भारतीय जनमानस में ‘पुण्यश्लोक महारानी अहिल्याबाई होल्कर’ का स्थान ‘लोकमाता’ के रूप में अंकित है। मध्य भारत के मालवा राज्य की महारानी के रूप में अपनी शासन-व्यवस्था से लेकर ‘दार्शनिक रानी’ एवं ‘संत’ तक के रूप में लोगों के मन-मस्तिष्क पर उन्होंने अपनी अमिट छाप छोड़ी है। एक विराट व्यक्तित्व की स्वामिनी अहिल्याबाई होल्कर आदर्श नारी, साहित्य एवं कला की संरक्षक, कुशल प्रशासक, समाज सुधारक, परम धार्मिक एवं कुशल राजनीतिज्ञ के रूप में प्रसिद्ध हैं। देवी के रूप में पूजी जाने वाली साम्राज्ञी, कर्मयोगिनी, योद्धा, ममतामयी, न्यायप्रिय, प्रजावत्सल एवं नियमों का कठोरता से पालन करने वाली व्यक्तित्व की स्वामिनी महारानी अहिल्याबाई ममत्व, संतत्व से परिपूर्ण कर्तव्यपथगामिनी शासिका थीं। वे बहुमुखी प्रतिभा एवं बहुआयामी व्यक्तित्व की स्वामिनी थीं। यह हर्ष का विषय है कि देश इस वर्ष महारानी अहिल्याबाई होल्कर की त्रि-शताब्दी वर्ष मना रहा है।
एक विराट व्यक्तित्व की स्वामिनी अहिल्याबाई होल्कर आदर्श नारी, साहित्य एवं कला की संरक्षक, कुशल प्रशासक, समाज सुधारक, परम धार्मिक एवं कुशल राजनीतिज्ञ के रूप में प्रसिद्ध हैं
महाराष्ट्र के अहमदनगर जिला के चौंडी गांव में 31 मई, 1725 को एक अत्यंत साधारण एवं धर्मपरायण परिवार में अहिल्याबाई का माता सुशीलाबाई एवं पिता मनकोजी शिंदे के घर में जन्म हुआ। प्रारंभ से ही इनके व्यक्तित्व में एक दैवीय तेज था जिसे मालवा के सूबेदार मल्हारराव ने देखते ही तत्क्षण पहचान लिया तथा इनका विवाह 1733 में अपने पुत्र खांडेराव होल्कर से कर दिया। अहिल्याबाई का जीवन 1733 से 1754 तक पारिवारिक रहते हुए भी शासन-व्यवस्था के दायित्वों से युक्त था। उनकी प्रतिभा को देखते हुए मल्हाराव होल्कर ने शुरू से ही उन पर शासन का दायित्व देना प्रारंभ कर दिया था। 1754 में पति खांडेराव होल्कर की एक युद्ध के दौरान मृत्यु के पश्चात् उन पर दु:खों का पहाड़ टूट पड़ा। इसके बाद इन्हें जीवन में अनेक असह्य वेदना से गुजरना पड़ा तथा एक-एक करके सास गौतमाबाई, श्वसुर मल्हारराव, पुत्र मालेराव, पौत्र नाथोबा, बेटी मुक्ताबाई एवं दामाद यशवंत राव इनका साथ छोड़ते चले गए। व्यक्तिगत स्तर पर असीम पीड़ा एवं अथाह दु:ख के सागर के बीच भी महारानी अहिल्याबाई सुशासन, सामाजिक सुधार एवं देश की संस्कृति के उत्थान एवं धर्म जागरण के लिए निरंतर अद्वितीय कार्य करते हुए जन-जन के हृदय में ‘पुण्यश्लोक’ के रूप में प्रतिष्ठित हुईं।
महारानी अहिल्याबाई ने अपने सुशासन में प्रजावात्सल्य का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया तथा वह कहती थीं, “ईश्वर ने मुझ पर जो उत्तरदायित्व रखा है, उसे मुझे निभाना है। मेरा काम प्रजा को सुखी रखना है। मैं अपने प्रत्येक काम के लिए जिम्मेदार हूं। सामर्थ्य व सत्ता के बल पर मैं जो कुछ भी यहां पर रही हूं, उसका ईश्वर के यहां मुझे जवाब देना पड़ेगा।” उनके काल में उनकी प्रजा को बाहरी शत्रुओं, चोर, डाकुओं या राज्य के अधिकारियों से कोई भय नहीं था, वे पूर्णत: स्वयं को सुरक्षित महसूस करते थे। न्याय व्यवस्था इतनी सुदृढ़ एवं निष्पक्ष थी कि दोषियों को कड़ा दंड दिया जाता था। कृषि को प्रोत्साहन, किसानों को कर में छूट तथा न्यायसंगत कर व्यवस्था के कारण उनका राज्य हर तरह से खुशहाल था तथा इंदौर एवं महेश्वर समृद्ध व्यापारिक केंद्र के रूप में विकसित हुए। अनेक प्रकार के सामाजिक सुधारों से महिला, बच्चे एवं विधवाओं के लिए अनेक व्यवस्थाएं बनाई गईं। युद्ध कौशल में दक्ष महारानी ने कई बार अपनी सेना का स्वयं नेतृत्व कर दुश्मनों के दांत खट्टे किए तथा महिला सैन्य टुकड़ी का भी गठन किया। सड़क, डाक सेवा, जल प्रबंधन, शिक्षा व्यवस्था के साथ-साथ अनेक धर्मस्थानों, सांस्कृतिक केंद्रों एवं धर्मशालाओं के निर्माण एवं जीर्णोद्धार के व्यापक कार्य उनके द्वारा कराए गए। चाहे सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण हो, अयोध्या, वाराणसी एवं मथुरा में स्थित प्राचीन मंदिरों का पुनर्निर्माण अथवा चारधाम, सप्तपुरी एवं बारह ज्योर्तिलिंगों के निर्माण एवं जीर्णोद्धार का कार्य हो, महारानी अहिल्याबाई ने इन पवित्र कार्यों को अपने व्यक्तिगत कोष से संपन्न कराया। यहां तक कि नेपाल में स्थित पशुपतिनाथ मंदिर तक में उनके द्वारा किए गए निर्माण कार्य आज भी जनस्मृतियों में सुरक्षित हैं। पवित्र नदियों के घाटों एवं तटबंधों, अनेक जलाशयों एवं तालाबों के निर्माण के साथ-साथ पूजा, यज्ञ, सत्संग एवं दान की महिमा को अपने व्यक्तिगत उदाहरण से उन्होंने प्रतिष्ठित किया।
यह विशेषांक ‘कमल संदेश’ द्वारा इस पुनीत अवसर पर उनकी पुण्य स्मृतियों को श्रद्धा-पुष्प अर्पित करने का एक प्रयास है। यहां प्रकाशित लेख हमारे लिए संजीवनी है तथा हमें ‘शब्दयज्ञ’ में लगे रहने की प्रेरणा देता है। अपने सभी लेखकों के प्रति उनके बहुमूल्य लेखों के लिए हम कृतज्ञ हैं। आशा है हमारे पाठकगण इस प्रयास का लाभ अवश्य उठाएंगे।

