‘आज का भारत’ अपने आप में एक अलग पहचान रखता है : निर्मला सीतारमण

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राज्यसभा                      संविधान के 75 वर्षों की गौरवशाली यात्रा पर विशेष चर्चा

संविधान सभा के 389 सदस्यों, विशेषकर 15 महिला सदस्यों ने तीन वर्ष से भी कम समय में एक साथ कठिन चुनौती स्वीकार की और अत्यंत चुनौतीपूर्ण वातावरण में भारत के लिए संविधान तैयार किया, जो समय की कसौटी पर खरा उतरा है। जैसाकि हम अपने संविधान के 75वें वर्ष का जश्न मना रहे हैं, यह समय भारत के निर्माण के लिए अपनी प्रतिबद्धता की पुष्टि करने का है, जो इस पवित्र दस्तावेज में निहित भावना को बनाए रखेगा। भारत का संविधान और ‘आज का भारत’ अपने आप में एक अलग पहचान रखता है।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित किया गया

मैं 1951 के पहले संविधान संशोधन अधिनियम पर बात करना चाहूंगी। जब यह अधिनियम पारित हुआ, उस समय भारत सरकार की कोई निर्वाचित सरकार नहीं, बल्कि एक अंतरिम सरकार थी। संविधान लागू होने के एक वर्ष के भीतर ही इसे अधिनियमित कर दिया गया था। एक लोकतांत्रिक देश ने, जो आज भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर गर्व करता है, पहला संविधान संशोधन देखा जिसे भारतीयों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को नियंत्रित करने के लिए लाया गया था।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित करने और प्रेस की स्वतंत्रता को सीमित करने का सिलसिला 1949 से पहले भी चला और उसके बाद भी चलता रहा। उच्चतम न्यायालय में मामले के लंबित रहने के दौरान 1975 में 39वां संविधान संशोधन अधिनियम पारित किया गया। इसमें कहा गया, ‘राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और लोकसभा अध्यक्ष के चुनावों को देश की किसी भी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती और ऐसा केवल संसदीय समिति के समक्ष ही किया जा सकता है।’ 1976 में तत्कालीन राष्ट्रपति ने संविधान के 42वें संशोधन अधिनियम को अपनी स्वीकृति दी थी। आपातकाल के दौरान जब बिना किसी उचित कारण के लोकसभा का कार्यकाल बढ़ा दिया गया था और उस बढ़ाए गए कार्यकाल में पूरे विपक्ष को जेल में डाल दिया गया।

कांग्रेस ने कभी भी अनुसूचित जातियों, जनजातियों, अन्य पिछड़ा वर्ग और महिलाओं के कल्याण के लिए कुछ नहीं किया। काका कालेलकर आयोग की रिपोर्ट को प्रकाशित होने से रोका गया। पिछड़े वर्गों को आरक्षण देने के लिए मंडल आयोग का गठन किया गया, लेकिन न तो प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने और न ही श्री राजीव गांधी ने इसकी सिफारिशों को लागू किया। एक और उदाहरण जीएसटी से संबंधित संवैधानिक प्रावधानों का है, जिन्हें 2017 में प्रधानमंत्री श्री मोदी द्वारा आगे लाने से पहले कभी प्रोत्साहित नहीं किया गया। वर्ष 2000 में राजग शासन के दौरान प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने सर्वप्रथम जीएसटी लाने का सुझाव दिया था। हालांकि, उनके द्वारा किए गए ईमानदार प्रयास उस समय साकार नहीं हो सके और उनके कार्यकाल के बाद के यूपीए शासित दस वर्षों में इसे लागू करने के लिए ज्यादा कुछ नहीं किया गया। संसद में जीएसटी पेश किए जाने के दो वर्षों के भीतर जीएसटी से संबंधित 101वां संविधान संशोधन अधिनियम पारित किया गया और 15 से अधिक राज्यों द्वारा इसकी पुष्टि की गई।

अब तक 54 करोड़ जनधन खाते खोले जा चुके हैं

जनगणना के आंकड़ों से पता चलता है कि 2011 तक 60 प्रतिशत से भी कम भारतीय परिवारों के पास बैंकिंग सेवा तक पहुंच थी। इसके विपरीत, 2014 से अब तक 54 करोड़ जनधन खाते खोले जा चुके हैं। इनमें से 56 प्रतिशत खाते महिलाओं के हैं। प्रधानमंत्री मुद्रा योजना के तहत स्वीकृत 50 करोड़ खातों में से 68 प्रतिशत महिलाओं के हैं। स्टैंड अप इंडिया के तहत एक करोड़ एससी/एसटी महिलाओं को ऋण सुविधा दी गई है और 2.5 लाख लोगों को 30,000 करोड़ रुपये वितरित किए गए हैं, जिनमें से 76 प्रतिशत लाभार्थी महिलाएं हैं। पीएम स्वनिधि के तहत 67 लाख रेहड़ी-पटरी वालों को 50 हजार रुपये का ऋण दिया गया है, जिनमें से 45 प्रतिशत महिलाएं हैं और 42 प्रतिशत अन्य पिछड़ा वर्ग से है।

प्रधानमंत्री श्री मोदी ने प्रौद्योगिकी लाकर और प्रत्यक्ष लाभ अंतरण का इस्तेमाल करके यह सुनिश्चित किया कि लाभार्थियों का पैसा सीधे उनके खातों में पहुंचेगा। एक रुपया यानी पूरा एक रुपया उनके पास पहुंचेगा और इससे करदाताओं का 3.48 लाख करोड़ रुपये बचाने में मदद मिली है।