आपातकाल के दौरान लोकतंत्र के लिए नरेन्द्र मोदी का संघर्ष

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     25 जून, 1975 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा घोषित आपातकाल 21 महीने का अंधकारमय काल था, जिसमें नागरिक स्वतंत्रताओं को छीन लिया गया, सामूहिक गिरफ्तारियां हुईं, सेंसरशिप और राज्य प्रायोजित अधिनायकवाद का बोलबाला था।

• चुनावी कदाचार के लिए इंदिरा गांधी को अयोग्य ठहराने वाले इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले के बाद आपातकाल लगाया गया, बढ़ते हुए जनाक्रोश को दबाया जा सके। इस दौरान सरकार का पूरा ध्यान जेपी के नेतृत्व वाली संपूर्ण क्रांति एवं गुजरात के नवनिर्माण आंदोलन जैसे आंदोलनों को दबाने पर था।
• 1,00,000 से अधिक लोगों— राजनीतिक विरोधी, पत्रकार, छात्र नेताओं को मीसा कानून के तहत जेल भेजा गया; 4 जुलाई, 1975 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगा दिया गया। इसके कार्यकर्ता भूमिगत हो गए।

नरेन्द्र मोदी का उदय

• मात्र 25 वर्ष की आयु में श्री नरेन्द्र मोदी एक आरएसएस प्रचारक के तौर पर गुजरात में कार्य कर रहे थे, जहां उन्हें संगठन को भूमिगत रूप से जीवित रखने का कार्यभार सौंपा गया था।
• उन्होंने गुजरात के प्रमुख आरएसएस नेताओं, जैसे— लक्ष्मणराव इनामदार (वकील साहब), केशवराव देशमुख और वसंत गजेंद्रगड़कर के साथ काम किया और नानाजी देशमुख एवं दत्तोपंत ठेंगड़ी के साथ

समन्वय में रहे, जिन्होंने राष्ट्रीय लोक संघर्ष समिति का नेतृत्व किया।

भेष बदलने में माहिर: मोदी के भूमिगत अवतार

• श्री मोदी आपातकाल के दौरान पुलिस को लगातार चकमा देते रहे, जबकि गुजरात पुलिस बहुत सतर्क थी।
• उन्होंने कई तरह के भेष धारण किए: एक साधु, एक सरदारजी, एक अगरबत्ती विक्रेता और यहां तक कि एक बुजुर्ग सिख जो पगड़ी पहने हुए था, ताकि बिना किसी की नजर पड़े वे जिलों में घूम सकें।
• एक बार उन्होंने मुंबई के एक मिशन के दौरान भावी भाजपा नेता मकरंद देसाई के बेटे के रूप में अपनी पहचान बतायी— यह एक ऐसी योजना थी, जिसे उन्होंने निगरानी से बचने के लिए स्वयं ही तैयार किया था।

गुप्त संप्रेषक एवं मोबिलाइजर

•• श्री मोदी ने साइक्लोस्टाइल मशीनों का उपयोग करके आपातकाल विरोधी साहित्य, विशेष रूप से आरएसएस के भूमिगत प्रकाशनों को प्रकाशित किया, इस दौरान अनुवाद एवं राष्ट्रव्यापी वितरण की जिम्मेदारी भी उन्हीं के कंधों पर थी।
• उन्होंने कोड सिस्टम का बीड़ा उठाया, जैसे:
• फोन नंबरों में अंकों की अदला-बदली
• बैठकों को धार्मिक समारोहों के रूप में प्रस्तुत करना— जैसे सत्यनारायण पूजा
• चंदन कार्यक्रम— गुप्त आरएसएस बैठकों के लिए एक कोड वाक्यांश

• उन्होंने स्वयंसेवकों को सलाह दी कि वे पुलिस से बचने के लिए बैठक स्थल के बाहर अपनी चप्पलें बिखेर दें।

प्रतिरोध और गुप्त नेटवर्क

• श्री मोदी ने जॉर्ज फर्नांडिस, दत्तोपंत ठेंगड़ी और वी.एम. तारकुंडे जैसे प्रमुख नेताओं, जो आपातकाल का विरोध कर रहे थे, की गुजरात यात्राओं को समर्थन दिया।
• उन्होंने निम्नलिखित की देखरेख की:
• विभिन्न भागने के रास्तों के साथ सुरक्षित घरों में गुप्त बैठकें।
• गुजरात में ढोलका, मेहसाणा, जामनगर, पालनपुर और राजकोट के सत्याग्रह— जिसमें सैकड़ों लोगों ने स्वेच्छा से गिरफ्तारी दी।
• उन्होंने सुनिश्चित किया कि आंदोलन विकेंद्रीकृत रहे, जिससे प्रत्येक जिला और स्वयंसेवक स्वतंत्र रूप से काम करें, लेकिन वे गुप्त चैनलों के माध्यम से जुड़े रहें।

जमीनी-स्तर पर विरोध-प्रदर्शन की रणनीति में नवप्रवर्तक

• श्री मोदी ने छात्रों को ‘जेपी को रिहा करो’ और ‘आपातकाल हटाओ’ जैसे नारे के लिए स्टील फ्रेम का उपयोग करके भित्तिचित्र बनाने के लिए प्रोत्साहित किया, जिससे पुलिस के प्रतिक्रिया करने से पहले त्वरित निष्पादन संभव हो सके।
• उन्होंने बच्चों को फाइलें और संदेश पहुंचाने के लिए संदेशवाहक के रूप में नियुक्त किया— यह मानते हुए कि वे संदेह के घेरे में नहीं आयेंगे।

नैतिक एंकर और युवा प्रेरक

• पोरबंदर में जब सभी वरिष्ठ कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया गया और युवा स्वयंसेवक हतोत्साहित महसूस कर रहे थे, तो श्री मोदी ने उससे कहा;
• “भले ही आप अकेले हों, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। अगर किसी की मंशा सही है तो एक व्यक्ति ही काफी है। लोकतंत्र की जीत होनी चाहिए।”
• उन्होंने मेडिकल छात्रों के साथ प्रेरक सत्र आयोजित किए और उन्हें पैम्फलेट वितरण के लिए अपनी गतिशीलता का उपयोग करने के लिए प्रोत्साहित किया।

जेल में बंद स्वयंसेवकों के परिवारों की सहायता

• श्री मोदी ने निम्नलिखित की व्यक्तिगत जिम्मेदारी ली:
• जेल में बंद स्वयंसेवकों के परिवारों को वित्तीय सहायता और भोजन उपलब्ध कराना।
• उनका उपचार और भावनात्मक सहयोग।
• यह सुनिश्चित करना कि कोई भी व्यक्ति स्वयं को अकेला महसूस न करे और संघ के स्वयंसेवकों का मनोबल ऊंचा बना रहे।

वरिष्ठ नेताओं और वैश्विक प्रेस का समर्थन

• प्रधानमंत्री श्री मोदी ने आपातकाल विरोधी संघर्ष का दस्तावेजीकरण करते हुए ‘संघर्ष मा गुजरात’ नामक पुस्तक लिखी। तत्कालीन गुजरात के मुख्यमंत्री बाबूभाई जे. पटेल ने इसकी प्रशंसा की।
• द इकोनॉमिस्ट, द् न्यू यॉर्क टाइम्स और द् गार्जियन जैसे विदेशी मीडिया घरानों ने आरएसएस के अनूठे और संगठित प्रतिरोध को स्वीकार किया, विशेष रूप से गुजरात को एक प्रमुख केंद्र के रूप में मान्यता मिली।

आपातकाल की विरासत और सबक

• श्री मोदी के आपातकाल के अनुभवों ने निम्नलिखित को गहराई से प्रभावित किया:
• लोकतंत्र और विकेंद्रीकरण के प्रति उनकी प्रतिबद्धता
• उनकी संगठनात्मक शैली और संकट प्रबंधन क्षमताएं
• नागरिक स्वतंत्रता की रक्षा करने और सत्तावादी प्रवृत्तियों को उजागर करने का उनका संकल्प।
• प्रधानमंत्री के तौर पर वे अक्सर आपातकाल को चेतावनी के तौर पर प्रस्तुत करते हैं, वह इसे लोकतांत्रिक सतर्कता के लिए एक वैचारिक कसौटी के तौर पर भी संदर्भित करते हैं।

आपातकाल वह अग्निपरीक्षा थी, जिसने श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व की भावना को गढ़ा। नेपथ्य में रहकर लेकिन अडिग संकल्प के साथ काम करते हुए उन्होंने भारतीय लोकतंत्र की धड़कन को मूर्त रूप दिया।
जब अन्य लोग शांत हो गए, तब उन्होंने रणनीति बनाई। जब अन्य लोगों के पास आत्मसमर्पण करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था, तब उन्होंने प्रतिरोध के नेटवर्क को मजबूत किया।

प्रचारक से प्रधानमंत्री तक का उनका सफर सिर्फ राजनीतिक नहीं है— यह कहानी है कि कैसे भारत के सबसे बड़े लोकतांत्रिक संकट ने इसके सबसे प्रिय नेताओं में से एक को आकार दिया।