भारत के शैक्षिक क्षेत्र में परिवर्तन के पीछे की सच्चाई

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    एक पक्षपातपूर्ण सोच से प्रेरित होकर यह धारणा बनाई जा रही है कि मोदी सरकार के पिछले ग्यारह वर्षों में हमारी शिक्षा प्रणाली पटरी से उतर गई है। वास्तव में, इससे अधिक विडंबनापूर्ण एवं असत्य और कुछ भी नहीं हो सकता। जिस देश ने पिछली कांग्रेस सरकारों द्वारा शिक्षा प्रणाली की घोर उपेक्षा देखी है, वह सच्चाई से पूर्ण रूप से वाकिफ है। एक वह समय भी था जब दुनिया भर के राष्ट्र तेजी से विकसित होती दुनिया के अनुरूप अपनी शिक्षा प्रणाली का विकास कर रहे थे, वहीं भारत का शैक्षिक ढांचा समय के कुचक्र में फंस गया था। हमारी शिक्षा प्रणाली में आखिरी प्रमुख नीतिगत सुधार 1986 में हुआ था, जिसमें 1992 में मामूली संशोधन किया गया। यह औपनिवेशिक मानसिकता से प्रेरित एक सोची-समझी साजिश थी, जो भारत की समृद्ध ज्ञान परंपराओं को कमजोर करके देखती थी, साथ ही इसी सोच ने तेजी से बदलती तकनीकी विकास से देश को वंचित रखा।

पिछली सरकारों में भ्रष्टाचार एवं कुशासन देश के शैक्षिक ढांचें की विशेषताएं बन गये थे। जहां एक ओर सार्वजनिक विश्वविद्यालय धन की कमी का सामना कर रहे थे, वहीं गैर मान्यता प्राप्त निजी संस्थान डिग्री मिलों में बदल गए थे। जो लोग सीमित सोच रखते हैं, उन्हें 2009 का ‘डीम्ड यूनिवर्सिटी’ घोटाला याद दिलाने की आवश्यकता है, इसके सामने आने के बाद पता चला कि कैसे 44 निजी संस्थानों को उचित मूल्यांकन के बिना विश्वविद्यालय का दर्जा दे दिया गया था, जिनमें से कई बाद में वित्तीय अनियमितताओं के दोषी पाए गए। शिक्षा में राजनीतिक हस्तक्षेप व्याप्त था। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग और अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद् अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन नहीं कर रहे थे।

विश्वविद्यालय के पदों की नियुक्तियां राजनीतिक निष्ठा के आधार पर होती थीं। पाठ्यपुस्तकों में जानबूझकर शहीद भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, वीर सावरकर और अन्य क्रांतिकारियों के योगदान को कम करके आंका गया, जबकि विदेशी आक्रमणों के बारे में असहज ऐतिहासिक सत्यों को चित्रित किया गया। राजनीतिक हितों की पूर्ति के लिए ऐतिहासिक आख्यानों को सावधानीपूर्वक तैयार किया गया। भारत की विविध सांस्कृतिक और बौद्धिक परंपराओं को व्यवस्थित रूप से हाशिए पर रखा गया। इन सभी ने एक ऐसी शिक्षा प्रणाली को तैयार किया जो हमारे गौरवशाली अतीत के एक दम विपरीत थी।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 इस कलंकपूर्ण अतीत पर पूर्णविराम लगाने का प्रयास करती है। यह भारत के इतिहास में सबसे व्यापक लोकतांत्रिक परामर्श का परिणाम है। प्रमुख वैज्ञानिक और इसरो के पूर्व अध्यक्ष डॉ. के. कस्तूरीरंगन ने इस टीम का नेतृत्व किया और राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 का मसौदा तैयार करने वाली समिति के अध्यक्ष के रूप में राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के लाखों हितधारकों से विचार-विर्मश किया। देखा जाए तो पहुंच, समानता, गुणवत्ता, सामर्थ्य एवं जवाबदेही के पांच स्तंभों पर आधारित ‘एनईपी 2020’ लोगों की, लोगों के द्वारा और लोगों के भविष्य के लिए एक नीति है।

एनईपी 2020 का एक प्राथमिक उद्देश्य असमानताओं को ठीक करना है। इस परिवर्तनकारी दृष्टिकोण के परिणामस्वरूप 2014-15 से उच्च शिक्षा में एससी उम्मीदवारों के नामांकन में 50 प्रतिशत, एसटी में 75 प्रतिशत और ओबीसी में 54 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। आदिवासी क्षेत्रों में विशेष आवासीय विद्यालयों ने साक्षरता दर में वृद्धि की है और आदिवासी छात्रों के लिए विशेष छात्रवृत्ति ने उच्च शिक्षा में उनकी भागीदारी को बढ़ाया है।

शिक्षा के क्षेत्र में लैंगिक समानता में अभूतपूर्व प्रगति के साथ महिला सशक्तीकरण इन सुधारों के केंद्र में है। सभी श्रेणियों में महिला उम्मीदवारों के नामांकन में 38.8 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जो 2022-23 में 2.18 करोड़ को पार कर गया है। मुस्लिम अल्पसंख्यक छात्रों में महिला नामांकन में 57.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। बोर्ड परीक्षाओं में कक्षा 10 और 12 में 60 प्रतिशत से अधिक अंक प्राप्त करने वाली लड़कियों की संख्या में क्रमशः 72 प्रतिशत और 77 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। उच्च शिक्षा में महिलाओं के बीच पीएचडी नामांकन में 135 प्रतिशत की भारी वृद्धि हुई है। सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि उच्च शिक्षा STEMM (विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग, गणित और चिकित्सा) क्षेत्रों में अब महिलाओं की संख्या 43 प्रतिशत है, इस प्रकार पुरुषों के वर्चस्व वाले क्षेत्रों में अब महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ रहा है। शिक्षण कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी 44.23 प्रतिशत हैं, जो 2014 में 38.6 प्रतिशत थी। यह सभी मानक भारत के शैक्षणिक पारिस्थितिकी तंत्र में एक मौलिक बदलाव की ओर इशारा करते हैं। वहीं अब महिलाएं हमारे देश की बौद्धिक यात्रा में अपना उचित स्थान पुनः प्राप्त कर रही हैं।

ये कदम हमारी प्राथमिकताओं में एक मौलिक बदलाव को दर्शाते हैं। ऐसे ही प्रति बच्चा सरकारी व्यय 2013-14 के 10,780 रुपये से बढ़कर 2021-22 में 25,043 रुपये हो गया, यह बढ़ोतरी 130 प्रतिशत की है। सरकार बच्चों के समग्र एवं संज्ञानात्मक विकास पर ध्यान केन्द्रित कर रही है। सरकारी स्कूलों को आधुनिक बुनियादी ढांचे, समग्र शिक्षा और अन्य सहायता प्रणाली के साथ उन्नत किया जा रहा है। इन ठोस प्रयासों के परिणामस्वरूप स्कूल न जाने वाले बच्चों की संख्या और साथ ही ड्रॉप-आउट दरों में कमी आई है; छात्र शिक्षक अनुपात में सुधार हुआ है; और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सीखने की प्रक्रिया में लगातार सुधार हो रहा है।

एनईपी 2020 ने मध्य विद्यालय स्तर से कोडिंग, समस्या-समाधान के लिए बहु-विषयक दृष्टिकोण और ग्रामीण क्षेत्रों में नवाचार केंद्र जैसी भविष्यपरक पहलों की शुरुआत की है। 10,000 से अधिक अटल टिंकरिंग लैब्स जमीनी स्तर पर नवाचार को बढ़ावा दे रही हैं। 3,000 से अधिक कौशल विकास केंद्र शिक्षा और रोजगार के बीच की खाई को पाट रहे हैं। ये पहल भारत के भविष्य के लिए शिक्षा की एक मौलिक पुनर्कल्पना का प्रतिनिधित्व करती हैं। हमारे युवा पुराने घोषणापत्र और पुराने नारों से ज्यादा के हकदार हैं। सरकार की योजना अगले पांच सालों में स्कूलों में ब्रॉडबैंड इंटरनेट कनेक्टिविटी के साथ 50,000 और एटीएल स्थापित करने की है।

एनईपी 2020 ने मध्य विद्यालय स्तर से कोडिंग, समस्या-समाधान के लिए बहु-विषयक दृष्टिकोण और ग्रामीण क्षेत्रों में नवाचार केंद्र जैसी भविष्यपरक पहलों की शुरुआत की है

उच्च शिक्षा में स्थायी राजस्व मॉडल ने विश्वविद्यालयों को संसाधनों पर निर्भरता से मुक्त कर दिया है। भारत के अब 11 विश्वविद्यालय QS वर्ल्ड रैंकिंग के शीर्ष 500 में हैं, जो कि अतीत की तुलना में उल्लेखनीय सुधार है। 2015 से शोध प्रकाशनों में 88 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जिससे भारत वैश्विक नवाचार सूचकांक में 39वें स्थान पर पहुंच गया है, जो 2014 में 76वें स्थान पर था। अनुसंधान— राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन उद्योग-अकादमिक सहयोग को बढ़ावा दे रहा है, जिससे भारत एक उभरती हुई ज्ञान अर्थव्यवस्था और सीखने के लिए एक वैश्विक गंतव्य के रूप में स्थापित हो रहा है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस नीति ने उन सभी भारतीय भाषाओं और ज्ञान परंपराओं की गरिमा को बहाल किया है, जो दशकों से चली आ रही ‘अंग्रेजी-प्रथम’ नीतियों के कारण पीछे रह गयी थी। भारतीय ज्ञान प्रणाली (आईकेएस) पहल के माध्यम से 8,000 से अधिक उच्च शिक्षा संस्थानों ने आईकेएस पाठ्यक्रम को अपनाया है। भारतीय भाषा पुस्तक योजना के माध्यम से 22 भारतीय भाषाओं में 15,000 मूल और अनूदित पाठ्यपुस्तकें प्रकाशित की जाएंगी, जिससे लाखों युवा को अपनी मातृभाषा में पढ़ने का लाभ मिलेगा।

सामाजिक न्याय के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता केंद्रीय शैक्षणिक संस्थानों (शिक्षकों के कैडर में आरक्षण) अधिनियम, 2019 के अधिनियमन से परिलक्षित हुई, जिसमें अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य लोगों के लिए केंद्रीय शैक्षणिक संस्थानों में शिक्षण पदों के आरक्षण के लिए ‘संस्था को एक इकाई’ के रूप में माना गया, न कि ‘प्रत्येक विभाग को एक इकाई’ के रूप में मानने की घोर दोषपूर्ण प्रणाली को जारी रखा गया। इसी तरह, सरकार ने आरक्षण को वास्तव में सार्थक बनाने के लिए विश्वविद्यालय भर्तियों में एससी/एसटी/ओबीसी श्रेणियों के उम्मीदवारों को अस्वीकार करने के लिए ‘कोई भी उपयुक्त नहीं पाया गया’ घोषित करने और इन्हें गैर-आरक्षित पदों के रूप में परिवर्तित करने की प्रथा को समाप्त कर दिया।

ये उपलब्धियां लाखों सशक्तीकरण की गाथाओं का प्रतिनिधित्व करती हैं। ओडिशा की एक आदिवासी लड़की गुणवत्तापूर्ण डिजिटल शिक्षा प्राप्त कर रही है, राजस्थान में पहली पीढ़ी की एक छात्रा उन्नत शोध कर रही है, तमिलनाडु में एक छात्रा अपनी मातृभाषा में इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रही है— ये सब उस नीति के वास्तविक परिणाम हैं जो शिक्षा को राष्ट्रीय परिवर्तन की एक शक्ति के रूप में देखती है।

हमारी सरकार एक ऐसे ‘विकसित भारत’ के निर्माण पर केंद्रित है, जहां शिक्षा वास्तव में मुक्ति और सशक्तीकरण प्रदान करती है। आने वाला दशक एक शैक्षिक पुनर्जागरण का गवाह बनेगा, जो हमारे अतीत का सम्मान करते हुए निडरता से भविष्य को गले लगाएगा। भारत की शिक्षा प्रणाली अंततः औपनिवेशिक छाया और वैचारिक कैद से मुक्त हो गई है। यह अब न केवल लाखों भारतीयों के सपनों को पूरा करने के लिए तैयार है, बल्कि दुनिया को एक ऐसा मॉडल पेश करने के लिए तैयार है जो परंपरा को नवाचार, समावेश को उत्कृष्टता और राष्ट्रीय गौरव को वैश्विक प्रासंगिकता के साथ सामंजस्य स्थापित करता है। यह केवल शिक्षा सुधार नहीं है— यह बौद्धिक उपनिवेशवाद का उन्मूलन है जिसका भारत लंबे समय से इंतजार कर रहा है जो भारत को विकसित देशों की श्रेणी में पहुंचा देगा।

(लेखक केंद्रीय शिक्षा मंत्री हैं)