विरासत का हस्तांतरण: मोदी जी ने वाजपेयी जी के ‘विकसित भारत’ के स्वप्न को कैसे साकार किया

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    श्रद्धेय श्री अटल बिहारी वाजपेयी जन्मशताब्दी वर्ष पर विशेष

‘नेतृत्व’ अगर संक्षेप में समझा जाए, तो उसकी परिभाषा उसकी शक्ति से नहीं, बल्कि उस विरासत से होती है जो वह दूसरों को देता है। एक सच्चा नेता वह होता है जिसके कार्य एक ऐसी विरासत छोड़ते हैं जो दूसरों को बड़े सपने देखने, सीखने एवं अधिक हासिल करने और एक बेहतर, समग्र व्यक्ति बनने के लिए प्रोत्साहित करती है, जो न केवल अपने लिए, बल्कि पूरे समाज के लिए भी काम करता है। भारत में ऐसे कई महान नेता हुए हैं, लेकिन श्री अटल बिहारी वाजपेयी इस आदर्श के प्रतीक के रूप एक विशिष्ट पहचान रखते हैं। उन्हें अक्सर ‘अजातशत्रु’ कहा जाता था, जिसका कोई शत्रु न हो।

राजनीति, शासन और समावेशी विकास के उनके विचारों ने मेरी पीढ़ी के लाखों लोगों को प्रेरित किया है। एक गौरवान्वित सांसद और चार दशकों से भारतीय जनता पार्टी के एक समर्पित सदस्य के रूप में अटल जी के विचारों ने मुझे गहराई से प्रेरित किया है और उनका नेतृत्व मेरे लिए एक मार्गदर्शक रहा है। समावेशिता के उनके विचार अब प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की सरकार के आदर्श वाक्य ‘सबका साथ, सबका विकास’ में समाहित हो गए हैं।

वाजपेयी जी के परिवर्तनकारी विचारों और उनकी नेतृत्व शैली का मुझ पर तब से प्रभाव रहा है जब मैं अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् (एबीवीपी) के साथ जुड़ा एक युवा कार्यकर्ता था और 1970 के दशक में उस्मानिया विश्वविद्यालय से अपनी राजनीतिक सक्रियता शुरू की थी।

एक सच्चा नेता वह होता है जिसके कार्य एक ऐसी विरासत छोड़ते हैं जो दूसरों को बड़े सपने देखने, सीखने एवं अधिक हासिल करने और एक बेहतर, समग्र व्यक्ति बनने के लिए प्रोत्साहित करती है, जो न केवल अपने लिए, बल्कि पूरे समाज के लिए भी काम करता है। भारत में ऐसे कई महान नेता हुए हैं, लेकिन श्री अटल बिहारी वाजपेयी इस आदर्श के प्रतीक के रूप एक विशिष्ट पहचान रखते हैं। उन्हें अक्सर ‘अजातशत्रु’ कहा जाता था, जिसका कोई शत्रु न हो

इसके बाद, जब मैं 1980 के दशक में भाजपा में शामिल हुआ और जमीनी स्तर पर काम करने के साथ-साथ राष्ट्रीय मुद्दों पर सहयोग करने लगा, तो वाजपेयी जी के आदर्शों ने मेरी मूल्य-पद्धति को गहराई से आकार दिया और मेरे कार्यों को आगे बढ़ाया। वह न केवल मेरे लिए, बल्कि मेरे साथियों के लिए भी एक मार्गदर्शक रहे हैं।

मुझे न केवल वाजपेयी जी के साथ, बल्कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के दूरदर्शी एवं परिवर्तनकारी नेतृत्व में भी काम करने का अनूठा सौभाग्य प्राप्त हुआ है, जिन्होंने अटल जी के विचारों को गहराई से अपनाया है। यह लेख इन महान व्यक्तित्वों के प्रति एक श्रद्धांजलि है; यह मेरा हार्दिक समर्पण है जो मेरे व्यक्तिगत संवादों, मेरे अनुभवों और उन विचारों को समेटने का प्रयास करता है कि कैसे अटल जी के विचार, जिन्होंने एक पीढ़ी को प्रेरित किया, अब मोदी जी के नेतृत्व में फलित हो रहे हैं, जिन्होंने उस दृष्टिकोण को पुनर्जीवित और ‘नए भारत’ के रूप में इस विचार को विस्तारित किया है।

वाजपेयी जी के विचार एवं विरासत

अटल बिहारी वाजपेयी जी केवल एक पार्टी के नेता या राष्ट्र के प्रधानमंत्री ही नहीं थे, वह एक ऐसे राजनेता थे जिनके व्यक्तित्व में बौद्धिक गहराई, काव्यात्मक संवेदनशीलता और भारतीय लोकाचार के प्रति अटूट प्रतिबद्धता का मिश्रण झलकता था।

अटल जी के कई भाषण, जो उनके विशिष्ट शायराना अंदाज में अद्वितीय वाक्पटुता और काव्यात्मक शैली में दिए गए थे, आज भी युवा पीढ़ी के बीच सुने जाते हैं और उन्हें एक किंवदंती बना देते हैं। एक भाषण में, जब उनकी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया था, उन्होंने कहा था, “सरकार तो आएगी और जाएगी, यह देश रहना चाहिए।” यह भाषण राष्ट्र को सर्वोपरि रखने के उनके दृढ़ संकल्प को दर्शाता है।

इस दृढ़ संकल्प की झलक भारत की वर्तमान विदेश नीति में देखी जा सकती है, जिसे मोदी जी ‘भारत प्रथम’ नीति कहते हैं।

अटल जी के भाषणों में देश के आम लोगों के प्रति उनकी गहरी चिंता भी झलकती थी। वह एक ऐसे व्यक्ति थे जिनकी दृष्टि केवल सहानुभूति से कहीं अधिक सहानुभूति और समझदारी पर आधारित थी। वह एक ऐसे लोकतंत्रवादी थे जो संवाद और आम सहमति बनाने में विश्वास रखते थे और उन लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति दृढ़ प्रतिबद्धता रखते थे, जिन पर भारत का निर्माण हुआ है।

वाजपेयी जी का दृष्टिकोण: वह विचार जिन्होंने हमारा मार्ग प्रशस्त किया

राष्ट्र के लिए अटल जी का दृष्टिकोण कहीं अधिक व्यापक और दूरगामी था, इसमें कई प्रमुख स्तंभ शामिल हैं जो आज भी भारत के विकास पथ को परिभाषित करते हैं, इनमें शामिल हैं:

समावेशी विकास: ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास’

मोदी जी का नारा ‘सबका साथ, सबका विकास’, वाजपेयी जी के समावेशी विकास के दृष्टिकोण से प्रेरित है, जिन्होंने ऐसी प्रगति का समर्थन किया जहां कोई भी पीछे न छूटे। वाजपेयी जी समावेशी विकास को केवल आर्थिक विकास की रणनीति के रूप में नहीं, बल्कि सत्ताधारी नेताओं की नैतिक अनिवार्यता के रूप में देखते थे।

उनका दृढ़ विश्वास था कि विकास और प्रगति का लाभ प्रत्येक नागरिक तक पहुंचना चाहिए, विशेषकर उन लोगों तक जो जाति, वर्ग या किसी अन्य कारण से जन्म से ही सामाजिक-आर्थिक रूप से हाशिए पर हैं।

अटल बिहारी वाजपेयी दीनदयाल उपाध्याय के ‘अंत्योदय’ सिद्धांत के सच्चे प्रतीक थे, जिसका अर्थ है अंतिम व्यक्ति का उत्थान। प्रधानमंत्री के रूप में अटल जी ने सर्व शिक्षा अभियान जैसी कई पहलों की शुरुआत करके इन विचारों को क्रियान्वित किया। उन्होंने माना कि हाशिए पर पड़े समुदायों के सशक्तीकरण और गरीबी के चक्र को तोड़ने के लिए ‘शिक्षा’ सबसे प्रभावी साधन है। इसलिए, प्राथमिक शिक्षा के सार्वभौमिकरण के लिए यह एक महत्वपूर्ण प्रयास था।

अटल जी समझते थे कि राष्ट्रीय प्रगति तभी संभव है जब कोई भी पीछे न छूटे, इसलिए उन्होंने ग्रामीण विकास योजनाओं की नींव रखी, जिनका उद्देश्य दूर-दराज के गांवों में रहने वाले और प्रगति के लाभों से वंचित लोगों के जीवन को बेहतर बनाना था। उनका दृष्टिकोण दान-पुण्य तक सीमित नहीं था, बल्कि आत्मनिर्भरता के लिए अवसर पैदा करने और क्षमता निर्माण करने का था। क्योंकि आत्म-सम्मान केवल आत्मनिर्भरता से ही आ सकता है।

बुनियादी ढांचे के आधुनिकीकरण से प्रगति का मार्ग प्रशस्त किया

राष्ट्रीय एकीकरण के माध्यम से औद्योगिक और आर्थिक विकास को गति देने में मज़बूत बुनियादी ढांचे की महत्वपूर्ण भूमिका की वाजपेयी जी की गहरी समझ ने उन्हें कई बुनियादी ढांचा निर्माण परियोजनाओं की शुरुआत करने के लिए प्रेरित किया। इनमें से सबसे प्रतिष्ठित ‘स्वर्णिम चतुर्भुज’ परियोजना है, जिसका उद्देश्य भारत के चार सबसे विकसित महानगरों– दिल्ली, मुंबई, चेन्नई और कोलकाता को विश्व स्तरीय राजमार्गों के एक नेटवर्क से जोड़ना था।

यह परियोजना केवल सड़कें या राजमार्ग बनाने के बारे में नहीं थी, बल्कि आर्थिक गलियारे बनाने, यात्रा के समय को कम करने, जिससे व्यापार सुगम होगा और क्षेत्रीय विकास को बढ़ावा मिलेगा, के बारे में थी। मुझे याद है कि इस परियोजना के विशाल आकार को देखते हुए शुरुआत में इसे लेकर उत्साह और संशय दोनों थे। लेकिन वाजपेयी जी का संकल्प अटल था। उन्होंने इसे भारत को एक आधुनिक आर्थिक महाशक्ति में बदलने की दिशा में एक आधारभूत कदम के रूप में देखा।

अटल बिहारी वाजपेयी दीनदयाल उपाध्याय के ‘अंत्योदय’ सिद्धांत के सच्चे प्रतीक थे, जिसका अर्थ है अंतिम व्यक्ति का उत्थान। प्रधानमंत्री के रूप में अटल जी ने सर्व शिक्षा अभियान जैसी कई पहलों की शुरुआत करके इन विचारों को क्रियान्वित किया। उन्होंने माना कि हाशिए पर पड़े समुदायों के सशक्तीकरण और गरीबी के चक्र को तोड़ने के लिए ‘शिक्षा’ सबसे प्रभावी साधन है। इसलिए, प्राथमिक शिक्षा के सार्वभौमिकरण के लिए यह एक महत्वपूर्ण प्रयास था

स्वर्णिम चतुर्भुज के अलावा यह मानते हुए कि ग्रामीण समृद्धि के लिए गांवों को बाज़ारों और सेवाओं से जोड़ना बेहद ज़रूरी है, अटल जी की सरकार ने प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना शुरू की। इस दौरान दूरसंचार क्षेत्र में भी उल्लेखनीय प्रगति हुई, जिसने आने वाली डिजिटल क्रांति की नींव रखी। प्रधानमंत्री श्री मोदी के कार्यकाल में भारत अब दुनिया के सबसे सस्ते इंटरनेट और नेटवर्क शुल्क वाले देशों में से एक है।

परमाणु ऊर्जा में आत्मनिर्भरता

संप्रभुता और दृढ़ संकल्प भारतीय गणराज्य की प्रमुख विशेषताओं में से एक रहा है। 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी जी की सरकार के दौरान पोखरण द्वितीय परमाणु परीक्षण किया गया, जो इस तथ्य का स्पष्ट उदाहरण था। यह शायद वाजपेयी जी की राजनीतिक यात्रा के सबसे निर्णायक फैसलों में से एक था, जिसने उनके दूरदर्शी नेतृत्व और आत्मनिर्भरता के प्रति उनके संकल्प को उजागर किया।

पोखरण- द्वितीय परीक्षण, जिसे मिशन शक्ति के नाम से जाना जाता है, करने का साहसिक निर्णय, संयुक्त राज्य अमेरिका जैसी महाशक्ति द्वारा आर्थिक प्रतिबंधों और बहिष्कार के भारी अंतरराष्ट्रीय दबाव के बावजूद लिया गया था। अटल जी के लिए, भारत की संप्रभुता ऐसी चीज नहीं है जिससे समझौता किया जा सके। उन्होंने वैश्विक मंच पर अपनी स्थिति को मजबूती से स्थापित किया और इसके परिणामों से अद्भुत धैर्य और कूटनीतिक कुशलता से निपटा।

उन्होंने परमाणु हथियारों के मामले में भारत की ‘पहले इस्तेमाल न करने’ की दृढ़ नीति दोहराई और साथ ही अपनी सामरिक स्वायत्तता को भी स्पष्ट रूप से स्थापित किया। यह उन क्षणों में से एक था जिसने प्रत्येक भारतीय राष्ट्रवादी के हृदय को अपार राष्ट्रीय गौरव से भर दिया और दुनिया को यह संकेत दिया कि भारत एक ऐसा राष्ट्र है जो अपने सिद्धांतों पर, अब और हमेशा, यहां तक कि चुनौती मिलने पर भी अडिग रहेगा।

सुशासन नीति: जन-केंद्रित विकास

अटल बिहारी वाजपेयी जी और उनकी सरकार सुशासन के प्रति पूर्णतः प्रतिबद्ध थी। अटल जी लोकतांत्रिक संस्थाओं की पारदर्शिता, जवाबदेही और स्थिरता के सिद्धांतों में विश्वास करते थे। उन्होंने एक जटिल गठबंधन सरकार का नेतृत्व करते हुए राजनीतिक चुनौतियों का सामना किया, जिसका मुख्य उद्देश्य आम सहमति बनाना और एक स्थिर प्रशासन बनाए रखना था।

अटल जी ने जन-केंद्रित नीतियों पर ध्यान लगाया और यह सुनिश्चित किया कि सरकारी कार्यक्रम सीधे

अटल जी ने जन-केंद्रित नीतियों पर ध्यान लगाया और यह सुनिश्चित किया कि सरकारी कार्यक्रम सीधे उन नागरिकों को लाभान्वित करें जिनको इनकी आवश्यकता है। शासन पर उनका ध्यान व्यावहारिक होने के साथ-साथ सिद्धांत-आधारित भी था। उन्होंने हमेशा संकीर्ण राजनीतिक स्वार्थ से ऊपर राष्ट्र कल्याण को प्राथमिकता दी

उन नागरिकों को लाभान्वित करें जिनको इनकी आवश्यकता है। शासन पर उनका ध्यान व्यावहारिक होने के साथ-साथ सिद्धांत-आधारित भी था। उन्होंने हमेशा संकीर्ण राजनीतिक स्वार्थ से ऊपर राष्ट्र कल्याण को प्राथमिकता दी।

राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा: सद्भाव और सहमति की वकालत

भारत जैसे अद्भुत विविधता वाले राष्ट्र में ‘विविधता में एकता’ का सिद्धांत एक निर्विवाद वास्तविकता है। अटल जी ने अपनी गहन दूरदर्शिता के साथ राष्ट्रीय एकता और सद्भाव का निरंतर समर्थन किया और अक्सर संकीर्ण दलगत सीमाओं से ऊपर उठकर आम सहमति बनाने के लिए विचार-विमर्श को आगे बढ़ाया।

जटिल जम्मू-कश्मीर मुद्दे के प्रति उनका दृष्टिकोण इस दर्शन का प्रमाण था, जो उनके त्रिपक्षीय दृष्टिकोण: इंसानियत, जम्हूरियत और कश्मीरियत, यानी मानवता, लोकतंत्र और कश्मीर के अनूठे सार में खूबसूरती से समाहित था। यह मार्गदर्शक सिद्धांत जटिल चुनौतियों का समाधान बलपूर्वक करने के बजाय, खुले संवाद और सच्ची सहानुभूति के माध्यम से करने की उनकी प्रतिबद्धता को रेखांकित करता था।

वह एक ऐसे नेता थे जिन्होंने इस गहन सत्य को रेखांकित किया कि भारत की शक्ति उसकी विविधता में निहित है, जो राष्ट्र के ताने-बाने में गहराई से समाई हुई है। उनका दृढ़ विश्वास था कि सभी हितधारकों और समुदायों के बीच सद्भाव का विकास न केवल वांछनीय है, बल्कि राष्ट्र को प्रगति के पथ पर अग्रसर करने के लिए अत्यंत आवश्यक भी है। उन्होंने स्वयं को एक ऐसे नेता के रूप में प्रतिष्ठित किया, जिनमें विपक्ष के साथ रचनात्मक रूप से जुड़ने, असहमति के स्वरों का धैर्यपूर्वक सामना करने और निरंतर साझा आधार तलाशने की अद्भुत क्षमता थी। ऐसा करते हुए उन्होंने संसदीय लोकतंत्र के सार और सच्ची भावना को भी मूर्त रूप दिया।

वाजपेयी जी के साथ मेरे घनिष्ठ संबंध ने मुझे संवाद के प्रति उनकी अटूट प्रतिबद्धता, नेतृत्व में उनकी गहन विनम्रता और एक सशक्त तथा करुणामय भारत में उनके अटूट विश्वास को प्रत्यक्ष रूप से देखने का अवसर दिया। उन्होंने मुझे सिखाया कि नेतृत्व का अर्थ प्रभुत्व स्थापित करना नहीं, बल्कि सेवा करना है; आदेश देना नहीं, बल्कि विश्वास दिलाना है और व्यक्तिगत गौरव के लिए नहीं, बल्कि सामूहिक भलाई के लिए है…

(जारी है…)
(लेखक भाजपा ओबीसी मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं राज्यसभा सांसद हैं)