कर; भारतीय प्रेस ने पत्रकारिता के उच्च मानदंड को बनाए रखा है।”
उन्हें आने वाली पीढ़ी के पत्रकारों से भी उम्मीदें थीं और उनकी प्रतिभा एवं पेशे के प्रति प्रतिबद्धता पर भरोसा था। उन्होंने कहा, “आज के पत्रकार अधिक जानकार, अधिक मेहनती, अधिक खोजी और अधिक आक्रामक हैं।” 12 जुलाई, 1998 को नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स के 11वें द्विवार्षिक अधिवेशन को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि हमारे देश में मीडिया को और अधिक शक्तिशाली होना चाहिए। ऐसी स्थिति पैदा होनी चाहिए कि वह अंतरराष्ट्रीय मीडिया से प्रतिस्पर्धा कर सके। ऐसा करने के लिए उन्होंने मीडिया में गुणवत्ता, मानक और दक्षता बनाए रखने पर जोर देना होगा और समाचारों का चयन इस तरह करना होगा कि वह समाज एवं राष्ट्र के हित में हो। पत्रकारिता की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा, “समाज का मनोबल ऊंचा होना चाहिए, बुराइयों को उजागर किया जाना चाहिए, इसमें कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन कुल मिलाकर प्रेस का रवैया ऐसा होना चाहिए कि देश के लोगों के मन में देश के बारे में सही तस्वीर बने और बाहरी लोग भी हमारे बारे में सच्चाई से आकलन कर सकें।”
अटलजी राजनीति में सक्रिय हो गए, लेकिन पत्रकारिता के दिनों को उन्होंने हमेशा संजोकर रखा। उन्होंने एक बार कहा था, “मैं एक अच्छा पत्रकार बनना चाहता था, लेकिन राजनीति की कठिन जमीन में उलझ गया। राजनीति ने मेरे कवि मन का गला घोंट दिया है। अब मैं एक वाचाल बन गया हूं।”
अटलजी पत्रकारिता के पेशे के सामने आने वाली समस्याओं से भी अवगत थे। उन्होंने कहा, “पत्रकारिता कभी मिशन थी, फिर पेशा बनी और अब व्यवसाय बनती जा रही है।” 12 जुलाई 1998 को नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स के 11वें द्विवार्षिक अधिवेशन को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, “मैंने अपना सार्वजनिक जीवन भी अखबार से ही शुरू किया था। तब अखबार में काम करना एक मिशन था। देश गुलाम था, आजादी की लड़ाई चल रही थी और हर कोई उस यज्ञ में अपनी आहुति देना चाहता था। आज पत्रकारिता का चेहरा बदल गया है। यह एक व्यवसाय बन गया है। व्यवसायी होने में कोई बुराई नहीं है। लेकिन इसका लक्ष्य सिर्फ पैसा कमाना नहीं होना चाहिए, छपने वाली चीजें दिल और दिमाग पर असर करने वाली होनी चाहिए।” 27 अगस्त, 1999 को लखनऊ में हिंदी साप्ताहिक पत्रिका पायनियर के विमोचन के अवसर पर उन्होंने पत्रकारिता की जिम्मेदारियों एवं समाज में विचारों को लेकर उसके कर्तव्य पर जोर दिया। उन्होंने कहा, “जिन अखबारों के पास संसाधनों की कमी है, उन्हें विचारों के आधार पर आगे बढ़ना होगा। अखबारों को झूठ उजागर करने में संकोच नहीं करना चाहिए, लेकिन यह काम सही तरीके से होना चाहिए। यह सही है कि अखबार भी एक उद्योग है, लेकिन यह साबुन और तेल बेचने जैसा उद्योग नहीं है। पत्रकारिता की अपनी मान्यताएं और उद्देश्य हैं। इसकी जिम्मेदारी कहीं अधिक है। अगर पत्रकारिता उच्च उद्देश्य पर आधारित नहीं होगी, तो मुश्किलें आएंगी।
मैं खुद पत्रकार रहा हूं, इसलिए अखबारों को जिन मुश्किलों से गुजरना पड़ता है, उससे मैं भलीभांति अवगत हूं। अब पत्रकारिता में प्रतिस्पर्धा बहुत बढ़ गई है और अखबारों की प्रतिस्पर्धा टीवी चैनलों से है, जो हर आधे घंटे पर समाचार देते हैं। लेकिन खुशी की बात है कि इसके बावजूद न तो अखबारों की लोकप्रियता कम हुई है और न ही उनकी उपयोगिता पर कोई प्रतिकूल असर पड़ा है। किसी भी अखबार के लिए समाचार के साथ-साथ विचार भी उतने ही महत्वपूर्ण होते हैं। खासकर जिनके पास संसाधन कम हैं, उन्हें विचारों की ताकत के आधार पर आगे बढ़ना होगा।”
अटलजी ने भारतीय राजनीति में एक अनूठी और गौरवशाली विरासत छोड़ी है। वास्तव में वह भारत की उस भावना के प्रतिनिधि थे, जहां लोकतांत्रिक परंपराओं ने राष्ट्र के सामाजिक-सांस्कृतिक ताने-बाने को आकार दिया है। वह राजनीतिक दल और शासन में लोकतांत्रिक कार्यप्रणाली में विश्वास करते थे,
अटलजी ने भारतीय राजनीति में एक अनूठी और गौरवशाली विरासत छोड़ी है। वास्तव में वह भारत की उस भावना के प्रतिनिधि थे, जहां लोकतांत्रिक परंपराओं ने राष्ट्र के सामाजिक-सांस्कृतिक ताने-बाने को आकार दिया है। वह राजनीतिक दल और शासन में लोकतांत्रिक कार्यप्रणाली में विश्वास करते थे, लेकिन राजनीति में आपातकाल और तानाशाही प्रवृत्तियों का वह हमेशा विरोध करते थे
लेकिन राजनीति में आपातकाल और तानाशाही प्रवृत्तियों का वह हमेशा विरोध करते थे। उनका राष्ट्रवाद लोकतांत्रिक भावना से ओत-प्रोत था, जिसमें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सरोकारों के विभिन्न मुद्दों पर आम सहमति बनाने की परंपरा के माध्यम से भारतीय समाज की विविधताओं को संबोधित किया जाता था।
अपने लंबे संसदीय जीवन में वह विपक्ष में रहते हुए भी महत्वपूर्ण मुद्दों पर अपनी अमिट छाप छोड़ने में सफल रहे। राष्ट्र को प्रभावित करने वाली विभिन्न समस्याओं पर उनकी पकड़ के कारण ही उन्होंने राष्ट्रीय लोकाचार और मूल्य प्रणाली के दायरे में समाधान खोजने का प्रयास किया। वह एक ऐसे नेता थे, जो जमीन से जुड़े थे और अपनी राजनीतिक अंतर्दृष्टि के लिए जाने जाते थे, जिससे पता चलता था कि उनमें एक सच्चा पत्रकार सदैव विद्यमान रहा।
वह लंबे समय तक राजनीति जीवन में रहे, जहां उन्हें लोगों का प्यार, स्नेह और सम्मान मिला। वह एक उत्कृष्ट वक्ता थे और अपनी करिश्माई अपील से लोगों को मंत्रमुग्ध कर देते थे। देश उन्हें प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहता था और देश की जनता के बढ़ते समर्थन से यह सपना साकार हुआ। प्रधानमंत्री के रूप में उन्होंने हर मोर्चे पर देश का नेतृत्व किया और उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की। भारत एक शांतिपूर्ण परमाणु शक्ति संपन्न देश के रूप में उभरा, जिसने अंतरराष्ट्रीय आर्थिक प्रतिबंधों के बावजूद भी खुद पर भरोसा बनाए रखा। एक सच्चे ‘अटल’ की तरह वह कभी दबाव में नहीं झुके, न ही एक संपादक के रूप में और न ही एक राजनेता के रूप में। उन्होंने सुशासन और विकास की एक नई गाथा लिखी, साथ ही बुनियादी ढांचे को बढ़ावा दिया और भारत को विभिन्न मोर्चों पर ‘आत्मनिर्भर’ बनाया। जैसाकि अटलजी ने अपने एक भाषण में कहा था, उन्होंने काल के कपाल पर एक अमिट छाप छोड़ी है। उनके द्वारा दिखाया गया मार्ग उभरते हुए नए भारत के लिए मार्गदर्शक बन गया है।

