वर्तमान मानसून सत्र के आरंभ में प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने इस सत्र को गौरव का क्षण एवं विजय उत्सव के रूप में परिभाषित किया, लेकिन यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि कांग्रेस के नेतृत्व वाला विपक्ष संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही को बाधित करने पर तुला हुआ है। मानसून सत्र 2025 भारतीय सशस्त्र बलों के शौर्य एवं साहस को नमन करने तथा ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की शानदार सफलता का उत्सव मनाने का अवसर है, फिर भी यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि 21 जुलाई, 2025 से शुरू होने वाले सत्र का पहला सप्ताह कांग्रेस के नेतृत्व वाले विपक्ष के बार-बार व्यवधानों से प्रभावित रहा, जिसके परिणामस्वरूप लोकसभा एवं राज्यसभा दोनों को प्रतिदिन कई बार स्थगित करना पड़ा। प्राय: कार्यवाही शुरू होने के कुछ ही मिनटों के भीतर सदन को स्थगित करना पड़ा। इस स्थिति के चलते न तो कोई सार्थक चर्चा हो सकी और न ही कोई विधायी कार्य आगे बढ़ पाया। यह स्थिति हमारे लोकतंत्र की गरिमा और संसदीय कार्य-संस्कृति के लिए अत्यंत चिंताजनक है और इससे संसद का सामान्य कामकाज सुचारू रूप से संचालित करना कठिन होता जा रहा है।
पहले ही दिन से यह स्पष्ट हो गया था कि विपक्ष चर्चा के बजाय टकराव का रास्ता चुनने का मन बना चुका है। लोकतंत्र में उपलब्ध सशक्त साधनों का उपयोग करने, प्रश्न पूछने, बहस करने, प्रस्ताव पेश करने या आलोचना करने के बजाय विपक्षी सदस्यों ने बार-बार सामान्य कार्यवाही को ठप करने का रास्ता चुना। इस रणनीति में दिखावे की राजनीति की गई, जिसमें सदन के अंदर बार-बार शोरगुल, नारेबाजी और तख्तियां दिखाई गईं। इस व्यवधान ने न केवल मंत्रियों को निर्वाचित प्रतिनिधियों को जवाब देने से रोका, बल्कि नागरिकों को भी पारदर्शिता और जवाबदेही से भी वंचित किया। इस प्रकार, संसद का उद्देश्य, कानूनों और नीतियों पर खुली चर्चा के लिए एक मंच प्रदान करना अधूरा रह गया और संसद में कोई भी कामकाज न होने के कारण करदाताओं का पैसा हर मिनट बर्बाद होता रहा।
विपक्ष द्वारा अपनाई गई रणनीति की व्यापक रूप से आलोचना की गई। अध्यक्ष श्री ओम बिरला और वरिष्ठ मंत्रियों ने व्यवधानों को ‘अलोकतांत्रिक’ करार दिया और विपक्ष से व्यवस्थित चर्चा की ओर लौटने का आह्वान किया। व्यवधानों के बारे में विशेष रूप से उल्लेखनीय बात यह है कि ऐसे व्यवहार से विपक्ष की धारणा और विश्वसनीयता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। संसदीय लोकतंत्र में सरकार को चुनौती देने और विविध विचारों को सामने लाने के लिए एक मजबूत और मुखर विपक्ष की आवश्यकता होती है, लेकिन यह भूमिका साक्ष्य-आधारित तर्कों और बहस के माध्यम से सबसे अच्छी तरह निभाई जा सकती है। इसके बजाय, केवल व्यवधान को प्राथमिकता देना, संसदीय प्रणाली के भीतर विरोधी आवाजों को सशक्त बनाने के लिए बनाए गए तंत्रों की अस्वीकृति के रूप में सामने आती है।
2025 के मानसून सत्र के व्यवधानों ने संसदीय लोकतंत्र की सेहत पर भी व्यापक रूप से सवाल खड़े कर दिए हैं। भारतीय लोकतंत्र ने हमेशा बहस को महत्व दिया है, यहां तक कि व्यापक असहमतियों को भी तर्कपूर्ण संवाद के माध्यम से सुलझाया जा सकता है। पारंपरिक बहस के स्थान पर बार-बार शोर और व्यवधान का सहारा लेना इस भावना को कमज़ोर करता है। यह जरूरी विधायी कार्यों से ध्यान भटकाता है और जनता को यह संकेत देता है कि संसद, राष्ट्रीय प्रगति को महत्व देने वाले स्थान की बजाय शोरगुल का अड्डा बन गई है। अगर गंभीरता से सोचें तो इस दृष्टिकोण से किसी भी संस्थान की विश्वसनीयता कम होने का खतरा बना रहता है। इससे विपक्ष को सबसे ज़्यादा नुकसान होता है, क्योंकि लगातार रुकावटों के कारण सरकारी कार्यों पर सवाल उठाने और उन्हें बेहतर बनाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका कमजोर हो जाती है।
संक्षेप में, 2025 का मानसून सत्र संसदीय हथकंडों के दुरुपयोग की एक चेतावनी है। तर्क-वितर्क और गठबंधन बनाकर अपनी प्राथमिकताओं को आगे बढ़ाने के बजाय, विपक्ष ने अपनी विश्वसनीयता और संसद की प्रभावशीलता, दोनों को ही कमज़ोर कर दिया। ये घटनाएं हमें याद दिलाती हैं कि लोकतंत्र में असहमति जताने की शक्ति के साथ-साथ उसे रचनात्मक रूप से व्यक्त करने की ज़िम्मेदारी भी जुड़ी होती है। अपने स्वार्थ के लिए व्यवधान न केवल सरकार, बल्कि राष्ट्र की प्रगति को भी पीछे धकेलता है और उस व्यवस्था को कमज़ोर करता है जिसकी रक्षा के लिए विपक्ष को जिम्मेदारी सौंपी गयी है।
जब संसद को ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की उल्लेखनीय सफलता का जश्न मनाने और अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर पहली बार तिरंगा फहराने की ऐतिहासिक उपलब्धि पर राष्ट्र के साथ मिलकर खुशी मनानी चाहिए थी, तब कांग्रेस के नेतृत्व वाले विपक्ष द्वारा ऐसी रणनीति अपनाना अत्यंत निंदनीय है जिससे राष्ट्र ऐसे गौरवशाली क्षणों से वंचित रह गया। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के सुदृढ़ और करिश्माई नेतृत्व में ‘विकसित भारत’ के स्वप्न को साकार करने की दिशा में राष्ट्र आगे बढ़ रहा है और विपक्ष की मनोबल गिराने वाली चालों के बावजूद राष्ट्र संसदीय प्रणाली और लोकतंत्र की रक्षा करेगा। जब तक राष्ट्र अभूतपूर्व उपलब्धियों के साथ प्रगति करता रहेगा, लोकतंत्र फलता-फूलता रहेगा।

