भारत में सहकारी समितियों की त्वरित उन्नति और उनमें हो रहे बदलाव
“भारत के लिए सहकारी समितियां संस्कृति का आधार हैं, जीवन शैली हैं। भारत अपनी भावी प्रगति में सहकारी समितियों की बड़ी भूमिका देखता है।”
—प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी
भारत अपनी सहकारिता की संस्कृति के पुनरुत्थान का साक्षी बन रहा है, जिसमें जमीनी स्तर की समितियां सामाजिक-आर्थिक सशक्तीकरण और समावेशी विकास के शक्तिशाली इंजन के रूप में उभर रही हैं। भारत में सहकारी समितियों की परिवर्तनकारी शक्ति का उल्लेखनीय उदाहरण राजस्थान की बोरखेड़ा ग्राम सेवा सहकारी समिति है। वर्ष 1954 में केवल 15 सदस्यों और मात्र 30 रुपये के शेयर के साथ स्थापित यह समिति आज 8,299 से अधिक सदस्यों और 107.54 लाख रुपये के शेयर के साथ एक संपन्न समिति के रूप में विकसित हो चुकी है, जिनमें से 70 प्रतिशत से अधिक हाशिए के समुदायों से हैं। बीते दशकों में यह कृषि के मूलभूत स्वरूप से आगे बढ़ते हुए काफी विकसित हो चुकी है। अब यह तीन शाखाओं के साथ एक मिनी बैंक का संचालन करती है और अकेले 2018-19 में इसने 4.55 करोड़ रुपये की जमा राशि जुटाई। इसका ई-मित्र प्लस सेंटर बीमा और आधार-लिंक्ड सुविधाओं से लेकर जाति और आय प्रमाण पत्र और उपयोगिता बिल भुगतान तक की महत्वपूर्ण नागरिक सेवाएं प्रदान करता है। इस सहकारी समिति को एनसीडीसी राष्ट्रीय सहकारी उत्कृष्टता पुरस्कार (2010) और एनसीडीसी क्षेत्रीय पुरस्कार (2018) से सम्मानित किया जा चुका है। यह बदलाव कोई अकेला मामला नहीं है, बल्कि यह सहकारी क्षेत्र को पुनर्जीवित करने की एक राष्ट्रव्यापी मुहिम का हिस्सा है
वर्तमान में भारत में 8.44 लाख से अधिक सहकारी समितियां हैं, जो ऋण, आवास, विपणन, डेयरी, मत्स्य पालन आदि सहित 30 क्षेत्रों में फैली हैं और ग्रामीण ऋण, स्वरोजगार और सामूहिक आर्थिक मजबूती की दिशा में आवश्यक साधन के तौर पर कार्य कर रही हैं। सहकारी समितियों की मुख्य बातें निम्न हैं:
•भारत में 30 क्षेत्रों में 8.44 लाख से अधिक सहकारी समितियां हैं, जो ग्रामीण ऋण, रोज़गार और आर्थिक सशक्तीकरण को बढ़ावा दे रही हैं।
• सहकारी समितियों को कुशल, डिजिटल और आपदा-प्रतिरोधी समितियों में बदलने के लिए 22 जुलाई, 2025 तक 73,492 प्राथमिक कृषि ऋण समितियों (पीएसीएस) के कम्प्यूटरीकरण के प्रस्तावों को मंज़ूरी दी गई है और 59,920 पीएसीएस को एकीकृत ईआरपी प्लेटफ़ॉर्म पर जोड़ा गया है।
• एक ही प्लेटफ़ॉर्म से विविध ग्रामीण सेवाएं प्रदान करने के लिए 22 जुलाई, 2025 तक 23,173 नई बहुउद्देशीय पीएसीएस, डेयरी और मत्स्य सहकारी समितियां पंजीकृत की गई हैं।
भारत में 30 क्षेत्रों में 8.44 लाख से अधिक सहकारी समितियां हैं, जो ग्रामीण ऋण, रोज़गार और आर्थिक सशक्तीकरण को बढ़ावा दे रही हैं
जेम पर 667 सहकारी समितियों को खरीदार के रूप में पंजीकृत किया गया है और 31 मार्च, 2025 तक सहकारी समितियों द्वारा 319.02 करोड़ रुपये के 2,986 लेनदेन हुए हैं
•जेम पर 667 सहकारी समितियों को खरीदार के रूप में पंजीकृत किया गया है और 31 मार्च, 2025 तक सहकारी समितियों द्वारा 319.02 करोड़ रुपये के 2,986 लेनदेन हुए हैं।
• राष्ट्रीय सहकारी निर्यात लिमिटेड (एनसीईएल) ने 8,863 पीएसीएस/सहकारी समितियों को शामिल किया है, जिनके माध्यम से 27 देशों को 5,239.5 करोड़ रुपये मूल्य की कृषि वस्तुओं का सफलतापूर्वक निर्यात किया गया है।
उल्लेखनीय है कि साबरकांठा की बाल गोपाल बचत एवं ऋण सहकारी समिति भारत की एकमात्र ऐसी सहकारी समिति है, जो विशेष रूप से 0-18 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए है। इस अनूठे ‘बाल बचत संस्कार’ मॉडल के माध्यम से बच्चों को सेविंग बॉक्स दिए जाते हैं और उनमें जमा हुई राशि हर महीने उनके बैंक खातों में 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज पर जमा की जाती है। मार्च, 2024 तक 335 गांवों के 19,020 बाल सदस्यों ने 17.47 करोड़ रुपये की बचत की है। यह सहकारी समिति सदस्य बच्चे के अभिभावक को स्व-गारंटीकृत ऋण और बच्चे की उच्च शिक्षा के लिए संपत्ति पर ऋण भी प्रदान करती है। कुल 1,070 बच्चों के अभिभावकों को ऋण दिए गए हैं और कुल 5,370 बच्चों को वित्तीय परामर्श दिया गया है।
2021 में सहकारिता मंत्रालय की स्थापना
परिवर्तन की यह लहर 2021 में सहकारिता मंत्रालय की स्थापना के साथ शुरू हुई। मात्र चार वर्षों में इसने सहकारी समितियों का आधुनिकीकरण, डिजिटलीकरण करने और उनमें विविधता लाने के लिए 61 सुविचारित पहल शुरू की हैं। सबसे परिवर्तनकारी पहलों में 73,492 प्राथमिक कृषि ऋण समितियों (पीएसीएस) के कम्प्यूटरीकरण के प्रस्ताव को मंज़ूरी, 59,920 पीएसीएस को (22 जुलाई, 2025 तक) एकीकृत उद्यम संसाधन नियोजन (ईआरपी) प्लेटफ़ॉर्म से जोड़ना और नए उप-नियमों के तहत बहुउद्देशीय सहकारी मॉडलों की औपचारिक शुरुआत शामिल है।
सरकार की रणनीति में बड़े पैमाने का विस्तार भी शामिल है। 22 जुलाई, 2025 तक 23,173 नई बहुउद्देशीय पीएसीएस, डेयरी और मत्स्य पालन सहकारी समितियां पंजीकृत हो चुकी हैं। इन पीएसीएस को एकल ईआरपी-आधारित डिजिटल आर्किटेक्चर के आधार पर अनाज भंडारण, उर्वरक और बीज वितरण, एलपीजी और पेट्रोल पंप और जन औषधि केंद्रों को संभालने के लिए डिज़ाइन किया जा रहा है।
667 सहकारी समितियां सरकारी ई-मार्केटप्लेस (जेम) पर खरीदार के रूप में पंजीकृत
यह डिजिटल बदलाव केवल वित्त तक ही सीमित नहीं है। 31 मार्च, 2025 तक 667 सहकारी समितियां सरकारी ई-मार्केटप्लेस (जेम) पर खरीदार के रूप में पंजीकृत हो चुकी थीं। राष्ट्रीय बाज़ारों तक ग्रामीण
भारत में सहकारी समितियां तेज़ी से स्थानीय सामुदायिक केंद्रों के रूप में काम कर रही हैं, जो वित्तीय सेवाओं, शैक्षिक विकास, कल्याणकारी योजनाओं, स्वास्थ्य सेवा तक पहुंच और आवश्यक उपयोगिताओं के लिए एक एकीकृत मंच प्रदान करती हैं, जिससे जमीनी स्तर पर समावेशी विकास को बढ़ावा मिलता है
कारीगरों की पहुंच बढ़ाने के लिए इन सहकारी समितियों को विक्रेता के रूप में भी शामिल करने के प्रयास किए जा रहे हैं। 31 मार्च, 2025 तक इन सहकारी समितियों द्वारा 319.02 करोड़ रुपये के 2,986 लेनदेन हो चुके थे।
भारत में सहकारी समितियां तेज़ी से स्थानीय सामुदायिक केंद्रों के रूप में काम कर रही हैं, जो वित्तीय सेवाओं, शैक्षिक विकास, कल्याणकारी योजनाओं, स्वास्थ्य सेवा तक पहुंच और आवश्यक उपयोगिताओं के लिए एक एकीकृत मंच प्रदान करती हैं, जिससे जमीनी स्तर पर समावेशी विकास को बढ़ावा मिलता है।
भारत के सहकारी सुधारों ने राष्ट्रीय स्तर पर भी आकार लिया है। सहकारी समितियों को बाज़ारों तक पहुंच, ब्रांडिंग और निर्यात क्षमता प्रदान करने के लिए 2023 में तीन बहु-राज्य सहकारी समितियों का गठन किया गया:
• राष्ट्रीय सहकारी निर्यात लिमिटेड (एनसीईएल)
• राष्ट्रीय सहकारी ऑर्गेनिक्स लिमिटेड (एनसीओएल)
• भारतीय बीज सहकारी समिति लिमिटेड (बीबीएसएसएल)
31 मार्च 2025 तक एनसीईएल ने सामूहिक निर्यात की सुविधा के लिए पहले ही 8,863 पीएसीएस/सहकारी समितियों को शामिल कर लिया है। इसके अलावा, एनसीईएल ने चावल, गेहूं, मक्का, चीनी, प्याज और जीरा सहित लगभग 13.08 एलएमटी कृषि वस्तुओं का सफलतापूर्वक निर्यात किया है, जिनका मूल्य 27 देशों में 5,239.5 करोड़ रुपये है। यद्यपि 5,185 पीएसीएस/सहकारी समितियां एनसीओएल की सदस्य बन गई हैं। एनसीओएल ने ‘भारत ऑर्गेनिक्स ब्रांड’ के तहत लगभग 167.1 लाख रुपये के 21 उत्पाद लॉन्च किए हैं। एनसीओएल ने 10 राज्यों में नोडल एजेंसियों के साथ समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर भी हस्ताक्षर किए हैं। दूसरी ओर 19,171 पीएसीएस/सहकारी समितियां बीबीएसएसएल की सदस्य बन गई हैं। बीबीएसएसएल को 13 राज्यों में बीज लाइसेंस प्रदान किया गया है।
मंत्रालय ने इस परिवर्तन को और तेज़ करने के लिए हाल ही में 24 जुलाई, 2025 को एक नई राष्ट्रीय सहकारी नीति शुरू की है। राष्ट्रीय सहकारी नीति का उद्देश्य सहकारी संस्थाओं को समावेशी बनाना, उन्हें पेशेवर रूप से प्रबंधित करना, उन्हें भविष्य के लिए तैयार करना और विशेष रूप से ग्रामीण भारत में बड़े पैमाने पर रोज़गार और आजीविका के अवसर पैदा करने में सक्षम बनाना है। नई सहकारी नीति 2025-45 तक यानी अगले दो दशकों के लिए भारत के सहकारी आंदोलन में एक मील का पत्थर साबित होगी। नई नीति ‘सहकार-से-समृद्धि’ के विज़न को प्राप्त करने का रोडमैप तैयार करेगी और 2047 तक भारत के ‘आत्मनिर्भर’ और ‘विकसित’ बनने की सामूहिक महत्वाकांक्षा में योगदान देगी।
अंतरराष्ट्रीय सहकारिता वर्ष 2025
इसके अलावा, संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित अंतरराष्ट्रीय सहकारिता वर्ष 2025 के तहत सहकारिता मंत्रालय ने भारतीय सहकारी समितियों को वैश्विक मंच पर स्थापित करने के लिए एक व्यापक राष्ट्रीय कार्य योजना शुरू की है। यह योजना अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनियों, सर्वोत्तम प्रथाओं के दस्तावेज़ीकरण और डिजिटल पहुंच के माध्यम से भारत के सफल सहकारी मॉडलों जैसे अमूल, इफको और कृभको को प्रदर्शित करने पर ध्यान केंद्रित करती है। सरकार सहकारी निर्यात को बढ़ावा देने, सहकारी समितियों के भीतर स्टार्टअप्स को समर्थन देने और देशव्यापी शिक्षा को सुगम बनाने के लिए भी काम कर रही है। इस पहल का उद्देश्य भारत की जमीनी ताकत और विशाल सदस्यता आधार का लाभ उठाकर सहकारी नवाचार का वैश्विक केंद्र बनाना है।
भारत में सहकारी समितियों की त्वरित उन्नति अब कोई काल्पनिक आदर्श नहीं रह गया है, यह एक जमीनी, मूलभूत क्रांति है। सहकारी समितियां न केवल लोगों को सशक्त बना रही हैं, बल्कि वे समावेशी, लोकतांत्रिक विकास की नए सिरे से परिकल्पना भी कर रही हैं। एक सदी पहले एक जन आंदोलन के रूप में शुरू हुई यह मुहिम अब भारत के न्यायसंगत और समावेशी विकास की कुंजी बन सकती है।

