विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस: भारत का दर्द, भारत का संकल्प

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     1947 की अगस्त की तपती दोपहरी में पंजाब धू-धू कर जल रहा था- प्रत्यक्ष भी और प्रतीकात्मक रूप से भी। आज़ादी की सुबह जो उत्सव का क्षण होना चाहिए था, वह पंजाब में आग और ख़ून के आलम में ढल गया। नई सरहद के आर-पार बसे गांव शाम के धुंधलके में जल उठे थे। टूटे-बिखरे परिवारों के काफ़िले क्षितिज की ओर रवाना हो रहे थे; थके-मांदे स्त्री-पुरुष और बच्चे धूल भरी सड़कों पर दूर-दूर तक पसरे पदचिह्न छोड़ते चले जा रहे थे, पीछे सिर्फ़ अपने घर-द्वार ही नहीं, अपनी ज़िंदगी तक छोड़कर। लाहौर और अमृतसर जैसे स्टेशनों से शरणार्थियों से ठूंस-ठूंस भरी रेलगाड़ियां एक के बाद एक कर के रवाना तो हुईं, मगर कई गाड़ियां अपनी मंज़िल तक कभी न पहुंच सकीं। हर रेल के निकल जाने के बाद कुछ देर को सन्नाटा पसर जाता, जिसे सिर्फ़ दूर कहीं धधकती आग की लपटें और भटकी हुई चीख़ों की गूंज भंग करती थी। यह भारत का बंटवारा था: स्वतंत्रता के साथ आई अराजकता, विस्थापन और हिंसा का ऐसा मंज़र, जो संसार ने इससे पहले नहीं देखा था। ये आज़ादी का वह लम्हा था जिसमें एक ओर सूरज उगा, तो दूसरी ओर मनुष्यता की सबसे काली रात भी साथ आई। हम इस क्षण को भुला नहीं सकते, ज़ख़्म कुरेदने के लिए नहीं, बल्कि उन्हें याद रखकर राष्ट्र को मरहम लगाने के लिए और ये सीखने के लिए कि ऐसी त्रासदी दोबारा न दोहराई जाए।

बंटवारे के भीषण प्रहार सबसे ज़्यादा पंजाब और बंगाल ने सहे। इनकी भौगोलिक स्थिति ही कुछ ऐसी थी: रैडक्लिफ़ रेखा ने पंजाब और बंगाल के सीने पर झटके से खींचकर एक लकीर डाल दी, जो खेतों और नदियों को चीरती हुई, रेल की पटरियों और ग्रांड ट्रंक रोड को दो हिस्सों में काटती हुई निकल गई। सदियों से एक-दूसरे में घुल-मिल कर बसे पंजाब-बंगाल के लोग-सिख, हिंदू, मुसलमान- एक झटके में

पंजाब में हुई मारकाट की कोई दूसरी मिसाल नहीं मिलती। रावलपिंडी, लाहौर, अमृतसर, शेख़ुपुरा जैसे शहरों में कत्लेआम, आगज़नी, बदले की हत्याएं अपनी चरम सीमा पर थीं, जो रेलगाड़ियां आधुनिकता की निशानी हुआ करती थीं, वे ख़ौफ़नाक मौत के वाहक बन गईं। कई गाड़ियां अपनी मंज़िल पर सिर्फ़ लाशों से भरे डिब्बे और लहूलुहान फ़र्श लेकर पहुंची, जिन्हें लोग दहशत में ‘ख़ून से रंगी ट्रेनें’ या ‘भूतिया गाड़ियां’ कहने लगे

दो हिस्सों में बांट दिए गए। यहीं बंटवारे का केन्द्र था, जहां से इतिहास की सबसे बड़ी पलायन की लहरें उठीं। करोड़ों हिंदू-सिखों को पश्चिमी पंजाब और पूर्वी बंगाल छोड़कर भारत की ओर आना पड़ा, हर एक सड़क और रेलमार्ग विपरीत दिशाओं में जाते ख़ौफ़ज़दा इंसानों के रेले से भर गया। प्रशासनिक ढांचे इस मानव-सैलाब के नीचे ढह गए। अंग्रेज़ हुकूमत जल्दबाज़ी में भारत छोड़ रही थी, सो क़ानून-व्यवस्था पहले ही कमज़ोर पड़ चुकी थी। जिन फ़ौजों को शांति क़ायम रखने के लिए तैनात किया गया, वे नाकाफ़ी थीं और देखते-देखते हालात काबू के बाहर हो गए। जिन इलाक़ों में विभाजन रेखा घनी आबादी के बीच से गुज़री, वहां हालात एकदम अराजक हो उठे: सदियों के पड़ोसी पल भर में एक-दूसरे के ख़िलाफ़ खड़े हो गए, और नफ़रत का ऐसा तूफ़ान उठा जिसे रोकने के लिए ज़मीन पर प्रशासन नाम की चीज़ मौजूद नहीं थी।

पंजाब में हुई मारकाट की कोई दूसरी मिसाल नहीं मिलती। रावलपिंडी, लाहौर, अमृतसर, शेख़ुपुरा जैसे शहरों में कत्लेआम, आगज़नी, बदले की हत्याएं अपनी चरम सीमा पर थीं, जो रेलगाड़ियां आधुनिकता की निशानी हुआ करती थीं, वे ख़ौफ़नाक मौत के वाहक बन गईं। कई गाड़ियां अपनी मंज़िल पर सिर्फ़ लाशों से भरे डिब्बे और लहूलुहान फ़र्श लेकर पहुंची, जिन्हें लोग दहशत में ‘ख़ून से रंगी ट्रेनें’ या ‘भूतिया गाड़ियां’ कहने लगे। पंजाब से दिल्ली पहुंचे एक शरणार्थी ने याद करते हुए बताया कि पाकिस्तान की ओर से आई एक रेलगाड़ी “काटे गए मृत शरीरों से अटी पड़ी थी… चारों तरफ़ ख़ून ही ख़ून था”। जगह-जगह पैदल जान बचाकर भागते काफ़िलों पर हमले हुए; देखते ही देखते पूरे के पूरे गांव आग में झोंक दिए गए। इस वहशीपन ने औरतों को भी ना बख़्शा: अंदाज़न 75,000 महिलाओं के साथ बलात्कार या अपहरण की घटनाएं हुईं और असंख्य मामलों में उन पर अमानवीय ज़ुल्म बरपाए गए। मांओं के सामने उनके बच्चों को मार डाला गया; गोद के शिशु तलवार के एक वार में उनसे छीन लिए गए। हालात ऐसे दरिंदेपन पर उतर आए कि कुछ ब्रिटिश अफ़सरों और पत्रकारों ने, जिन्होंने यूरोप में नाज़ी यातना शिविर देखे थे, कहा– यहां पंजाब और बंगाल में जो हुआ, वह शायद यहूदियों पर नाजियों द्वारा की गयी यातना से भी भयंकर था। बर्बरता के ऐसे-ऐसे कृत्य हुए कि वर्णन से ही रुह कांप उठे– गर्भवती स्त्रियों तक को नहीं छोड़ा गया। 1948 आते-आते जब यह महाविस्थापन थमा, तब तक साढ़े पन्द्रह करोड़ से भी अधिक लोग अपनी जन्मभूमि से उखाड़े जा चुके थे और मरने वालों की संख्या का ठीक-ठीक अंदाज़ा किसी को नहीं। अलग-अलग अनुमानों में मृतकों का आंकड़ा दो लाख से लेकर बीस लाख तक कहा गया है। अधिकतर इतिहासकार मानते हैं कि क़रीब 10 लाख बेगुनाह लोग इस ख़ूनी बांट-चीर में मारे गए, लेकिन हार्वर्ड विश्वविद्यालय के हाल के शोध सुझाव देते हैं कि यह संख्या 20 लाख या उससे भी ज़्यादा हो सकती है। 1947 का विभाजन 20वीं सदी का सबसे बड़ा शरणार्थी संकट बनकर उभरा, जिसमें चंद हफ़्तों के भीतर करीब 1.2 करोड़ से 2 करोड़ इंसान बेघर हो गए – यानी उस दौर में विश्व की आबादी का पूरा 1 प्रतिशत अपने ही वतन में बेगाना बन गया, ये आंकड़े महज़ संख्या नहीं हैं; ये भारत की धरती पर केंद्रित उस मानव त्रासदी की गवाही हैं जिसकी तुलना दुनिया में कहीं और नहीं मिलती।

फिर भी इस तबाही के बीच पंजाब के आम लोगों ने यादों के चिराग बुझने नहीं दिए। इंसान जब अपना घर-संसार छोड़ने पर मजबूर हो, तो साथ क्या ले कर भागे? किसी ने ख़ानदानी हिसाब-किताब की बहियां उठा लीं, तो किसी ने एक-दो यादगार तसवीरें; किसी ने अपने वतन की मिट्टी को ही आंचल में बांध लिया। और बहुतों ने चाबियां समेटीं – उन घरों की चाबियां जिन्हें वे अपनी पीठ पीछे बंद करके निकले थे – कमर में खोंस लीं या दुपट्टे के कोने में कसकर बांध लीं। अनगिनत दास्तानों में, जो हमें

1947 का विभाजन 20वीं सदी का सबसे बड़ा शरणार्थी संकट बनकर उभरा, जिसमें चंद हफ़्तों के भीतर करीब 1.2 करोड़ से 2 करोड़ इंसान बेघर हो गए – यानी उस दौर में विश्व की आबादी का पूरा 1 प्रतिशत अपने ही वतन में बेगाना बन गया, ये आंकड़े महज़ संख्या नहीं हैं; ये भारत की धरती पर केंद्रित उस मानव त्रासदी की गवाही हैं जिसकी तुलना दुनिया में कहीं और नहीं मिलती

पीढ़ी-दर-पीढ़ी विरासत में मिली हैं, दादियां और नानियां बताती हैं कि अगस्त, 1947 की उस अफ़रा-तफ़री में उन्होंने अपने घर-द्वार पर ताला लगाया, सन्दूक-तिजोरियां बंद कीं और उनकी चाबियां हाथ में लेकर सरहद पार कर गईं – उन्हें पूरा यक़ीन था कि हालात सुधरेंगे तो वापस लौट आएंगे। ऐसी भी मिसालें हैं कि किसी ने जाने से पहले पड़ोसी दोस्त के हाथ में अपने घर की चाबी सौंप दी – “मैं कुछ दिनों में लौटूंगा, तब तक ख़्याल रखना” कहते हुए। ऐसी भी गवाही मिलती है कि लाहौर की एक महिला बताती हैं – जाते वक़्त बहुत-से परिवार हमारी अम्मी को अपने घरों की गाठरों में बंधी चाबियां सौंप गए, कई परिवार तो उम्मीद में कुछ दिन रुके भी कि शायद हालात संभल जाएं। इस तरह हर चाबी एक मूक गवाह थी एक अधूरी छोड़ दी गई ज़िंदगी की। हर चाबी एक ऐसे घर का प्रतीक थी जिसमें अब अजनबी रहने लगे, या जो राख में तबदील हो गया – लेकिन फिर भी उन चाबियों के असली मालिकों के मन में वो घर सांस लेता रहा। आज भी दिल्ली, जालंधर या अमृतसर के कई परिवारों में अगर आप बुज़ुर्ग शरणार्थियों से मिलें, तो वे अपने बक्सों में रखी हुई कोई पुरानी ज़ंग लगी चाबी आपको दिखाएंगे। उनकी आंखें आंसुओं और गर्व से एक साथ भर आती हैं, जब वे कहते हैं कि ये उस पुश्तैनी मकान की चाबी है जो पीछे छूट गया था। अपने बच्चों-पौत्रों को वे ये चाबियां ऐसे सौंपते हैं मानो कोई पवित्र धरोहर दे रहे हों – एक खोई हुई दुनिया की निशानी। ये चाबियां शायद आज किसी ताले में न लगें, पर ज़ेहन में बसी यादों के बंद दरवाज़े ज़रूर खोल देती हैं। वे प्रतीक हैं क्षति और लालसा के, तो साथ ही दृढ़ता और उम्मीद के भी – उस उम्मीद के, जिसने उजड़े लोगों को ज़िंदा रखा; उस दृढ़ता के, जिसने उन्हें नई ज़मीन पर फिर से घर बसाने की ताक़त दी।

…शेष अगले अंक में

(लेखक भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री हैं)