स्वतंत्रता पर- नव संकल्प

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15 अगस्त को देश स्वतंत्रता का उत्सव उत्साह के साथ मना रहा है। हमको स्वतंत्र हुए 78 वर्ष पूर्ण हो जाएंगे। 15 अगस्त के अपने प्रथम भाषण में पंडित जवाहर लाल नेहरू ने कहा था कि भारत पुनः स्वयं को खोज रहा है। उन्होंने कहा था कि हमारा लक्ष्य होना चाहिए कि हर आंख से आंसू मिटे, भविष्य हमें बुला रहा है हमें कहां जाना है और हमें क्या करना चाहिए जिससे हम आम आदमी, किसानों और श्रमिकों के लिए स्वतंत्रता और अवसर दे सकें, हम निर्धनता मिटा सकें, एक समृद्ध लोकतान्त्रिक प्रगतिशील देश बना सके। कोई भी देश तब तक महान नहीं बन सकता जब तक उसके लोगों की सोच या कर्म संकीर्ण हो। उनके इस भाषण को इतिहास में ‘नियति से मिलन’ (Tryst With Destiny) नाम से उल्लेखित किया गया। 78 वर्षों की स्वतंत्रता की यात्रा में हमने बहुत कुछ प्राप्त किया है जो प्रत्येक भारतीय को गर्व करने योग्य है। लेकिन अभी भी बहुत कुछ ऐसा है जो प्राप्त होना चाहिए था लेकिन नहीं हुआ। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने स्वतंत्रता के 100 वर्ष पूर्ण होने तक एक महत्वाकांक्षी लक्ष्य संपूर्ण देशवासियों को दिया है जो हमें प्राप्त करना है। उस लक्ष्य को उन्होंने ‘विकसित भारत’ के नाम से संबोधित किया है। अमृत काल की इस कालावधि मे प्रत्येक भारतीय का एक ही लक्ष्य होना चाहिए ‘विकसित भारत’।

संस्कृत सुभाषितकार ने कहा कि “उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः। न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः।” केवल आकांक्षा एवं कल्पना मात्र से लक्ष्य प्राप्ति नहीं होती उसके लिए कठोर परिश्रम, निरंतर साधना एवं कष्ट सहन करना पड़ता है। भारत के लाखों-करोड़ों लोगों ने जब अपना संकल्प स्वतंत्रता प्राप्ति बनाया एवं उसकी प्राप्ति के लिए कठोर यातनाएं सहीं, तब लंबे संघर्ष के बाद

भारत के लाखों-करोड़ों लोगों ने जब अपना संकल्प स्वतंत्रता प्राप्ति बनाया एवं उसकी प्राप्ति के लिए कठोर यातनाएं सहीं, तब लंबे संघर्ष के बाद हमें स्वतंत्रता प्राप्त हुई। आज भी 140 करोड़ देशवासियों का संकल्प ‘विकसित भारत’ बनना चाहिए। हमारा व्यवहार, हमारे प्रयास, हमारी आकांक्षाएं हमारे लक्ष्य प्राप्ति में सहायक बननी चाहिए

हमें स्वतंत्रता प्राप्त हुई। आज भी 140 करोड़ देशवासियों का संकल्प ‘विकसित भारत’ बनना चाहिए। हमारा व्यवहार, हमारे प्रयास, हमारी आकांक्षाएं हमारे लक्ष्य प्राप्ति में सहायक बननी चाहिए। हम अपनी न्यूनताओं को कम करें एवं गुणों का संवर्धन करें। समाज को जोड़ने वाले तत्वों को विकसित करते हुए रचनात्मक कार्यों से सकारात्मकता द्वारा समाज का विश्वास बढ़ाएं। बहुआयामी प्रयास करते हुए हम भविष्य के भारत को गढ़ने में अपना रचनात्मक सहयोग दें। अपने जीवन एवं व्यवहार में अनेक गुणों का समावेश समायोचित रहेगा।

सांस्कृतिक स्वाभिमान: भारत एक प्राचीन देश है। हमारी संस्कृति सर्वकल्याणमयी एवं सर्वसमावेशी है। कोरोना काल में विश्व ने उसके दर्शन भी किए हैं। विदेशी इतिहासकारों द्वारा हमारी संस्कृति, इतिहास, भाषा एवं परम्पराओं के प्रति हमारे मन में एक आत्महीनता का भाव निर्माण किया गया था। जिससे हम अपने को ही तुच्छ मानने लगे, इसी का परिणाम है कि हमारे महापुरुषों के प्रति हमारे मन में ग्लानि का भाव है। विश्व में भारत ही केवल ऐसा देश होगा जो अपनी दिशा ही निर्धारित नहीं कर पा रहा है। जो अपने महापुरुषों में दोष एवं आक्रमणकारियों में श्रेष्ठता खोजता है इसी का परिणाम है कि शिवाजी–औरंगजेब, महाराणा प्रताप- अकबर, टीपू सुल्तान जैसे विषयों पर विवाद एवं आतंकवादियों का महिमामंडन करता है। इस ग्लानि भाव से बाहर आकर इस देश की संस्कृति, परंपरा एवं स्वतंत्रता की रक्षा करने वाले ही हमारे आदर्श हैं, यह स्थापित करना होगा। यह स्वाभिमान ही हमको आगे बढ़ने की प्रेरणा दे सकता है।

कार्य संस्कृति: अपनी निष्ठा, समर्पण के कारण अभावयुक्त होने के बाद भी हमारे साथ स्वतंत्र हुए देशों ने आर्थिक क्षेत्र में हमसे अधिक प्रगति की है। उदाहरणस्वरूप जापान ने अपने अनुशासन युक्त व्यवहार के बल पर 1960 के दशक में दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनकर ‘Made in Japan’ को गुणवत्ता का प्रतीक बना दिया। हमारे लिए विचारणीय विषय है कि विशाल जनसमूह, प्रचुर भौतिक संसाधन एवं गौरवमय विरासत होने के बाद भी हम उतनी प्रगति नहीं कर पाए, आज भी गरीब की आंखों में आंसू हैं। आजीविका के लिए निर्धारित घंटों में हम वास्तव में कितने घंटे काम करते हैं, इसका विचार करें। हमारा व्यवहार भ्रष्टाचार रहित एवं प्रामाणिक जीवन हो। संपूर्ण देश का स्वभाव समय पालन का बने, तब हम उत्पादन एवं कार्य के परिणाम दोनों में परिवर्तन ला सकते हैं।

स्वास्थ्य चेतना: प्रधानमंत्री जी ने अपने अनेक संबोधनों में स्वास्थ्य के प्रति सचेत करते हुए बढ़ते मोटापे पर चिंता व्यक्त की है। इससे बचने के लिए उन्होंने अपने भोजन में 10% तेलीय पदार्थ कम करने का आग्रह भी किया है। आज अनेक सर्वेक्षण बच्चों सहित बड़ी संख्या में गंभीर रोगों के ग्रसित होने का आकलन कर रहे हैं। द लैंसेट (The Lancet) द्वारा 60 हजार लोगों पर हुए सर्वेक्षण के अनुसार 45 वर्ष एवं उसके ऊपर के लोगों में 20% मधुमेह से ग्रसित थे, जिनमे से 40% अपने रोग के प्रति अनजान थे। “स्वस्थ व्यक्ति ही स्वस्थ राष्ट्र की गारंटी हो सकता है।” हम दैनिक व्यायाम, पाचनयुक्त भोजन एवं व्यवस्थित दिनचर्या से इसमें परिवर्तन ला सकते हैं।

आत्मनिर्भरता: दुनिया के अनेक देश अपने देश की गिरती अर्थव्यवस्था से चिंतित हैं। अमेरिका द्वारा भारत पर लगने वाला मनमाना टैरिफ इसका उदाहरण है। हम आर्थिक साम्राज्यवादी शक्तियों से स्वदेशी एवं आत्मनिर्भरता के मंत्र को अपनाकर उन पर अपनी निर्भरता कम कर सकते हैं। हम अपने उत्पादन में गुणवत्ता के लिए प्रयास करें, रोजगारपरक स्टार्टअप नीति अपनाए एवं दैनिक उपयोग में स्वदेशी का आग्रह करें। जो स्वदेशी का मंत्र स्वतंत्रता का आधार बना था वह स्वदेशी मंत्र ही हमको आत्मनिर्भर भी बना सकता है।

भाषा स्वाभिमान: भाषा अभिव्यक्ति का माध्यम है। प्रत्येक भाषा का अपना एक भाव जगत है। भारत की प्रत्येक भाषा परस्पर आबद्ध है। उसमें प्रयोग होने वाले मुहावरे, लोकोक्ति एवं कहावतें भी समान भाव से युक्त हैं। उच्चारण भिन्न होने के बाद भी भाव एक ही रहता है। गुरुवर रवीन्द्र नाथ टैगोर ने कहा था “भाषा केवल बोलने का माध्यम नहीं, यह राष्ट्र की चेतना एवं संस्कृति का संवाहक है।” दुर्भाग्यवश आज भी हमारे देश में कुछ स्थानों पर भाषा के नाम पर विवाद होते हैं। भाषा को वोट प्राप्ति का माध्यम बनाया जा रहा है। हमें परकीय भाषा अच्छी लग रही है जिसके कारण सभी प्रादेशिक भाषाओं पर संकट है और अपने ही देश की भाषा से दूरी लगती है। हम एक दूसरे की भाषा जानें, आदर करें, व्यवहार में उपयोग कर सकें इसलिए सीखें। भाषा जोड़ने का माध्यम बने इसका प्रयास करें।

पर्यावरण: उपभोगवादी जीवन शैली के कारण आज हमने पर्यावरण के सम्मुख संकट खड़ा किया है। जिसके कारण अन्न, जल, वायु जिस पर हमारा जीवन निर्भर है सभी विषयुक्त बना है। इसी कारण गांधी जी ने कहा था, “प्रकृति हमारी आवश्यकता की पूर्ति कर सकती है, हमारे लालच की नहीं।” हम सादगी

हमें परकीय भाषा अच्छी लग रही है जिसके कारण सभी प्रादेशिक भाषाओं पर संकट है और अपने ही देश की भाषा से दूरी लगती है। हम एक दूसरे की भाषा जानें, आदर करें, व्यवहार में उपयोग कर सकें इसलिए सीखें। भाषा जोड़ने का माध्यम बने इसका प्रयास करें

युक्त जीवन शैली धारण करें। प्रकृति में उपलब्ध पेड़-पौधों, जीव-जंतु आदि के संरक्षण का संकल्प लें, जो आज समाप्त हो रहे हैं। जैविक खेती, जल संरक्षण, पर्यावरण संरक्षण एवं स्वच्छता हमारे दैनंदिन जीवन का अंग बनें। यह सभी हमारे पूर्वजों ने अपने दैनिक व्यवहार से हमें सिखाया था, हम भी उसका पालन करें।

समरसता एवं एकात्मता: हमारे देश की विशालता के कारण इसमें विविधताओं का भंडार है। रंग-रूप, खान-पान, भाषा, लिंग, जाति, पूजा-पद्धति, ऊंच-नीच आदि में यह विविधता प्रकट होती है। इसी विविधता को अज्ञानवश कुछ लोग विभेद के रूप में स्थापित करते है। हम सभी भारत मां की संतान होने के कारण से एक है। हमारे मित्र एवं शत्रु भी समान ही है। इस शाश्वत सत्य को समझकर हम एकात्म भाव से युक्त रहें। विविधता में एकता के सूत्र खोजकर उसकी वृद्धि के लिए प्रयास करें। यह समरसता युक्त व्यवहार ही हमको चिरंजीवी बना सकता है।

नागरिक कर्तव्य: किसी भी देश का विकास केवल सरकारों से नहीं, उसके साथ खड़ी संस्कारयुक्त, कर्तव्यनिष्ठ, जागृत जनशक्ति के द्वारा होता है। हमें इस दायित्व बोध से युक्त समाज बनना है। हमारी जिम्मेदारी है कि हम देश के विकास के लिए शत-प्रतिशत मतदान करके अपने कर्तव्य का निर्वाह करें। मैं विशेष (VIP) हूं, के अधिकारभाव से बाहर आकर सेवाभाव से देश के संसाधनों के संरक्षण की भूमिका, ऊर्जा, जल आदि के संरक्षण के लिए आवश्यक एवं सीमित उपयोग करना, अपने चारों ओर सुरक्षित वातावरण बनाने में सहयोग करना, अराष्ट्रीय गतिविधियों की पहचान एवं पराभव में सहयोग कर अपने दायित्व का निर्वाह करें। अशिक्षितों को शिक्षित करने में सहयोग हमारा दायित्व है। स्वयं तकनीकी शिक्षा प्राप्त करते हुए समाज के अन्य वर्ग को भी तकनीकी के प्रयोग के महत्व के प्रति जागरूक करना है। वृद्धों की सेवा, परिवार व्यवस्था एवं अपने जीवन में प्रामाणिकता दैनिक व्यवहार का अंग बनना चाहिए।

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने पंच प्रण का पालन करते हुए हमसे यह अपेक्षा की है कि हम सभी भारतवासी ‘विकसित भारत’ के संकल्प में सहायक बनें एवं स्वतंत्रता के इस शुभ अवसर पर इन संकल्पों को हम सभी अपने जीवन का अंग बनाएं।

{लेखक भाजपा के राष्ट्रीय सह महामंत्री (संगठन) हैं}