भारत रत्न श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी स्वतंत्र भारत के सबसे जनप्रिय और सम्मानित राजनेताओं में से एक हैं। व्यक्तित्व, वक्तृत्व व कृतित्व से मिलकर बने उनके नेतृत्व ने भारतीय जनता पार्टी को एक सशक्त राजनीतिक शक्ति के रूप में स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी जीवन यात्रा एक अद्वितीय प्रतिभा, राजनीतिक कुशलता और दूरदर्शी नेतृत्व से परिपूर्ण थी और उन्होंने भाजपा को एक नवोदित संगठन से भारतीय राजनीति के युगान्तकारी राजनैतिक प्रभावों को जन्म देने वाले विराट संगठन के रूप में उभरने की आधारशिला प्रदान की। और इसी नींव पर आज दुनिया की सबसे बड़ी राजनैतिक दल के रूप में भाजपा विराजमान है।
अटलजी ने भाजपा के द्वारा भारत के उस सांस्कृतिक और आर्थिक पुनर्जागरण की आधारशिला रखी, जो 21वीं सदी में मोदी जी के अगुआई में वैश्विक नेतृत्व में अग्रणी भूमिका निभाने के लिए पूरी तरह तैयार है।
बीज जो वटवृक्ष बना
अटल जी की राजनीतिक यात्रा उनके राष्ट्र के प्रति अटूट समर्पण और प्रतिकूल परिस्थितियों में अनुकूलन, नवाचार और नेतृत्व क्षमता का प्रमाण है। छात्र जीवन में ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ से जुड़ने से लेकर भारतीय जनसंघ (बीजेएस) के संस्थापक सदस्य बनने और बाद में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को सत्ता के शीर्ष तक पहुंचाने में, वाजपेयी जी का रास्ता समर्पण, दृढ़ता और दूरदर्शिता से भरा हुआ था।
वाजपेयी जी की वैचारिक नींव राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से उनकी प्रारंभिक संबद्धता से गहराई से प्रभावित थी। इस जुड़ाव ने उनके राष्ट्रवाद और शासन के दृष्टिकोण को आकार दिया। 1951 में उन्होंने डॉ. श्यामा प्रसाद मुकर्जी के साथ भारतीय जनसंघ की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
जनसंघ के शुरुआती दिनों में वाजपेयी जी ने सक्रिय रूप से ‘कश्मीर सत्याग्रह’ में भाग लिया, जो जम्मू और कश्मीर राज्य को लेकर भारतीय नागरिकों पर लगाए गए प्रतिबंधों को हटाने की वकालत करता था। उन्होंने लियाकत-नेहरू समझौते का कड़ा विरोध भी किया, जो श्री मुखर्जी के मजबूत और एकीकृत भारत के दृष्टिकोण के अनुरूप था। इन मुद्दों पर उनकी स्पष्टता और दृढ़ विश्वास ने उन्हें पार्टी में एक सम्मानित नेता और राष्ट्रीय स्तर पर एक प्रभावशाली स्वर बनाया। यह उनकी अद्वितीय नेतृत्व क्षमता का प्रमाण था, जिसने भारतीय राजनीति को नई दिशा देने की नींव रखी।
वाजपेयी जी की वैचारिक नींव राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से उनकी प्रारंभिक संबद्धता से गहराई से प्रभावित थी। इस जुड़ाव ने उनके राष्ट्रवाद और शासन के दृष्टिकोण को आकार दिया। 1951 में उन्होंने डॉ. श्यामा प्रसाद मुकर्जी के साथ भारतीय जनसंघ की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जनसंघ के शुरुआती दिनों में वाजपेयी जी ने सक्रिय रूप से ‘कश्मीर सत्याग्रह’ में भाग लिया, जो जम्मू और कश्मीर राज्य को लेकर भारतीय नागरिकों पर लगाए गए प्रतिबंधों को हटाने की वकालत करता था। उन्होंने लियाकत-नेहरू समझौते का कड़ा विरोध भी किया, जो श्री मुखर्जी के मजबूत और एकीकृत भारत के दृष्टिकोण के अनुरूप था
1957 में निर्वाचित होकर संसद पहुंचे अटल बिहारी वाजपेयी जी के तिब्बत संकट और 1962 के चीन के आक्रमण पर दिए गए भाषणों ने देश पर गंभीर और अमिट छाप छोड़ी। उनकी वाक्पटुता और गहन विश्लेषण ने उन्हें भारतीय राजनीति में एक प्रमुख स्वर के रूप में स्थापित किया। वह भारतीय जनसंघ का प्रमुख चेहरा बन गए, जो अपने करिश्मे और जनता से जुड़ने की अद्वितीय क्षमता के लिए जाने जाते थे। सीमित संसाधनों के बावजूद वाजपेयी जी ने देशभर में लगातार यात्राएं कीं, ज्यादातर ट्रेन, बस या सड़क मार्ग से और अक्सर पार्टी कार्यकर्ताओं के घरों में ठहरते थे। ये जमीनी प्रयास जनसंघ के संगठनात्मक ढांचे को मजबूत करने में अत्यंत महत्वपूर्ण थे।
1962 के चीन का आक्रमण भारतीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। कांग्रेस पार्टी से जनता का मोहभंग बढ़ने लगा और विपक्षी नेताओं के बीच गठबंधन बनने शुरू हो गए। पंडित दीनदयाल उपाध्याय के नेतृत्व में जनसंघ ने एक मजबूत संगठनात्मक संरचना विकसित की, जिसके परिणामस्वरूप 1967 के चुनावों में महत्वपूर्ण चुनावी सफलताएं मिलीं। पार्टी ने राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में बहुमत हासिल किया और उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और पंजाब जैसे राज्यों में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई। यही वह दौर था जब अटल जी को नेहरू जी ने कहा था कि यह युवा सांसद एक दिन उनकी कुर्सी पर आसीन होगा।
पंडित दीनदयाल उपाध्याय के असामयिक निधन के बाद अटल बिहारी वाजपेयी ने जनसंघ का नेतृत्व

1975-77 के आपातकाल का दौर वाजपेयी और जनसंघ दोनों के लिए एक निर्णायक समय था। उन्होंने निरंकुशता का विरोध करने और लोकतांत्रिक मानदंडों की बहाली की वकालत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। चुनौतियों के बावजूद उनके नेतृत्व ने सुनिश्चित किया कि पार्टी अपने सिद्धांतों के प्रति अडिग रहे। आपातकाल के बाद बना जनता पार्टी का संक्षिप्त प्रयोग अंततः असफल साबित हुआ, जिससे गठबंधन के भीतर जनसंघ असहज हो गया
संभाला। पार्टी के मूल सिद्धांतों को बनाए रखते हुए और व्यापक राजनीतिक गठबंधनों की आवश्यकता को संतुलित करते हुए उन्होंने एक सम्मानित राष्ट्रीय नेता के रूप में अपनी पहचान बनाई। 1971 के युद्ध के दौरान वाजपेयीजी ने दलगत राजनीति से ऊपर उठकर सरकार को अपना पूर्ण समर्थन देकर अपनी परिपक्वता और राष्ट्रीय दृष्टिकोण का परिचय दिया। 1974 में उन्होंने श्री जयप्रकाश नारायण द्वारा शुरू किए गए आंदोलन में जनसंघ की सक्रिय भागीदारी का नेतृत्व किया, जिससे लोकतंत्र और न्याय के लिए लड़ाई को मजबूती मिली।
1975-77 के आपातकाल का दौर वाजपेयीजी और जनसंघ दोनों के लिए एक निर्णायक समय था। उन्होंने निरंकुशता का विरोध करने और लोकतांत्रिक मानदंडों की बहाली की वकालत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। चुनौतियों के बावजूद उनके नेतृत्व ने सुनिश्चित किया कि पार्टी अपने सिद्धांतों के प्रति अडिग रहे। आपातकाल के बाद बनी जनता पार्टी का संक्षिप्त प्रयोग अंततः असफल साबित हुआ, जिससे गठबंधन के भीतर जनसंघ असहज हो गया।
भाजपा— भारत के राष्ट्रवाद का समवेत स्वर
1980 में जनता पार्टी गठबंधन के विघटन के बाद अटल जी ने भारतीय जनसंघ को पुनर्गठित कर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के रूप में स्थापित करने में अहम भूमिका निभाई। भाजपा के पहले अध्यक्ष के रूप में वाजपेयी जी ने पार्टी की वैचारिक नींव रखी, जिसमें राष्ट्रवादी जड़ों को व्यापक राष्ट्रीय हितों के साथ जोड़ने का प्रयास किया गया। उनके नेतृत्व में भाजपा ने समाजवाद और भारतीय राष्ट्रवाद को अपने मार्गदर्शक सिद्धांतों के रूप में अपनाया, जिससे पार्टी को एक मध्यमार्गी दृष्टिकोण मिला। वाजपेयी जी की उदार छवि और समावेशिता पर जोर ने व्यापक जनसमर्थन आधार जुटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके नेतृत्व ने भाजपा के शुरुआती संघर्षों के दौरान पार्टी को जीवित रखा और धीरे-धीरे मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टी के रूप में स्वीकार्यता दिलाई। पार्टी का मत प्रतिशत 1984 के 7.74% से बढ़कर 1991 में 20.1% हो गया और यह अटल जी के नेतृत्व की देन थी।
वाजपेयी जी की सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि उन्होंने राष्ट्रवाद को इस तरह प्रस्तुत किया जो भारतीय मतदाताओं के साथ समवेत स्वर हुआ। कठोर रुख अपनाने वाले नेताओं से अलग वाजपेयी जी का दृष्टिकोण उदारता और व्यावहारिकता से प्रेरित था, इसका लाभ विशेष रूप से कठिन समय में परिलक्षित हुआ। 1992 के बाद वाजपेयी जी के नेतृत्व ने भाजपा को उस राजनीतिक अलगाव से उबरने में मदद की और इसके बाद पार्टी ने क्षेत्रीय दलों के साथ रणनीतिक गठबंधन बनाने में सफलता प्राप्त की।
गठबंधन धर्म के वास्तविक नेता
2009 तक अपने 65 वर्षों के सक्रिय सार्वजनिक जीवन में अटल जी ने लगभग 56 वर्ष विपक्ष में और केवल नौ वर्ष सत्ता में बिताए। उनेक राजनैतिक जीवन की यह यात्रा भविष्य में शुचिता और सिद्धांतों की राजनीति की मार्गदर्शिका सिद्ध होगी। 1990 के दशक में वाजपेयी का नेतृत्व भारतीय जनता पार्टी के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ था। गठबंधन राजनीति की जटिलताओं को सुलझाने की उनकी क्षमता उस समय स्पष्ट हुई जब वह 1996 में भारत के प्रधानमंत्री बने, हालांकि यह कार्यकाल केवल 13 दिनों का था। परन्तु अटल जी के संसद में दिए भाषण ने सम्पूर्ण भारत के विपुल जनसमुदाय को अपने भावनाओं में बांध लिया। अटल जी के साथ हुए राजनैतिक छल का उत्तर जनता 1998 में अपने वोटों से दिया और फिर से अटल जी ने सत्ता में वापसी की।
1998 से 2004 तक अपने कार्यकाल के दौरान वाजपेयी जी ने 20 से अधिक पार्टियों के गठबंधन को एकजुट रखने में अद्वितीय राजनैतिक क्षमता का प्रदर्शन किया। यह भारतीय संविधान में लोकतंत्र की भावना और उसकी अखंडता को स्वीकार कर सबको साथ चलने का एक अनोखा उदाहरण था। उनकी सरकार की स्थिरता ने इस विचार को खारिज कर दिया कि गठबंधन सरकारें स्वाभाविक रूप से कमजोर होती हैं। उनके नेतृत्व में भाजपा का सीट शेयर 1998 के आम चुनावों में महत्वपूर्ण रूप से बढ़कर 182 तक पहुंच गया, जो उनकी व्यापक लोकप्रियता और रणनीतिक दूरदृष्टि का प्रमाण था।
उत्कृष्ट संगठन शिल्पी
अटल जी का नेतृत्व भाजपा में एकता को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण था, वे अक्सर पार्टी के विभिन्न दृष्टिकोणों के बीच मध्यस्थता करते थे। उनके मध्यम दृष्टिकोण ने भाजपा को एक राष्ट्रवादी पार्टी के रूप में कांग्रेस से अलग देश को लिए एक बेहतर और विश्वसनीय विकल्प के रूप में विकसित किया।
वाजपेयी जी के प्रधानमंत्री बनने के दौरान ऐतिहासिक आर्थिक सुधारों की शुरुआत हुई। भ्रष्टाचार विहीन, शुचिता-पारदर्शिता पूर्ण शासन ने भाजपा की पहचान एक साफ-सुथरी पार्टी के रूप में पहचान दिया। गोल्डन क्वाड्रिलैटरल हाईवे परियोजना और प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना ने भारत की आधारभूत संरचना में क्रांति ला दिया। तमाम परियोजनाएं जो कनेक्टिविटी बढ़ाने और आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के उद्देश्य से बनाई गई थीं, इसने भाजपा की छवि को एक विकासात्मक पार्टी के रूप में मजबूत किया।
वाजपेयी जी की विदेश नीति के सार्थक क़दमों, जिसमें लाहौर बस सेवा और पाकिस्तान के साथ आगरा शिखर सम्मेलन शामिल, अमेरिका-इजराइल के साथ संबंधों में गहराई ने उनके शांति, विकास और संवाद के प्रति समर्पण को उजागर किया। कारगिल युद्ध जैसे चुनौतियों के बावजूद अटल जी के राजनैतिक कौशल ने भारत की वैश्विक स्थिति को बेहतर किया। 1998 में परमाणु परीक्षणों का निर्णय भारत की रणनीतिक स्वतंत्रता को प्रदर्शित करता है, जिसने उन्हें एक निर्णायक नेता के रूप में स्थापित किया।
अपने ओजस्वी भाषणों के लिए प्रसिद्ध वाजपेयीजी के भाषण अक्सर जनमानस में गहरी छाप छोड़ते थे।
1998 से 2004 तक अपने कार्यकाल के दौरान वाजपेयी जी ने 20 से अधिक पार्टियों के गठबंधन को एकजुट रखने में अद्वितीय राजनैतिक क्षमता का प्रदर्शन किया। यह भारतीय संविधान में लोकतंत्र की भावना और उसकी अखंडता को स्वीकार कर सबको साथ चलने का एक अनोखा उदाहरण था। उनकी सरकार की स्थिरता ने इस विचार को खारिज कर दिया कि गठबंधन सरकारें स्वाभाविक रूप से कमजोर होती हैं। उनके नेतृत्व में भाजपा का सीट शेयर 1998 के आम चुनावों में महत्वपूर्ण रूप से बढ़कर 182 तक पहुंच गया, जो उनकी व्यापक लोकप्रियता और रणनीतिक दूरदृष्टि का प्रमाण था
जटिल मुद्दों को सरलता से समझाने और काव्यात्मक शैली में प्रस्तुत करने की उनकी क्षमता ने उन्हें अपने समय के सबसे लोकप्रिय नेताओं में से एक बना दिया। उनका यह आकर्षण भाजपा के लिए विभिन्न वर्गों से समर्थन जुटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता था।
विरासत और दूरगामी प्रभाव
अटल बिहारी वाजपेयी जी के योगदान भाजपा के लिए मौलिक और क्रातिकारी थे। उनके कार्यकाल ने भाजपा को एक सीमांत राजनीतिक दल से एक प्रबल शक्ति में बदल दिया, जो भारत की राजनीतिक धारा को आकार देने में सक्षम बनी। उनके नेतृत्व में भाजपा ने न केवल राजनीतिक वैधता हासिल की, बल्कि नरेन्द्र मोदीजी जैसे वैश्विक नेताओं के नेतृत्व के लिए आधारशिला का निर्माण किया।
वाजपेयी जी का यह दृष्टिकोण कि वैचारिक प्रतिबद्धता को व्यावहारिक शासन के साथ जोड़ना चाहिए, भाजपा के लिए एक नीति निर्देशक तत्व बनकर रणनीति और दृष्टिकोण को प्रेरित करता है।
अटल बिहारी वाजपेयी जी का भाजपा के निर्माण में योगदान अतुलनीय है। भारतीय जनसंघ को एक आधुनिक राजनीतिक दल में बदलने से लेकर भारत को परिवर्तनकारी वर्षों से गुजरते हुए नेतृत्व देने तक, उनकी दृष्टि और नेतृत्व आज भी प्रेरणा का स्रोत बने हुए हैं। उनकी विरासत केवल उस नेता की नहीं है जिसने अपनी पार्टी को सत्ता के शीर्ष तक पहुंचाया, बल्कि एक ऐसे राजनेता की भी है जिसने एक प्रगतिशील, समावेशी और वैश्विक रूप से सम्मानित भारत की कल्पना की। भाजपा की शासन पद्धति और विचारधारा में अटल जी का प्रतिबिम्ब मौजूद है, जिससे वह भारतीय लोकतंत्र और राजनीतिक कुशलता के एक स्थायी प्रतीक बने हुए हैं।
(लेखक भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री एवं राज्यसभा सांसद हैं)

