गतांक का शेष…
विभाजन की स्मृति पंजाब के सामूहिक चित्त में आज भी उतनी ही गहराई से बनी हुई है। जिन परिवारों ने सब कुछ खो दिया, उन्होंने यूं ही ‘आगे बढ़कर भूल जाओ’ नहीं कर दिया – हां, उन्होंने नए सिरे से जीवन जरूर खड़ा किया, लेकिन अपने अतीत को सीने में संजोकर रखा। वे उस शहर या गांव का नाम मरते दम तक जिह्वा पर रखते रहे, जो पीछे छूटा था – लोकगीतों में, लोरियों में, उनके पकवानों के ज़ायकों में, उनकी दुआओं में वह ज़िक्र ज़िंदा रहा। भला भूलते भी कैसे? जिस मां की नज़र के सामने उसकी औलाद मार दी गई हो, वह कैसे भूल सकती है? जिस दादा ने ‘भूतिया ट्रेन’ में अमृतसर पहुंचकर अपने पूरे परिवार को खोया हो, वह क्या ख़ाक भूल पाएगा? जिन्होंने अपनी जान पर खेलकर यह सफ़र काटा, उन्होंने इंसानियत का नर्क भी देखा और उसका उजाला भी। उन्होंने कुछ पागल उन्मादियों को वहशीपन पर उतरते देखा, तो दूसरे अजनबियों को अपनी जान जोख़िम में डालकर दूसरों को बचाते भी देखा। दरअसल, भयानक खूनी हिंसा के बीच असंख्य मिसालें इंसानियत की भी दिखीं – किसी हिन्दू पड़ोसी ने अंतिम क्षणों में अपने मुस्लिम दोस्त का परिवार छिपा लिया और बचा दिया; किसी सिख किसान ने आसपास के मुसलमान गांवों को हथियारबंद गिरोहों से सुरक्षा दी; अनजाने हिंदू परिवारों ने अपनी बची-खुची रोटियां भूखे मुसाफ़िरों में बांट दीं। पंजाब हमें ये सीख देता है कि अलग-अलग मज़हबों और जातियों का मिलकर रहना अनमोल है, लेकिन नाज़ुक भी है और एक बार अगर अविश्वास का बीज बो दिया जाए तो भड़की नफ़रत की आग में हम सब जलते हैं, कोई नहीं बचता। विभाजन का दर्द, जिसे 1947 में भारत के पंजाब एवं बंगाल को बांटकर हम पर थोपा गया, ने भारत की आत्मा पर गहरा घाव बना दिया। वह घाव एक चेतावनी है कि हम फिर कभी ऐसे ज़हर को अपने समाज में मत पनपने दें।
जहां पश्चिम में पंजाब बंटवारे का सबसे बड़ा रणक्षेत्र बना, वहीं पूरब में बंगाल भी लहूलुहान हुआ। रैडक्लिफ़ रेखा ने पूर्व में बंगाल को दो टुकड़ों में काट दिया – पश्चिम बंगाल भारत में रहा और पूर्वी बंगाल, जो आगे चलकर पूर्वी पाकिस्तान बना। पंजाब की तरह ही, बंगाल का बंटवारा भी अचानक, बिना तैयारी के और निर्दयता से लागू किया गया। कोलकाता जैसे चहल-पहल से भरे शहर शरणार्थियों
विभाजन का दर्द, जिसे 1947 में भारत के पंजाब एवं बंगाल को बांटकर हम पर थोपा गया, ने भारत की आत्मा पर गहरा घाव बना दिया। वह घाव एक चेतावनी है कि हम फिर कभी ऐसे ज़हर को अपने समाज में मत पनपने दें
के विशाल शिविरों में बदल गए, जहां पूर्वी बंगाल के कस्बों और गांवों से दंगों और लक्षित हत्याओं से भागकर पहुंचे लाखों हिंदू आश्रय लेने लगे। नोआखाली और टिपेरा में आज़ादी से पहले ही पूरे के पूरे हिंदू गांव उजाड़ दिए गए थे, जिससे लोग अपना घर-बार छोड़कर भागने को मजबूर हुए। सदियों से व्यापार और संस्कृति की धड़कन रही बंगाल की नदियां अब भागते हुए परिवारों की जीवनरेखा बन गईं। नावों, बैलगाड़ियों और पैदल – जैसे भी हो सके – लोग पार जाने लगे, लेकिन बहुत-से अपने प्रियजन रास्ते में हिंसा या कठिन यात्रा में खो बैठे।
बंगाल की त्रासदी का दर्द अलग तरह का था। यहां हिंसा अचानक भड़कती और फिर लंबे समय तक भय और अभाव का माहौल बना रहता। 1946 में कोलकाता और नोआखाली के सांप्रदायिक दंगे पहले ही सामाजिक ताने-बाने को चीर चुके थे। 1947 आते-आते वह अविश्वास एक विशाल पलायन में बदल गया। अगले कुछ वर्षों में 30 लाख से अधिक हिंदू पूर्वी बंगाल से भारत आए, जिससे पश्चिम बंगाल के शहर और गांव क्षमता से अधिक भर गए। कोलकाता, हावड़ा और सिलीगुड़ी के किनारों पर शरणार्थी शिविर उग आए, जहां न तो पर्याप्त स्वच्छता थी और न ही भोजन। पंजाब की तरह ही, बंगाल के विस्थापित अपने साथ सिर्फ़ शारीरिक घाव ही नहीं, बल्कि उजड़े घरों, अपवित्र किए गए मंदिरों और छूट चुकी पुश्तैनी ज़मीनों की पीड़ा भी लेकर आए। बंगाल का यह दर्द याद दिलाता है कि विभाजन कोई एक नहीं, बल्कि दो महाविपत्तियां थीं, जो भारतीय उपमहाद्वीप के दो सिरों पर अलग-अलग रूप में घटीं, पर मानव त्रासदी के बोझ में समान थीं।
इसी असहनीय पीड़ा की पराकाष्ठा को स्वीकारते हुए प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने 2021 में ऐलान किया कि अब से हर वर्ष 14 अगस्त को ‘विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस’ के रूप में मनाया जाएगा। सात दशक बाद आज़ाद भारत ने यह क़दम उठाया है तो यह महज़ सांकेतिक भर नहीं है। यह सच के सम्मान और श्रद्धांजलि का कार्य है। इतने वर्षों तक विभाजन के ज़िंदा बचे गवाहों की कहानियां घर-परिवार तक ही सिमटी रहीं या धुंधली चिट्ठियों में दफ़न रहीं। अब, इस दिन को औपचारिक स्मृति-दिवस घोषित करके हम उन कहानियों को राष्ट्रीय कथा-प्रवाह का हिस्सा बना रहे हैं। प्रधानमंत्री मोदी जी ने उचित ही कहा था, “विभाजन की पीड़ाएं कभी भुलाई नहीं जा सकतीं। नफ़रत और हिंसा के कारण लाखों बहनों-भाइयों को अपना घर छोड़ना पड़ा, कितनों ने अपनी जान गंवाई।” उन्होंने यह भी प्रार्थना की कि यह दिवस हम सभी को ‘भेदभाव, वैमनस्य और दुर्भावना के ज़हर को ख़त्म करने की जरूरत’ सतत याद दिलाए और समाज में एकता व सद्भावना की भावना को मज़बूत करे। इस तरह मानो प्रधानमंत्री ने वो बात कह दी जो हर हिंदुस्तानी अपने दिल में महसूस करता है: कि हमारी राष्ट्रीय एकता अनमोल भी है और बहुत मूल्य चुकाकर हासिल की गई है – 1947 के शहीदों के लहू से सींचकर मिली है। जब पूरे देश में आधिकारिक रूप से विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस मनाया जाता है, तो ये हमारा अतीत के साथ किया गया एक वादा होता है – कि हम अपनी जनता के उस कष्ट को सम्मानपूर्वक याद रखेंगे और उन लाखों आत्माओं का बलिदान जिन्हें आज़ादी की सुबह देखने को नहीं मिली, उन्हें नमन करेंगे। यह हमारा भविष्य के साथ भी किया गया वादा है कि आने वाली हर पीढ़ी को हम बताएंगे कि साम्प्रदायिक नफ़रत का विष कितना प्रलयंकारी हो सकता है, ताकि वैसी भूल फिर दोहराई न जाए।
भारतीय जनता पार्टी के लिए और मेरे स्वयं के लिए भी, यह संकल्प अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। भाजपा सदैव ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ के सिद्धांत पर चली है – जिसमें हमारे राष्ट्र की बहुलता में एकता को उत्सव की तरह मनाया जाता है और उसकी रक्षा को सर्वोपरि कर्तव्य माना जाता है। विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस इसी प्रतिबद्धता का हिस्सा है। यह सुनिश्चित करता है कि हम न अतीत को भुलाएं न उसके सबक़ों से आंख मूंदें। मैं स्वयं पंजाब की संतानों में से हूं और एक भारतीय होने के नाते बचपन से अपने घर में विभाजन की कहानियां सुनता आया हूं – बुज़ुर्गों की भर्राई आवाज़ों में वो दास्तानें सुनी हैं जिन्होंने वह क़हर अपनी आंखों देखा था। उन शहीदों और पीड़ितों के प्रति मैं गहरा कर्तव्यभाव महसूस करता हूं। हम भाजपा में यह कटिबद्ध हैं कि उन कुर्बानियों को कभी भुलाया नहीं जाने देंगे, न ही उन्हें व्यर्थ जाने देंगे। विभाजन की विभीषिका को याद रखना हमारे लिए देश की एकता को मज़बूत करने का एक साधन है, क्योंकि इससे हम उन बांटने वाली ताक़तों को पहचान पाते हैं, जो कभी हमारे बीच फूट डालने की कोशिश करेंगी। चाहे वह सांप्रदायिकता हो, जातिवाद हो या किसी भी प्रकार की घृणा की राजनीति – हमें उसे पूरी शक्ति से नकारना होगा, क्योंकि हमने जान लिया है कि ऐसा ज़हर फलता-फूलता है तो पूरा देश जल उठता है। आज प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत अपने इतिहास – उसके गौरव और उसके दर्द – दोनों का साहस के साथ सामना कर रहा है। यह ईमानदार आत्म-मंथन हमें और सबल बनाता है। यह हमारी एकता को और मजबूत सीमेंट की तरह जोड़ता है, क्योंकि जो राष्ट्र अपने सबसे बड़े दुःख को याद रखता है, वह अपनी वर्तमान एकता की रक्षा और भी चौकसी से करेगा।
आज प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत अपने इतिहास – उसके गौरव और उसके दर्द – दोनों का साहस के साथ सामना कर रहा है। यह ईमानदार आत्म-मंथन हमें और सबल बनाता है। यह हमारी एकता को और मजबूत सीमेंट की तरह जोड़ता है, क्योंकि जो राष्ट्र अपने सबसे बड़े दुःख को याद रखता है, वह अपनी वर्तमान एकता की रक्षा और भी चौकसी से करेगा।
विभाजन को अब अठहत्तर वर्ष होने को आए। दुनिया काफ़ी बदल चुकी है, भारत ने फिर अपने को नई ऊंचाइयों पर स्थापित कर लिया है। और उस भीषण समय के कई प्रत्यक्षदर्शी अब इस दुनिया में नहीं रहे। लेकिन उनका कर्ज़ उतारना अभी बाक़ी है – उनकी कहानी सुनाना, उनके दुःख से सीखना अभी हमारा दायित्व है। हम यह दास्तान इसलिए बयां नहीं करते कि फिर से दिलों में कड़वाहट जागे – बिल्कुल नहीं। हम इसे इसलिए सुनाते हैं कि उनके धैर्य और जिजीविषा को सलाम कर सकें, और खुद को याद दिलाएं कि ऐसी फूट दोबारा हमारे राष्ट्र में कभी नहीं पड़ने देनी। इस विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस पर, जब देशभर में लोग मोमबत्तियां जलाकर, सायरन बजाकर श्रद्धांजलि अर्पित करेंगे, तब मेरी आंखों के आगे एक तस्वीर उभरती है: अमृतसर की एक वृद्धा अपने यादों के संदूक़ को धीरे से खोल रही है। उसमें पुराने कपड़ों और पीतल के बर्तनों के बीच रखी है उस घर की लोहे की चाबी, जिसे वह 1947 में पीछे छोड़ आई थी। वह कांपते हाथों से उसे उठाती है। चाबी ज़ंग खा चुकी है, छूने में ठंडी है, पर उस दादी अम्मा के लिए वह सोने से भी ज्यादा क़ीमती है। उस चाबी में दर्द और गौरव की मिश्रित कहानी बसी है: दर्द उस समूची दुनिया के उजड़ जाने का, गौरव इस बात का कि इतनी विषमता के बीच भी उन्होंने अपना आत्मसम्मान, अपना परिवार, अपनी आस नहीं छोड़ी। वह वृद्धा 1947 की त्रासदी से बच निकली और यह तय किया कि उसके बच्चे उस जैसा दु:ख दोबारा ना झेलें। आज वह चाबी एक चेतावनी भी है और एक मशाल भी। चेतावनी इस बात की कि यदि नफ़रत का दानव हावी हो जाए तो घर-बार जलते देर नहीं लगती और राष्ट्र तक बिखर जाते हैं। और मशाल इस मायने में कि यादों और एकता का प्रकाश हमें भविष्य के अंधेरे रास्तों में दिशा दिखाता रहेगा – यह यक़ीन कि हम सब मिलकर सुनिश्चित करें कि दुश्मनी की वह आंधी फिर कभी न उठे जिसने किसी ज़माने में लाखों लोगों को ताले लगाकर सदा के लिए अपने घर छोड़ने पर मजबूर कर दिया था। हमारे अतीत की ये चाबियां हमें आगाह करती हैं कि भारत के भविष्य को वैसा ज़ख़्म फिर न झेलना पड़े। ये प्रतीक हैं कि हमें अपना देश ऐसा बनाना है जहां फिर कोई मज़बूर न हो कि अपना घर-आंगन, अपनी मिट्टी को हमेशा के लिए अलविदा कहे। और यही इन चाबियों का सबक़ है कि एक भारत श्रेष्ठ भारत सिर्फ नारा नहीं अपितु एकता एकजुटता का विजय मंत्र, राष्ट्र मंत्र है, हमारी नींव है और नफ़रत के अंधेरे का मुक़ाबला सिर्फ़ प्यार और मजबूत एकता के उजाले से किया जा सकता है और हमें हमेशा इसी रोशनी को थामे रखना है।
(लेखक भाजपा राष्ट्रीय महामंत्री हैं)

